Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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चमारों की बस्ती

 

कहानी:चमारों की बस्ती

डूबते सूरज को बूढ़ी आँखों से निहारते हुए शायद नारद का यही सोच रहे थे कि  सूर्योदय के साथ चमारों की बस्ती के भाग्य का उदय हो जाता l नारद काका की टकटकी देखकर प्रफुल्ल बोला-पायलागू काका l

नारद काका आँख पर टंगा चश्मा उपर-नीचे करते हुए बोले-खुश रहो बेटवा l  तरक्की करो,आगे बढ़ो l चमारों की बस्ती का नाम रोशन करो,देश का नाम रोशन करो l 

प्रफुल्ल बोला-काका डूबते सूरज में चमारों के बस्ती की उगती नसीब देख रहे थे क्या?

नारद काका बोले-हाँ बेटवा नसीब के जागने की उम्मीद तो है l 

काश चमारों की बस्ती का कोई नायक बस्ती की सिसकती नसीब बदल देता, जातिवाद,भूमिहीनता,अशिक्षा,दीनता का दाग धूल जाता l 

प्रफुल्ल बोला-नायक तो बस्ती वालों को बनाना होगा l मांस-मदिरा छोड़कर बच्चों को  शिक्षा कि शेरनी का दूध पीलाना पड़ेगा l हुनरमंद बनाना पड़ेगा l काका अब आरक्षण से नौकरी नहीं मिलने वाली नहीं,आरक्षण रहकर भी क्या करेगा? जब सरकारी विभाग और कालेज निजीकरण की चपेट में आ गए हो l 

नारद काका बोले-हाँ बेटवा, कुछ योग्य पढ़े लिखे नौकरी में जाएं कुछ व्यवसाय  को अपनाये l नजरिया बदलने से ही नजारे बदलेंगे l

प्रफुल्ल बोला-हाँ काका,समय के साथ बदलाव जरूरी है l सोये हुए समाज को झकझोर कर जागना भी है l आज की दुनिया में शिक्षा और संघर्ष  के साथ बिजनेस  में भी उतरना होगा l

नारद काका बोले- हाँ बेटवा,विदेशी दुश्मनों ने हमारे पूर्वज शासकों को कपट-छल-बल से  सत्ता,जल,जमीन और जंगल से बेदखल कर अछूत बना दिया  l

प्रफुल्ल बोला -काका हमारे पूर्वज शासकों में चंवरसेन,अवंति,वर्मन, रानी सुगंधा,राजा मयाराम,चिंतामणि धोबा, राजा चंवर, कमलसेन,ब्रह्मसेन, रतिसेन,आदि अनेक महान सम्राट हुए है पर वो  बीते जमाने की बात हो गयी है l अब काका सोये हुए समाज को उठकर अपनी नसीब लिखना होगा l

नारद काका बोले-बेटा वक्त आ गया है-अब तरक्की करो या मरो का युग आ गया है l आदमियत के दुश्मनों ने इतिहास में छेड़छाड़ कर देश के मूल शासकों  को असुर चमार बना दिये और खुद सुर बन गएl 

प्रफुल्ल बोला-काका चमार मुग़ल शासक सिकंदर लोदी की गाली है  l यह गाली किसी एक को नहीं दी गयी थी,यह गाली पूरे भारत के मूलनिवासियों को दी गयी थी  l

नारद काका बोले-आदमियत के दुश्मनों ने भारत मूलनिवासी वीर क्षत्रियों को चमार बना दिया, एक गाली का दुष्प्रभाव आज भी सहना पड़ रहा है l

प्रफुल्ल बोला-हाँ काका सिकंदर लोदी की  गाली से खुश होकर पोथीवालों ने चौथेवर्ण शूद्र की स्थापना कर डाला  l 

नारद काका बोले-इंसानियत के दुश्मनों ने पीने के पानी पर प्रतिबंध लगाये,कमर में झाड़ू,गले में हाड़ी लटकायेl महिलाओ पर स्तन टैक्स तक लगाये,हाय रे आदमियत के दुश्मनों कितने गए थे?

