कहानी:चरस
ठाकुर बंजरनाथ बाबू के खेतों से लेकर हवेली की ऊँची दीवारों की प्रेतछाया में जगदेव की ज़िंदगी बीड़ी के धुएँ,दारू की गंध,गांजे और चरस की मदहोशी में उलझी हुई थी।
यह नशा जगदेव की गरीबी या उसकी जरूरतों को पूरी करने के लिए नहीं थी ना भूख मिटाने के लिए थी, उसकी सोच को क्षीण करने और दिमाग को सुन्न रखने के लिए थी ताकि वह कोल्हू के बैल जैसे कटता रहे कम से कम मजदूरी में।
ठाकुर जानते थे—देह को बाँधने से पहले दिमाग को बाँधना ज़रूरी है, वही कर रहे थे जगदेव के साथ बचपन से l
जगदेव को मजदूरी बहुत कम मिलती हाँ बखशीश के तौर कभी, बीड़ी का बंडल, कभी गांजा कभी भांग कभी सरसों भर चरस की पुड़िया मिल जाती थी,
ऐसी विवशता,शोषण,छुआछूत,गरीबी के अंधेरे में जगदेव का बेटा हरीश शिक्षा के लिए संघर्षरत मौन था।
एक दिन उसकी माँ वसुंधरा जोर से चिल्लायी -अरे हरीश कहाँ हैं?
हरीश बोला- माँ क्यों बुला रही हो l घर में ही तो हूँ l पढ़ाई कर रहा हूँ, स्कूल जाना हैl मेरी बारहवीं की परीक्षा है l मैं कहाँ जाऊंगा? बताओ क्यों बुला रही थी l
वसुंधरा बोली-जा देखी, तेरे बाबू, गांजा, दारू,बीड़ी पीते-पीते अब ना जाने और क्या पीने लगे हैं, बीड़ी के अंदर डाल कर?
हरीश बोला-क्या कह रही हो माँ?
वसुंधरा बोली-अरे तू तो जा अपने बाप को देख,मैं इतनी पढ़ी लिखी जानकार होती तो बैल की तरह ठाकुर की गुलामी करती तेरे बाप के साथ l
एक खाने पहनने का ढंग का इंतजाम नहीं, मांस,मदिरा चाहिए l जा देख बेटा अब कौन सा जहर उनके हाथ लग गया है l
हरीश बोला -देखता हूँ माँ,कहते हुए वह बाप की महफ़िल में पहुंच गया l संतू गांजा मल रहे थे,खरपतू रस्सी जलाकर आग बना रहे थे,श ।
राजन चिलम साफ कर रहे थे,दत्तू बीड़ी का कस खींचकर धुंआ हवा में उगलते हुए बोले लो भैय्या सिरतू तुम भी एक सुट्टा मार लो l
हरीश बोला- क्या है दादा?
दत्तू बोले- बीड़ी है l
जगदेव-कस खींचते हुए बोले-बीड़ी है, देख नहीं रहे हो, ये देखो बीड़ी है ना?
हरीश बोला-दो बाबू मैं पीकर देखता है ।
जगदेव बोले-तुम बीड़ी पिओगे?
हरीश बोला-पीने की चीज है न बाबू तुम पी सकते हो तो मैं क्यों नहीं?
जगदेव बोले-मारूंगा एक झापड़ जाकर दूर गिरेगा अभी से बीड़ी पीएगा। तुम छोटे हो बच्चे बीड़ी नहीं पीते। चल भाग यहां से।
इतने में किशु काका आ गए और बोले क्या हुआ हरीश बेटा l
जगदेव बोले-समझाओ हरीश को बीड़ी पीने को मांग रहा क्यों भैय्या बिगड़ रहे है l
हरीश बोला-मैं नहीं पिऊंगा काका को दें दो l
जगदेव बोले-एक बीड़ी पांच लोग खींच चुके हैं l
हरीश बोला-एक बीड़ी का दूसरा राउंड? संतु काका बीड़ी दो जो पी रहे हो, मैं नहीं किशु काका पियेंगे l
संतु बोला-किशु भईया गांजा पियेंगे बीड़ी नहीं l
हरीश बोला-काका बीड़ी दो, किशु काका नहीं तो कोई और पी लेगा l
हरीश संतु से बीड़ी लेकर जलाया और राजन को थमाते हुए लो काका बस एक कस खींच लो l
राजन बीड़ी का धुंआ हवा में उछाल दिया l इधर हरीश के बाप ने बीड़ी का आखिरी कस खींचकर बोले लो अब किस्सा ख़त्म l
हरीश ने किशु का हाथ अपने सिर पर रखकर पूछा काका दोनों में बीड़ी के धुएँ में कोई अंतर था या नहीं मेरी कसम खाकर बताना-हाँ या नहीं l
किशु बोले-अंतर तो है l
किशु सिरतु से पूछे-भईया बीड़ी के कुछ और है क्या ?
