भूमिहीनों के अधिकार और विकास
— नन्दलाल भारती
कविता, कथाकार एवं सामाजिक चिंतक
****
जिस मिट्टी को सींचा, उस पर अधिकार क्यों नहीं?-भारत की सभ्यता का एक बड़ा हिस्सा खेतों की मेड़ों, मिट्टी की गंध और श्रम से उपजी फसलों के बीच विकसित हुआ है। किसान और खेतिहर मजदूर ने सदियों से धरती को अपने श्रम से सींचा है। उसके पसीने से अन्न पैदा हुआ, गाँवों की अर्थव्यवस्था चली और शहरों की भूख मिटती रही,फिर भी विडंबना यह है कि खेत में सबसे अधिक श्रम करने वाला व्यक्ति अनेक बार उसी खेत का मालिक नहीं मज़दूर होता है ।
वह मिट्टी को जानता है, उसके मौसम को पहचानता है, बीज के व्यवहार को समझता है, फसल की नमी को हथेली से महसूस करता है और सूखे तथा बारिश के बीच अपनी मेहनत से जीवन बचाता है; लेकिन उसके पास अपनी खेती योग्य जमीन नहीं होती। वह दूसरों की जमीन पर श्रम करता है और अपनी जिंदगी की जमीन तलाशता रहता है।
यहीं से भूमिहीनता का प्रश्न जन्म लेता है-भूमिहीनता केवल भूमि के एक टुकड़े से वंचित होना नहीं है। यह आय की असुरक्षा, रोजगार की अनिश्चितता, सामाजिक निर्भरता, आवास की समस्या, शिक्षा के सीमित अवसर और अगली पीढ़ी के भविष्य की चिंता से जुड़ा प्रश्न है। ग्रामीण समाज में भूमि कई बार आर्थिक संपत्ति के साथ-साथ सामाजिक सम्मान, आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की क्षमता का आधार भी बनती हैl भूमिहीनों के अधिकार की बात करना केवल जमीन बाँटने की बात नहीं है। यह उस व्यवस्था को बदलने की बात है जिसमें श्रम करने वाला व्यक्ति उत्पादन की प्रक्रिया में आवश्यक तो है, लेकिन विकास के लाभ में उसका हिस्सा अतिसीमित रह जाता है।
भूमिहीनता : गरीबी की जड़ या उसका एक चेहरा?-भारत में गरीबी को समझने के लिए केवल आय को आधार बनाना पर्याप्त नहीं है। गरीबी में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, स्वच्छता, रोजगार और जीवन की सुरक्षा जैसे अनेक आयाम शामिल हैं।
भूमिहीन परिवारों की स्थिति इस दृष्टि से अधिक जटिल हो सकती है। जिसके पास भूमि जैसी उत्पादक परिसंपत्ति नहीं है, उसकी आय मुख्यतः श्रम पर निर्भर होती है। कृषि का मौसम समाप्त हुआ तो काम कम; बीमारी आई तो आय बंद; परिवार में कोई संकट आया तो कर्ज की आवश्यकता; फसल का मौसम आया तो मजदूरी की उम्मीद—ऐसी अस्थिरता गरीब परिवार के जीवन को लगातार असुरक्षित बनाए रखती है।
नीति आयोग के राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक ने भी भारत में गरीबी को केवल आय के बजाय अनेक सामाजिक आयामों से मापने की आवश्यकता पर बल दिया है। यही दृष्टिकोण भूमिहीन परिवारों के विकास पर भी लागू होता है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “भूमिहीनों को कितनी सहायता दी गई?”
बड़ा प्रश्न होना चाहिए—
“भूमिहीन परिवारों को ऐसा कौन-सा स्थायी आधार मिला, जिससे वे सहायता पर निर्भर रहने के बजाय अपने पैरों पर खड़े हो सकें?”