प्रफुल्ल बोला-काका,दूर कहाँ जा रहे हो अपना गांव को देखो दस परिवार सवर्ण जमींदारों का है पूरे गांव की नब्बे प्रतिशत जमीन पर उनका कब्जा  है l

गांव में पचास से अधिक चमार परिवार है, जितनी जमीन पर तीन जमींदारों की हवेलीयां है उतनी ही जमीन पर पूरी चमारों की बस्ती बसी है l

जमींदार गाँव की जमीन के मालिक हैं चमार भूमिहीन खेतिहर मज़दूर हैंl ये कितना बड़ा अत्याचार है कि चमार अपने ही पुरखों की जमीन पर मज़दूर है l

नारद काका बोले-बेटा विदेशी दुश्मनों ने अंगूठा काटकर,गर्म सरिया से आँख निकालने जैसा अत्याचार किया है l गांव जमींदारों के पुरखे ने हमारे पुरखों के हाथ तोड़कर अंगूठा काट लिए तभी तो हम भूमिहीन हुए हैं? 

प्रफुल्ल बोला-चमारों की बस्ती  का गांव के पश्चिमी किनारे पर दूसरे गांव की सीमा से सटे हुए छोटे से भूखंड पर बसा होना भी घोर साजिश l

नारद काका बोले-बेटा जितनी लम्बी रजाई उतना पैर फैलाओ, ये कहावत हमारी बस्ती को देखकर बनी होगी तभी तो चमारों की बस्ती के लोग सदियों से अशिक्षा, गरीबी,बेरोजगारी,भूमिहीनता का दुःख भोग रहे है l

प्रफुल्ल बोला-काका सच ये साजिश है, तभी तो पहले अंगूठा काटे, फिर जमीन आसमान छिन लिए  l देखो चमारों के दरवाज़े तक सवर्णों के ही तो खेत है, जो जमीन  कभी हमारे पुरखों  की थी l काका जमीन हमारे पुरखों की आत्मसम्मान थी l हमारे पुरखों के आत्मसम्मान को छल-बल से रौदकर मानसिक गुलाम बनाया गया,जिसका शिकार आज की पीढ़ी भी है l

नारद काका बोले -प्रफुल्ल बेटा,अत्याचार, अन्याय हमारे लोग सदियों से सहते आ रहे हैं, कहने को तो लोकतंत्र है पर लोकतंत्र के पहरेदार ही छाती में खंजर उतार रहे हैंl धार्मिकउन्माद, जातिवाद, भ्रष्टाचार,जुमलेबाजी, वोटचोरी के दौर में न्याय की किससे उम्मीद की जाय l 

बेटा अगर न्याय हुआ होता तो भूमिहीनता, छुआछूत,दलितो आदिवासियों और महिलाओ का न तो दमन होता और न लोकतंत्र की हत्या l

प्रफुल्ल बोला-काका घाघ नेता नहीं चाहते कि देश  की अंदरूनी समस्या खत्म हो, वे चाहते हैं, देश की जनता आपस में लड़ती मरती रहे,वे जाति- धर्म के नाम पर वोट लूटते रहे,हिटलर की तरह सत्ता पर काबिज रहे,जनसंख्या का रोना रोते रहेl 

नारद काका बोले-देश की जनसंख्या कोई समस्या नहीं है,मुफ्त शिक्षा करो, हर हाथ को हुनरबाज बनाया,हर हाथ को काम दो,चीन जैसे आत्मनिर्भर बनो पर नहीं यहां तो पांच किलो मुफ्त अनाज देकर पंगु बना रहे हैं l

बेटा ये घाघ नेता लोग धर्म की अफीम चटाकर  सत्ता पर बने रहना चाहते हैं,उन्हें देश और समाज की तरक्की से कोई मतलब नहीं हैl