इतने में संतु ने गांजा की चिलम किशु को पकड़ा दिए l किशु गांजा का कई कस खींचकर चिलम आगे बढ़ा दिए l
हरीश किशु से बोला-काका एक बीड़ी दो धुंआ, और एक गांजा एक धुंआ, कुछ समझे?
किशु बोले-नहीं बेटा?
हरीश बोला-बाबू से पूछो काका l
किशु पूछे-क्या था बीड़ी या कुछ और ?
जगदेव बोले-कुछ नहीं रे किशुआ बीड़ी ही थी क्यो बात का बतंगड़ बना रहे हो तुम लोग।
हरीश बोला -बाबू झूठ क्यों बोल रहे हो l
जगदेव बोले- बीड़ी थी न एक बार तो बता दिया l जा भाग जा यहां से l
हरीश बोला-चरस पी रहे थे बीड़ी में मिलाकर क्यों झूठ बोल रहे हो बाबू l ठाकुर ने दिया था ना l
जगदेव बोले- हाँ बाबूसाहेब दिए थे l इससे दर्द नहीं होता,बेचैनी दूर होती है, अच्छी नींद आती है l शरीर की थकावट दूर हो जाती है l
हरीश बोला-सब झूठ है, ठाकुर साहब को तुम्हारी फिक्र नहीं है, उन्हें अपने काम की फिक्र रहती है, इसी नशे की लालच में सूरज उगते ही हवेली पहुंचते होऔर रात सोता पड़ने पर वापस आते हो l
बाबू गांजा, दारू, चरस जहर हैं,ये. मौत देते हैं ,मेहनत की कमाई के बदले।
किशु बोले- चरस क्या होता है बेटा हरीश?
हरीश बोला- काका जिस गांजा का धुंआ उड़ाकर राजा होने का सुख ये लोग भोग रहे हैं,चरस उसी गांजा के पौधे से निकलने वाला नशीला जहर है l
ठाकुर ने एक दो बार दिया होगा, लत लग गयी तो, बच्चों का पेट काटकर गांजा, चरस, दारू पर उड़ा रहे हैं l
बच्चों के परवरिश की चिंता नहीं हैं इन लोगों को जहर पीने की चिंता में डूबे रहते हैं, वाह रे नशेड़ी बाप l
किशु बोले- सच में जहर है क्या बेटा?
हरीश बोला-बहुत फायदेमंद है,नरक लोक का वीजा जल्दी मिल जायेगा l फायदा भी सुन लो,फेफड़ों को नुकसान, खांसी, सांस फूलना,,हृदय गति बढ़ना, बीपी असंतुलन, हार्ट अटैक का खतरा,
घबराहट,पागलपन और बहुत फायदे जेल की रोटी मुफ्त में मिल सकती है l ऎसे नरक के सुख के लिए ही ये जहर हैं l ए जहर तबाही लाता है।
जगदेव बोले-मरना तो है ही एक दिन, खा पीकर मरेंगे l
संतु बोले-बेटा दिन भर मेहनत-मज़दूरी करते हैं, रात में रुखा सूखा खाकर चैन से सो जाते हैं और कुछ नहीं l
हरीश बोला-खतू दादा,दत्तू,राजन, संतु काका तुम सभी लोग आधा-आधा दर्ज़न बच्चों के बाप हो, बच्चे भीख मंगवाने के लिए या बाबूसाहेब लोगों के लिए गुलामी के लिए पैदा किये हैं l
संतु बोले-बड़े होकर खुद फैसला कर लेंगे क्या करना है क्या नहीं?
हरीश बोले-काका बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं, भूखे नंगे इधर उधर भटक रहे,काका पता नहीं चलेगा बच्चे से बूढ़े कब हो गए क्यों अपनी नशे की लत से बच्चों का जीवन मुर्दहिया बना रहे हो?
