बुजुर्ग आदमी,
हम बढ़ती उम्र के इंसान है,
हमने तो अपने बुजुर्गो से सीखा है
सम्मान से जीओ और जीने दो,हमें यही सिखाये हैं
पांव-जब-जब डगमगाया अपना
दादा-दादी, माई-बाप हाथ बढ़ाये थे अपना l
बड़े उम्र के आदमी, जिसने हाथ थामा था
संघर्ष उनका,जीवन अपना सहज बनाया
आज हम हो रहे बुजुर्ग साहब
सामने वृद्धाश्रम, अनाथ आश्रम
बनते जा रहे हम कोने का अटाला
समझो जमाने की नब्ज क्यों अक्ल पर ताला l
क्यों हम बूढ़े कहे जा रहे पुराने फर्नीचर
अपने हाथ छटकते अपने-अपने
मतलब था जब तक सगे हम थे उनके
धुंधली रोशनी में, बिखरे अपने सपने
हम भी युवा थे अपनी भी है गाथा
आँख-ठेहुना बने अपना यही तो अभिलाषा l
हमें दया नहीं चाहिए,ज्ञान की मोटरी पर ना माथ
गंजा सिर सफ़ेद बाल,तन की झुर्रियां अपने
कहती संघर्ष और सफलता की गाथा अपने
बुजुर्ग ना जानें क्यूँ जहां को न भाते अपने
बुजुर्ग पैसठ का या पचासी सीख और आशीष
स्वीकारों जहां वालों बुजुर्ग कुदरत का है बखशीश l
हम बुजुर्ग क्या चाहिए ?
दो रोटी छाँव तो अपनी, तनिक भाषा
हम बुजुर्ग भूखे,करते विहसते अपनेपन का आशा
ख्वाहिश,सुखी-संवृद्ध,हर्षित परिवार
बचा रहे स्वाभिमान
अपनी जहां से क्या चाहे?
बुजुर्ग आदमी?
यही ना?
अपनों का साथ,मन-मन भर सम्मान l
नन्दलाल भारती
21/08/2025
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