प्रफुल्ल बोला-काका लोकतंत्र के सिपाही,धर्म के सिपाही बनते जायेंगे तो न समाज जा विकास होगा न देश का l मुसोलीन किस्म के शासक  चाहते हैं कि गरीब,गरीब बना रहे,अशिक्षित,अशिक्षित बना रहे, गुलामों की फ़ौज तैयार हो, इसीलिए न तो सामंतवादी सोच के लोग न समान शिक्षा,न तो समान चिकित्सा का प्रावधान कर रहे है l

नारद बोले-हाँ बेटा,जब तक सत्ताधीश बाटो और सत्ता पर काबिज रहो की कुनीति अपनाएंगे तब तक देश और समाज कैसे तरक्की करेगा?

प्रफुल्ल बोला-हाँ काका तभी तो चमारों की बस्ती से तरक्की दूर है,जातिवाद, भूमिहीनता,गरीबी पसरी पड़ी है l क़ानून रहने से क्या होगा, जब रक्षक ही भक्षक बनेगें?

नारद काका बोले -बेटा खेत जमीन का एक टुकड़ा भर नहीं होता आत्मसम्मान होता है l चमारों के आत्मसम्मान पर डकैती हुई हैl दलितों आदिवासियों के जनप्रतिनिधि भी मूक-बाधिर बने,अपने ही लोगों के अधिकारों के दहन का तमाशा देखते रहते हैं l

प्रफुल्ल बोला-काका देश की राजनीति से लेकर गांव की राजनीति एक जैसी हो गई हैl ग्राम प्रधानी में आरक्षण से पहले  प्रधान सवर्ण ही होते थे, वे कभी नहीं चाहे कि गांव के चमार आत्म सम्मान से जीयेl

जमींदार प्रधान लोग  आवन्टन नहीं होने दिए, खुद गांव समाज की जमीन कब्जीयाते रहे l ग्राम प्रधानी में जब से आरक्षण शुरू हुआ है, तब से कई दलित प्रधान हुए हैं,पर क्या दलित प्रधानों ने आवन्टन किया नहीं....ना l काका सत्ता की भूख ही ऐसी है, मुर्दो की छाती पर सत्ता पकड़े रहना चाहते हैं l आजादी के दशकों बाद भी चमारों की बस्ती में अशिक्षा,भूमिहीनता, बेरोजगारी,गरीबी पसरी हुई है l

नारद बोले-बेटा आवन्टन तो दूर गांव की खलनायिका प्रधान फिरती देवी ने चमारों के आवन्टन सपनों का दहन कर गांव समाज की जमीन सवर्णो को खेल के मैदान के नाम लिख दी l 

बताओ एक गांव चमार बहुल समाज के पास रोटी के लिए जमीन  नहीं है वही पर सवर्णो के लिए सरकारी जमीन पर खेल का मैदान l बेटा जिन्हें नायक बनना चाहिए वही खलनायक बन जा रहे हैं तो चमारों की बस्ती में तरक्की कैसे आएगी l

प्रफुल्ल बोला-सोये हुए समाज को जागना पड़ेगा काका तभी आत्मसम्मान और अधिकार मिलेगा l

नारद काका बोले-हाँ बेटवा,जमीन से जुड़े बस्ती वालों के लिए जमीन आत्मसम्मान का विषय है वही लूट गई  हैl आत्मसम्मान के लिए मरना भी पड़े तो मर जाना चाहिl

प्रफुल्ल बोला-बस्ती वालों को गांव समाज की जमीन पर बराबरी के हिस्से के लिए संघर्ष चाहिए तभी भूमिहीनता अभिशाप को धोया जा सकता है l

नारद बोले-गांव की जमीन पर सभी का बराबरी का हक है पर गांव की पूरी आबादी के दस प्रतिशत जमींदारों का अधिपत्य गांव की जमीन पर तो ही गांव समाज की जमीन पर भी जबरिया  कब्जा किये हुए हैं l