किशु बोले-बेटा बात सही कह रहे हो l
हरीश बोला-हम आधा भाई-बहन है, मैं स्कूल जा पाता हूँ, घर का काम करता हूँ, बाबूसाहेब के खेत में मजदूरी का काम कर लेता हूँ,
सड़क, नहर पर माटी फेंक कर पढ़ाई भी करता हूँ, इस तरह से लड़के-लड़कियां क्या कर पायेगा,जब उनके बाप गांजा, चरस, दारू के नरक में डूबे रहेंगे,
माताएँ कोल्हु के बैल की तरह ठाकुरों के खेत खलिहान से लेकर चूल्हे चौके रात दिन एक करती रहेगी तो क्या होगा.... बस यही ना ठाकुरों के बंधुआ मज़दूर l यही चाहते हैं बाबूसाहेब लोग?
राजन बोला-जगदेव काका हरीश की बात में दम तो है l
जगदेव बोले-हम नशा क्यों करते हैं जानते हो l
राजन बोला-काका सबके अपने-अपने बहाने हो सकते हैं l तुम क्यों नशा क्यों करते हो बताओ ताकि हरीश को भी पता चल जाये l
जगदेव बोले-दुःख, तकलीफ और गम भुलाने के लिए पिता हूँ l
राजन बोला-सुन लिए हरीश l
हरीश बोला-कब तक सब कुछ भूला रहता है, जब तक नशा है तब तक ना l अरे गरीबी,अशिक्षा,बेरोजगारी,भूमिहीनता जैसी समस्याओं के निदान के बारे में सोचो और उसके निवारण पर काम करो, तब समस्या का समाधान निकलेंगा,
रेगिस्तान का शुतुरमुर्ग बनने से समस्या बढ़ेगी, जैसे बाबूसाहेब लोग-कभी चरस, कभी गांजा,तम्बाकू, बीड़ी हाथ पर रख दिए कभी एक चम्मच अंग्रेजी दारू तुम्हारी,
कटोरी में टपका दिए और तुम उनकी चौखट से पालतू कुत्ते की तरह बंध गए, यह साजिश है,गुलाम बनाये रखने की l
किशु बोले-वाह बेटा हरीश तुमने तो अक्ल पर पड़ी कंकरिट की मोटी परत को फूँक मारकर सच्चाई दिखा दिए ।
हरीश बोला-मेरे पिताजी को देखो जब से इनकी आँख खुली है, तब से ठाकुर की चौखट से जुड़े है क्या मिला है?
किशु बोले-यह तो सिरतु भईया ही बता सकते हैं ले
हरीश बोला- काका मैं बताता हूँ-पंद्रह बीसा जमीन वह भी जब तक चौबीस घंटे के गुलाम बने रहेंगे l दो किलो दिन भर की मजदूरी, दिन शुरू होता है-
सूरज उगने से पहले और दिन खत्म होता है-हम लोगों के सो जाने के बाद, कई-कई दिन तो हम अपने पिताजी को देख ही नहीं पाते l यही हाल पूरी बस्ती का है l
किशु बोले-जमींदार लोग शोषण की तलवार से ही तो ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैl
हरीश बोला-काका ये जमींदार लोग शोषण के साथ धोखा कर रहे है l मेरे पिताजी को हरवाही में पंद्रह बीसा जमीन ठाकुर भास्करनाथ ने दिया है,
इस जमीन में दस बीसा गांव समाज की ऊसर जमीन है, जो हम लोगों की मेहनत से उपजाऊं बनी है, जिस दिन पिताजी हरवाही छोड़ेगे उस दिन गांव समाज की जमीन भी सरकारी कागजों में ठाकुर की हो जाएगी,वृक्षारोपण के नाम पर या किसी और नाम पर l
किशु बोले-बेटा तू तो सच्चाई बता रहे हो, पच्चासों एकड़ गांव समाज की जमीन भी बाबूसाहेब लोग कब्जीयाये हुए हैं, हमारे लोग गांजा चरस के नशे में बेसुध गुलाम बने हुए है l
जगदेव बोले-तू ही बता क्या करना चाहिए l
हरीश बोला-बाबू नशा की कोई चीज हो,उसका त्याग कर देना चाहिए, बच्चों को पढ़ाना-लिखाना चाहिए,शहर-परदेस जाना चाहिए,
खुद की तरक्की के लिए काम करना चाहिए,अपने श्रम की वास्तविक कीमत लेना चाहिए, ये नहीं एक एक किलो के चार बजे तक दो किलो रात के दस बजे कभी -कभी पूरी कोल्हू के बैल की तरह शोषक समाज की गुलामी करना चाहिएl
