:चिता और आदमी के बीच
— नन्दलाल भारती
चिता की ओर बढ़ता आदमी,
पीछे मुड़कर देखता है—
कोई साथ है...
आगे नज़र उठाता है—
कितने हाथ हैं...
और अचानक
उसका मन बसंत हो जाता है!
मगर...
आगे-पीछे की आहटों से बेखबर,
आत्मपीड़ा के बोझ तले दबा,
वह उतरता है
अपने ही दिल की गहराइयों में,
तहकीकात करता है
अपने बीते हुए कल की।
कितने सवाल,
कितनी कसक,
कितनी दूरियाँ,
कितने रिश्तों का बिलगाव...
मगर अंतर्मन की अदालत में
हाथ लगता है—आत्मसंतोष!
गुनाह नहीं,
माँ-बाप के प्रति कर्म और फर्ज़ थे,
जिम्मेदारियों के कठिन रास्ते थे,
कुछ अधूरे अरमान थे,
कुछ अनकहे दर्द थे।
अपने किए कर्मों की रोशनी में
वह खुद को देखता है,
और आत्मसुख की एक हल्की मुस्कान
उसके चेहरे पर उतर आती है।
चिता की ओर बढ़ता आदमी
सोचता है—
यह कैसी मायावी दुनिया!
अंधा प्रेम, लोभ और मोह,
कहाँ किसे छोड़ते हैं,
कब किसे गुमराह कर देते हैं!
फिर भी...
वह किसी को कोसता नहीं,
मन ही मन दुआएँ देता है—
बची रहे रिश्तों की विरासत,
सजी रहे अपनत्व की धरोहर,
खुशहाल रहे घर-परिवार,
हर आँगन में खिलता रहे प्यार।
वह बढ़ता है...
अपने भीतर कुछ हल्का होकर,
कुछ संतुष्ट,
कुछ उदास,
कुछ उम्मीदों को सीने में समेटे।
तभी...
हौले से कोई पीछे से आता है,
दो नन्हे हाथों से
उसकी आँखें ढँक जाता है।
कोई गले का हार बन जाता है,
कोई बाँहों में सिमट जाता है,
और एक मीठी आवाज़ गूँजती है—
“पहचानो दादा, मैं कौन?”
“बताओ नाना, हम कौन?”
चिता की ओर बढ़ता आदमी
मुस्कराकर बोलता है—
“अरे! मेरे नटखटो!”
फिर क्या...
हँसी की फुलझड़ियाँ,
दुलार की फुहारें,
आशीर्वाद की छाँव,
शुभकामनाओं की बरसात,
और दुआओं से भीगी
अपनों की सौगात!
वह हाथ उठाकर
सबको आशीष देता है,
किसी के माथे को चूमता है,
किसी को सीने से लगाता है।
और फिर...
चिता की ओर बढ़ता आदमी,
और चिता के बीच की दूरियाँ
कुछ और बढ़ जाती हैं...
कौन जाने—
यह कदमों का ठहराव है,
रिश्तों का खिंचाव है,
या जीवन की बुझती साँझ में
उम्मीदों का नया बहाव है!
चिता वहीं है...
रास्ता भी वहीं है...
मगर आदमी के भीतर
अभी कुछ जीवन बाकी है।
— नन्दलाल भारती
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