उत्तर प्रदेश : विशाल आबादी के बीच भूमिहीनता की चुनौती-
उत्तर प्रदेश भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना का अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य है। यहाँ कृषि आज भी बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका से जुड़ी है। छोटे और सीमांत किसान तथा खेतिहर मजदूर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं।
लेकिन राज्य के सभी क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति समान नहीं है। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और अन्य पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी, सीमित रोजगार, छोटी जोत, सिंचाई की असमानता और गैर-कृषि अवसरों की कमी जैसी समस्याएँ अलग-अलग रूपों में दिखाई देती हैं।
नीति आयोग के 2019-21 के बहुआयामी गरीबी आँकड़ों में उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में गरीबी की स्थिति विशेष रूप से गंभीर दिखाई देती है। बहराइच में बहुआयामी गरीबी का अनुपात 41.55 प्रतिशत, श्रावस्ती में 40.37 प्रतिशत और बलरामपुर में 40.15 प्रतिशत दर्ज किया गया था।
इन आँकड़ों को भूमिहीनता का सीधा माप नहीं माना जा सकता, लेकिन वे ग्रामीण वंचना की गंभीरता का संकेत देते हैं।
उत्तर प्रदेश की चुनौती यह है कि बड़ी ग्रामीण आबादी को केवल कृषि मजदूरी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। कृषि में यंत्रीकरण, छोटी जोत, मौसमी रोजगार और बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कारण खेतिहर मजदूरों के लिए वर्षभर काम सुनिश्चित करना आवश्यक है।
— नन्दलाल भारती
कविता, कथाकार एवं सामाजिक चिंतक
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जिस मिट्टी को सींचा, उस पर अधिकार क्यों नहीं?-भारत की सभ्यता का एक बड़ा हिस्सा खेतों की मेड़ों, मिट्टी की गंध और श्रम से उपजी फसलों के बीच विकसित हुआ है। किसान और खेतिहर मजदूर ने सदियों से धरती को अपने श्रम से सींचा है। उसके पसीने से अन्न पैदा हुआ, गाँवों की अर्थव्यवस्था चली और शहरों की भूख मिटती रही,फिर भी विडंबना यह है कि खेत में सबसे अधिक श्रम करने वाला व्यक्ति अनेक बार उसी खेत का मालिक नहीं मज़दूर होता है ।
वह मिट्टी को जानता है, उसके मौसम को पहचानता है, बीज के व्यवहार को समझता है, फसल की नमी को हथेली से महसूस करता है और सूखे तथा बारिश के बीच अपनी मेहनत से जीवन बचाता है; लेकिन उसके पास अपनी खेती योग्य जमीन नहीं होती। वह दूसरों की जमीन पर श्रम करता है और अपनी जिंदगी की जमीन तलाशता रहता है।
यहीं से भूमिहीनता का प्रश्न जन्म लेता है-भूमिहीनता केवल भूमि के एक टुकड़े से वंचित होना नहीं है। यह आय की असुरक्षा, रोजगार की अनिश्चितता, सामाजिक निर्भरता, आवास की समस्या, शिक्षा के सीमित अवसर और अगली पीढ़ी के भविष्य की चिंता से जुड़ा प्रश्न है। ग्रामीण समाज में भूमि कई बार आर्थिक संपत्ति के साथ-साथ सामाजिक सम्मान, आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की क्षमता का आधार भी बनती हैl भूमिहीनों के अधिकार की बात करना केवल जमीन बाँटने की बात नहीं है। यह उस व्यवस्था को बदलने की बात है जिसमें श्रम करने वाला व्यक्ति उत्पादन की प्रक्रिया में आवश्यक तो है, लेकिन विकास के लाभ में उसका हिस्सा अतिसीमित रह जाता है।
भूमिहीनता : गरीबी की जड़ या उसका एक चेहरा?-भारत में गरीबी को समझने के लिए केवल आय को आधार बनाना पर्याप्त नहीं है। गरीबी में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, स्वच्छता, रोजगार और जीवन की सुरक्षा जैसे अनेक आयाम शामिल हैं।
भूमिहीन परिवारों की स्थिति इस दृष्टि से अधिक जटिल हो सकती है। जिसके पास भूमि जैसी उत्पादक परिसंपत्ति नहीं है, उसकी आय मुख्यतः श्रम पर निर्भर होती है। कृषि का मौसम समाप्त हुआ तो काम कम; बीमारी आई तो आय बंद; परिवार में कोई संकट आया तो कर्ज की आवश्यकता; फसल का मौसम आया तो मजदूरी की उम्मीद—ऐसी अस्थिरता गरीब परिवार के जीवन को लगातार असुरक्षित बनाए रखती है।
नीति आयोग के राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक ने भी भारत में गरीबी को केवल आय के बजाय अनेक सामाजिक आयामों से मापने की आवश्यकता पर बल दिया है। यही दृष्टिकोण भूमिहीन परिवारों के विकास पर भी लागू होता है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “भूमिहीनों को कितनी सहायता दी गई?”
बड़ा प्रश्न होना चाहिए—
“भूमिहीन परिवारों को ऐसा कौन-सा स्थायी आधार मिला, जिससे वे सहायता पर निर्भर रहने के बजाय अपने पैरों पर खड़े हो सकें?”