ये लोग जब खुश होते हैं तो बंडल बीड़ी, एक चिलम गांजा, दो घूँट दारू या सरसों भर चरस फेंक देते हैं या जब इनकी हवेली में बकरा पकता है तब बची हुई एक बोटी एक कटोरा जूस दे देते हैं,
हमारे लोग इतने खुश हो जाते हैं कि अपना हितैषी मान लेते हैं, जबकि शोषक समाज कमेरी दुनिया के लोगों का हितैषी कभी नहीं हो सकता l
संतु बोले-वाह बेटा तुमने तो दिन में तारे दिखा दिए l
हरीश बोला-काका मैं इक्कीस साल का हो गया हूँ, मेरे. पिताजी ठाकुर बंजरनाथ की बंधुवा मजदूरी दस बारह साल की उम्र से कर रहे हैं,
बदले में क्या मिला है, इतनी भी दिन भर की मजदूरी नहीं मिलती की हम लोग एक टाइम भर पेट खाना खा सके l उपर से अत्याचार उनके खेत या खेत की मेड़ पर से भी घास काट लो तो गाली सुनो l
इसी बंजरनाथ के भाई रमिन्दर ने खेत से घास काटने के जुर्म में,जमींदारी की चरस के नशे में मुझ पर लात घुसा बरसाए थे,आज भी रीढ़ दुखती है बाबू, दर्द से आंसू निकल जाते हैं,
मन करता है कि उस गुण्डे की रीढ तोड़ दूं पर इतनी औकात होती तो तुम रपट लिखा ना देते । गुण्डा मुझे देख कर मुसकियाता है , मैं कराह उठता हूं।
हरीश की बातें सुनकर उसके पिता जगदेव की आँखे भर आयी, पिता के आँसू पोंछते हुए हरीश बोला बाबू एक तुम्हारी भी शानो-शौकत होगी पर हम अत्याचारी नहीं बनेंगे l
जगदेव बोले-ये अत्याचारी एक दिन राख में मिल जायेंगे,जमाना थूकेगा, इनकी हवेलीयों में सियारिन तो अभी से फेंकरने लगी हैं l
हरीश बोला- मानसिक गुलामी भी चरस है, इससे मुक्ति का मार्ग पढ़ाई है l
हरीश की बातों से खतू दादा,दत्तू,राजन,संतु प्रभावित होकर बीड़ी, गांजा, दारू,चरस जैसे जहर को त्याग दियाl
बस्ती के युवक शहरों की ओर कुंच करने लगे, अत्याचारी समाज मुंह के बल गिर पड़ा l मजदूर बाप जगदेव का बेटा हरीश भी पढ़ाई पूरी कर शहर की तरफ भागा, उसके माँ -बाप की तपस्या और उसका परिश्रम रंग लाया l
वक़्त बदला, और हरीश की ख़ामोशी शब्द बन गई। पढ़ाई ने उसकी आँखों से नशे का पर्दा हटाया और विवेक ने उसे मानसिक गुलामी की जंजीरों से मुक्त कर दिया।
जगदेव उसी तरह अपने बेटे के बनवाये तख़्त पर बैठता था, जैसे कभी ठाकुर बैठते थे—पर सिर ऊँचा था, सीना फूला नहीं। उसके आसपास ईष्ट-मित्र थे, नौकर नहीं।
जगदेव को शानो -शौकत को देखकर व्यंग्य कसते हुए जमींदार बंजरनाथ का बेटा कुंवर खंजरनाथ बोला-
जगदेव तो बड़े जमींदार जैसे तख्त पर बैठता है, जो जगदेव रिरिकता था वही जगदेव अब तो हमें नौकरी देने लायक हो गया हैl
जगदेव मुस्कुराया, उनके न कोई कटुता, न कोई घमंड पर हरीश पर गर्व था वे बोले-
हाँ खंजरनाथ बाबू..... ज़ख्म के सुलगते निशान अब मिटे तो नहीं है धुंधले जरुर पड़ गए हैं पर मैं वही नौकरी काम धंधा करने की सलाह दूँगा जिसमें बीड़ी नहीं, किताब मिले; दारू नहीं, हौसला मिले; और चरस नहीं, चेतना मिले।
जगदेव की बातों से ठाकुर बंजरनाथ का बेटा खंजरनाथ खामोश था,हवेली की दीवारें तो पहले ही खामोश हो गयीं थीं
जगदेव बोले -तख़्त बदलने से कुछ नहीं होता बाबू सोच बदलने से सब कुछ होता है l
मानसिक गुलामी की चरस छोड़कर जो रास्ता पकड़ता है, वही असली तरक्की की ओर जाता है।”
नन्दलाल भारती
04/02/2026
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY