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चक्की वाली अम्मा

 

चक्की वाली अम्मा/नन्दलाल भारती

रात के करीब दस बज रहे होंगे l तख्त पर बैठी थी l चक्की अभी चालू थी l अम्मा खुद,अब आटा नहीं पिसती l अम्मा का  बेटा गौरी चक्की चलाता है l

अम्मा की महफ़िल चक्की के बगल में एक तख्त जमीं रहती है l अम्मा निहाल होकर ठहाके लगाती है, खुश होकर जीती हैl अम्मा की खुशी देखकर आज के अवसाद ग्रस्त लोगों को तो यक़ीनन जलन होती होगी l अम्मा की खुशी के पीछे का दर्द रुला देने वाला है पर अम्मा ने दर्द को खुद पर हावी नहीं होने दी, खुद हर गम, हर दर्द को अम्मा ने दबोच लिया है l अम्मा दर्द पर जीत हासिल कर खुश रहने का गुर सीख गयीं हैं l अम्मा जब ब्याह कर आयी थी तो उसकी जिंदगी हसीन और रंगीन थी l इतनी सुंदर थी कि  जवान लडके क्या  अगल-बगल के अधेड़ भी पालादेवी का दर्शन पाने के लिए ललचाये रहते थे l

कच्ची बस्ती में बलदेव का घर था,बलदेव कोई और नहीं पालादेवी का पति था l इसी  बलदेव के साथ पालादेवी अग्नि के साथ फेरे लेकर  सुहागिन बनी थी l बलदेव ने चुटकी भर सिंधुर पालादेवी की मांग में सजाकर अपनी अर्धांगिनी बना लिया था  l पालादेवी चुटकी भर सिंधुर में बलदेव की दुल्हनिया हो गयी थी l

पति-पत्नी का जीवन सुख से चल रहा थाl पाला देवी की गोंद में ब्याह के दो साल बाद ही एक सूरजमुखी जैसी सुन्दर  बिटिया गोल्डी आ गयी,पालादेवी जैसी खूबसूरत l बलदेव किसी कम्पनी में नौकरी करता था, कुछ पढ़ा लिखा भी था पर पालादेवी अनपढ़ लेकिन सुन्दर किसी हीरोइन जैसी थी अपनी उम्र मेंl घर चलाने के लिए तो बलदेव नौकरी कर ही रहा थाl बलदेव की कमाई खानखर्च बढ़िया से चल रहा था l

पालादेवी भारतीय गृहणि थी, बचत भी कर लेती थी परिवार के लिए l

पालादेवी घर का काम,चूल्हा-चौका करती, अब तो गोंद में गोल्डी भी थी, उसकी देखरेख, लालन-पालन पालादेवी बड़ी शिद्द्त से कर रही थी l

पालादेवी दिन के उजाले में पति के सामने भी बीता भर का घुंघट करती थी l चिमनी की मंद-मंद रोशनी में पति की खुशी के लिए वस्त्रहीन होने में भी उसे कोई परहेज  नहीं  था पर ना बेशर्म थी ना निर्लज l पति के साथ पत्नी धर्म निभाने में काहे की शर्म l

पालादेवी को सामाजिक मर्यादा में रहना बहुत पसंद था l कच्ची बस्ती में उसकी इज्जत थी l अक्सर बस्ती की शादी लायक बेटों की माताएँ पालादेवी जैसी पतोहू की कामना करती थी l

पालादेवी थी तन से मन से और कर्म से भी सुंदर और  घर को मंदिर बनाने वाली,उसके आते ही बलदेव के घर परिवार में संवृद्धि आने लगी थी l भले ही पालादेवी का घर कच्ची बस्ती में था पर साफ-सफाई और उसके घर में करीने से सजे सामान मन लुभाते थी l 

पालादेवी भी खूब लुभावनी थी, गोल्डी तनिक चलने लायक हुई ही थी कि नहीं बलदेव ने पालादेवी की कोख में गौरी को डाल दिया था l गोल्डी अभी मुश्किल से चौथे साल की उम्र में पहुंची ही थी की गौरी आ गया l

 पालादेवी के पेट में गौरी के आने के बाद  बलदेव में बदलाव आने लगा था,शायद किसी सुन्दर बाहरवाली के संपर्क में आ गया था l बेटा गौरी जमीन पर कदम भी ठीक से रखना सीख भी नहीं पाया था तभी बलदेव किसी ब्यूटीफुल यंग लेडी के साथ फरार हो गया, फिर कभी नहीं लौटा l

पालादेवी के सामने बड़ा संकट आ गया था l दो बच्चों को पालना यंगऐज की पालादेवी ने किसी को सरेंडर नहीं किया l कच्ची बस्ती थी, आबादी बहुत थी, पालादेवी का घर भी मुख्य सड़क पर था, चलता सड़क थी l

पालादेवी रोना रोने नहीं बैठी, मांग से सिंधुर पोंछ फ़ेंकी,और जीवन-संघर्ष के लिए कमर कसकर खड़ी हो गयीl पालादेवी ने न तो झाड़ू-पोंछा का किया न कोई किसी की गुलामी l अपना मंगलसूत्र और जो गहने थे बेचकर आटा चक्की  खड़ी कर दी,उसकी चक्की चल पड़ी, अब पालादेवी उद्यमी थी l बेटी गोल्डी और गौरी कुछ पढ़ाई भी कर लिए l 

पालादेवी बेटी-बेटा की शादी रजगज कर  दी अब पालादेवी की गोंद में नाती-पोते खेल रहे हैं l गौरी आटाचक्की संभालता हैं l पालादेवी के ठहाके  भी गूंजते हैं, शायद यही कह रहे हार मत मानो आगे बढ़ो सफलता तुम्हारा इंतजार कर रही है l

कच्ची बस्ती पूरी पक्की हो चुकी है, चक्की के सामने से टूलेन सड़क जा रही है l गौरी आटा पीसने में व्यस्त रहता है l पालादेवी की उपस्थिति तख्त पर रहती है, वही पालादेवी अब चक्की वाली अम्मा के नाम से पहचानी जाती हैं l  पाला देवी की सफलता की कहानी उदाहरण उन महिलाओ के लिए जो कोई मुशिकल आने पर टूट कर बिखर जाती है, पर पालादेवी टूटी नहीं हार नहीं मानी एक मिशाल कायम कर दी है l मेरे मन में विचारों के सावन-भादों उमड़-घुमड़ रहे थे, इतने में श्रीमती जी आ धमकी और पूछी क्या सोच रहे नरेश्वर साहब?

मैंने बोला पालादेवी......... बस इतना ही मुंह से निकला था l

इतने में झट से नलिनी बोली-पालादेवी नहीं चक्की वाली अम्मा!

दोस्तों यह कहानी यही तक l

नन्दलाल भारती

10/08/2025



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