उत्तर प्रदेश : विशाल आबादी के बीच भूमिहीनता की चुनौती-
उत्तर प्रदेश भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना का अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य है। यहाँ कृषि आज भी बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका से जुड़ी है। छोटे और सीमांत किसान तथा खेतिहर मजदूर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं।
लेकिन राज्य के सभी क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति समान नहीं है। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और अन्य पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी, सीमित रोजगार, छोटी जोत, सिंचाई की असमानता और गैर-कृषि अवसरों की कमी जैसी समस्याएँ अलग-अलग रूपों में दिखाई देती हैं।
नीति आयोग के 2019-21 के बहुआयामी गरीबी आँकड़ों में उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में गरीबी की स्थिति विशेष रूप से गंभीर दिखाई देती है। बहराइच में बहुआयामी गरीबी का अनुपात 41.55 प्रतिशत, श्रावस्ती में 40.37 प्रतिशत और बलरामपुर में 40.15 प्रतिशत दर्ज किया गया था।
इन आँकड़ों को भूमिहीनता का सीधा माप नहीं माना जा सकता, लेकिन वे ग्रामीण वंचना की गंभीरता का संकेत देते हैं।
उत्तर प्रदेश की चुनौती यह है कि बड़ी ग्रामीण आबादी को केवल कृषि मजदूरी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। कृषि में यंत्रीकरण, छोटी जोत, मौसमी रोजगार और बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कारण खेतिहर मजदूरों के लिए वर्षभर काम सुनिश्चित करना आवश्यक है।
उत्तर प्रदेश की चुनौती यह है कि बड़ी ग्रामीण आबादी को केवल कृषि मजदूरी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। कृषि में यंत्रीकरण, छोटी जोत, मौसमी रोजगार और बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कारण खेतिहर मजदूरों के लिए वर्षभर काम सुनिश्चित करना आवश्यक है।
यदि किसी व्यक्ति को वर्ष में कुछ महीनों तक ही खेत में मजदूरी मिलती है और बाकी समय वह बेरोजगार अथवा अल्परोजगार रहता है, तो उसकी गरीबी केवल मजदूरी बढ़ाने से समाप्त नहीं होगी।
उसे वर्षभर की आजीविका चाहिए।
बिहार : भूमि, श्रम और गरीबी का गहरा संबंध:
बिहार में भूमि और गरीबी का संबंध और अधिक जटिल दिखाई देता है। राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था लंबे समय से कृषि पर निर्भर रही है। बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार छोटे जोत, बटाई, कृषि मजदूरी और असंगठित रोजगार पर निर्भर हैं।
नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार 2019-21 में अररिया में बहुआयामी गरीबी का अनुपात 52.07 प्रतिशत, पूर्णिया में 50.70 प्रतिशत और सुपौल में 50.64 प्रतिशत था। सहरसा में यह 49 प्रतिशत और मधेपुरा में 45.78 प्रतिशत दर्ज किया गया।
ये आँकड़े बिहार के अनेक क्षेत्रों में मौजूद बहुआयामी वंचना की तस्वीर सामने रखते हैं।
लेकिन यहाँ भी सावधानी जरूरी है—गरीबी का प्रतिशत भूमिहीन परिवारों का प्रतिशत नहीं है। दोनों अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। फिर भी भूमि और उत्पादक परिसंपत्तियों की कमी ग्रामीण गरीबी और आर्थिक असुरक्षा को बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक हो सकती है।
बिहार का अनुभव यह सवाल उठाता है कि यदि व्यक्ति खेती करता है लेकिन उसके पास सुरक्षित पट्टा नहीं है, यदि वह खेत में श्रम करता है लेकिन उसके पास उत्पादन के साधनों तक स्थायी पहुँच नहीं है, यदि वह फसल पैदा करता है लेकिन संस्थागत ऋण और बाजार से दूर है—तो उसके विकास की कल्पना कैसे की जाए?
यहीं भूमि-अधिकार और आजीविका-अधिकार एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
खेत उसका, श्रम उसका—फिर सुरक्षा किसकी?