प्रफुल्ल बोला-हाँ काका हमारे लोगों को आत्मनिर्भरता के लिए,भूमिहीनता के अभिशाप से मुक्ति के लिए और सम्मान से जीने के लिए गांव से तहसीलदार, कलेक्टर, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक लिखित में आवाज़ पहुँचातें हुए शिक्षा,नौकरी,स्व-रोजगार,और जमीन पर अधिकार के लिए संघर्ष करते रहना होगा l

नारद बोले-हाँ बेटा चमारों की बस्ती के उद्धार के लिए करो या मरो के रास्ते पर चलना जरूरी हो गया  है l

प्रफुल्ल बोला-काका इस गांव में पचास परिवार चमारों के है,दस परिवार जमींदारों  के हैं,गांव की नब्बे फीसदी जमीन पर सवर्णों का एकाधिकार हैl

नारद बोले-बेटवा सामंतवादी नहीं चाहते,यदि जमींदार ग्राम प्रधानों ने चाहा होता तो चमारों के बस्ती की भूमिहीनता अभिशाप नहीं बनी रहती l सामंतवादी नहीं चाहते कि चमार भूमि मालिक बने, तरक्की करें,वे चाहते हैं कि चमार जमींदारों की गुलामी करते  रहेl 

प्रफुल्ल बोला -साजिश है काका l सोचो पूरे गांव की जमीन जमींदारों के कब्जे में हैं, गांव के पच्चास चमार परिवारों  के हिस्से गांव की पांच प्रतिशत  जमीन भी नही है l  

नारद बोले-चमार बहुल गांव के चमारों के  आगे बढ़ने के सारे रास्ते बंद है,क्रूर  

सामन्तवादी समाज चमारों और हाशिये पर पड़ी कौम को गुलामी की जंजीर में बांधे रखना चाहता है  l ये कितना  क्रूर समाज हो गया है?

प्रफुल्ल बोला - काका सामन्तवादियों की क्रूरता देखो ये लोग कहीं गांव समाज की जमीन पर  कहीं वृक्षारोपण कर डाले हैं l कहीं तालाब खुदवा लिए हैं  l कहीं मुर्गी फार्म, कहीं फिश फार्म बना लिए  हैं l कहीं गांव समाज  की जमीन पर खेती कर रहे हैं पर क्रूर-निर्दयी सामंतवादी आवन्टन तक नहीं होने दिए l

नारद बोले-बेटा जमीन के नन्हें-नन्हें टुकडो पर आवन्टन कर खानापूर्ति  कर दिए पर आज भी गांव समाज की जमींने सामन्तवादियों के कब्जे में है l चमार तो बस वोट बैंक भर है l

प्रफुल्ल बोला-हाँ काका चुनाव के समय में दलित और डॉ अम्बेडकर याद आते हैं, बाकी समय में दलितों का दमन होता है, डॉ अम्बेडकर की मूर्ति तोड़ने का काम होता  और संविधान बदलने के साजिशे चलती रहती हैं l

नारद बोले-हाँ काका सामंतवादियों ने जमीन से जुड़े चमारों को जमीन से ही बेदखल कर दिया है l 

प्रफुल्ल बोला-सरकार आम आदमी के लिए शिक्षा महंगी है l आरक्षण पर कैची चल रही है lसरकारी संस्थानों को निजी हाथों मे सौंपे जा रहे हैंl पांच  किलो मुफ्त अनाज देकर आत्मनिर्भरता का ढ़ोल पीट रहे  हैं l यह विकास  है या विनाश?

नारद बोले-आरक्षण पर बवाल मचा रहता है, देखो चमारों की इस बस्ती में आरक्षण कहाँ पहुँचा है? 

प्रफुल्ल बोला-काका  बस्ती के लोग अपने शारीरिक श्रम पर जीवित है l मुश्किल से जीवन चला पा रहे हैं l 

नारद बोले- बेटा सरकार ही नहीं चाहती कि छोटे तबके के लोग तरक्की करें, सरकारे चाहती है कि दलित आदिवासी उनके वोट बैंक बने रहे यही असली उनकी मंशा रहती है l देखो चमारों के गांव में कई घर सरकारी आवास नीति के तहत बने तो है परन्तु दीवारें ईंट की तो हैं पर छत लोहे या सीमेंट के चदरों की पक्की छत तक नहीं बन पायी है l छत भी कैसे पड़े अनुदान राशि का एक हिस्सा तो घुस में चला जाता है l क्या यही है, सब का साथ सब का विकास है?

प्रफुल्ल बोला-सच है काका, हर क्षेत्र में द्रोणाचार्य बैठे है,जो दलित-आदिवासी हाशिये के लोगों के हकों को दीमक की तरह  चाट रहे हैं l

नारद बोले -हाँ बेटा अब तो विकास नहीं, दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को गुलाम बनाने का चक्रव्यूह रचा जा रहा है तभी संविधान को बदलने की बात हो रही है l 

प्रफुल्ल बोला-काका अब तो सरकार का मकसद चुनाव जीतना, सत्ता पर बने  रहना भर रह गया है, समानता,समान शिक्षा,समान चिकित्सा और रोजगार से कोई मतलब नहीं है l

नारद बोले-आजाद देश, संविधान और  लोकतंत्र के होते हुए भी तरक्की से दूर बैठी चमार एवं ऐसी कई जातियाँ,भूमिहीनता और बेरोजगारी का दर्द झेल रही हैं l  

गांव की सरकारी की जमीन से  चमारों  की भूमिहीनता का अभिशाप कट सकता है पर क्रूर समाज के लोग मालिक खुद बने बैठे हैंl

प्रफुल्ल बोला-चमारों की बस्ती से विकास अभी बहुत दूर है l काका शोषित समाज को अपनी नसीब लिखना नहीं खुद बदलना होगा l 

नारद काका बोले -बेटवा हमने ज़िंदगी भर छुआछूत और भूमिहीनता का विषपान किया है l चमारों की अनेकों पीढ़ियां जातिवाद को अपनी किस्मत मान बैठी थी, मैंने भी यही मानने लिया था पर बेटवा तुम कह रहे हो कि  किस्मत लिखी नहीं, बदली जा सकती है।

प्रफुल्ल बोला-काका,चमारों की बस्ती की पीड़ा ही  खुली किताब की तरह है परन्तु अंधे-बहरे शासन को न तो दिखाई पड़ रहा ना सुनाई,किस्मत बदलने के लिए जिम्मेदारों  दिखाना और सुनाना पड़ेगा l

सूरज डूब चुका  था। नारद काका की पलकें गीली हो चुकी थी, प्रफुल्ल की बातों  को सुनकर नारद काका को लगा कि चमारों की  यह बस्ती केवल दुख की कहानी नहीं, बदलाव की कहानी लिखेगी । 

नारद काका गहरी साँस लेते हुए बोले—बेटा प्रफुल्ल चमारों के बस्ती की अगर किस्मत बदल गयी तो बस्ती वालों की पीड़ा और चुप्पी इतिहास बन जाएगी। अब नारद काका को यकीन हो गया था कि चमारों की बस्ती का विकास चुप्पी से नहीं, सवाल पूछने,आवाज़ उठाने से होगाl चमार समाज को मृत समाज नहीं जागृत समाज बनना है l

नारद काका के आत्मविश्वास को देखकर प्रफुल्ल मुस्कराया, उसकी  मुस्कान में अच्छे भविष्य का सपना था वह बोला काका चमारों की बस्ती को दुःख की कहानी नहीं अब बदलाव की कहानी लिखना है l

नन्दलाल भारती 

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