भूमिहीन खेतिहर मजदूर का जीवन एक विडंबना को सामने लाता है।
वह खेत तैयार करता है।
वह बीज डालता है।
वह सिंचाई /निराई करता है।
वह फसल काटता है।
वह मड़ाई करता है l
वह बोझ ढोता है।
वह अनाज के ढेर को खड़ा करता है।
लेकिन फसल बेचने के बाद उसके हाथ में अक्सर केवल मजदूरी बचती है।
यहाँ प्रश्न किसी व्यक्ति या वर्ग विशेष के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है। प्रश्न व्यवस्था की उस संरचना को समझना है जिसमें श्रम और संपत्ति का संबंध असमान हो सकता है।
इस असमानता का समाधान टकराव में नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण अवसरों में है।
भूमिहीन व्यक्ति को मालिक बनाने का हर मॉडल हर जगह संभव नहीं हो सकता। लेकिन उसे सुरक्षित पट्टेदारी, सामुदायिक खेती, उत्पादक परिसंपत्ति, संस्थागत ऋण, कौशल, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा देकर उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत की जा सकती है।
क्या हर भूमिहीन को जमीन देना ही समाधान है?
यह प्रश्न भावनात्मक भी है और व्यावहारिक भी।
भारत में कृषि भूमि सीमित है।बहुत सारी जमीन -मंदिर -मस्जिद के कब्जे में है जनसंख्या का भारी दबाव है और अनेक क्षेत्रों में भूमि पहले ही अत्यधिक विभाजित हो चुकी है। इसलिए हर भूमिहीन परिवार को पर्याप्त कृषि भूमि उपलब्ध कराना हर स्थान पर संभव नहीं है।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि भूमिहीनता को नियति मान लिया जाए।
जहाँ सरकारी, सीलिंग अथवा अन्य वैधानिक रूप से उपलब्ध भूमि का वितरण संभव हो, वहाँ पात्र भूमिहीन परिवारों को पारदर्शी तरीके से भूमि दी जानी चाहिए।
जहाँ कृषि भूमि उपलब्ध न हो, वहाँ समाधान के दूसरे रास्ते विकसित करने होंगे—
आवासीय भूमि, सुरक्षित पट्टेदारी, सामुदायिक संसाधनों तक न्यायपूर्ण पहुँच, पशुपालन, ग्रामीण उद्योग, कौशल आधारित रोजगार, छोटे उद्यम और सामाजिक सुरक्षा।
भूमि-अधिकार की अवधारणा को इसलिए केवल मालिकाना हक तक सीमित करना उचित नहीं होगा।
सुरक्षित पट्टेदारी : एक महत्वपूर्ण रास्ता
कई गरीब ग्रामीण परिवार स्वयं की जमीन के अभाव में दूसरों की जमीन पर खेती करते हैं। यदि ऐसी खेती अनौपचारिक व्यवस्था पर निर्भर हो और खेती करने वाले व्यक्ति के पास कोई वैधानिक सुरक्षा न हो, तो उसे ऋण, बीमा और सरकारी सहायता प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है।
नीति आयोग की कृषि भूमि लीजिंग संबंधी रिपोर्ट ने भी सुरक्षित और वैध कृषि पट्टेदारी की आवश्यकता पर बल दिया है।
इसलिए ऐसी व्यवस्था आवश्यक है जिसमें—
- भूमि मालिक का अधिकार सुरक्षित रहे,
- खेती करने वाले का अधिकार सुरक्षित रहे,
- पट्टा स्पष्ट और वैधानिक हो,
- किसान को संस्थागत ऋण मिल सके,
- फसल बीमा और अन्य सुविधाओं तक पहुँच हो,
- विवाद की स्थिति में त्वरित समाधान मिल सके।
यह व्यवस्था भूमि-मालिक और भूमिहीन कृषक के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि विश्वास और आर्थिक साझेदारी का आधार बन सकती है।
भूमिहीनों को मजदूर से उत्पादक बनाना होगा
किसी भी समाज में मजदूरी सम्मानजनक होनी चाहिए। खेतिहर मजदूर का श्रम राष्ट्र निर्माण का हिस्सा है। इसलिए न्यूनतम मजदूरी, समय पर भुगतान, सुरक्षित कार्य वातावरण और सामाजिक सुरक्षा उसकी बुनियादी जरूरतें हैं।
लेकिन केवल मजदूरी बढ़ाने से स्थायी आर्थिक स्वतंत्रता नहीं आएगी।
भूमिहीन परिवार को ऐसी परिसंपत्तियाँ और अवसर देने होंगे जिनसे उसकी आय के अनेक स्रोत बनें।
उदाहरण के लिए—
एक परिवार कृषि मजदूरी के साथ पशुपालन कर सके।
महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़कर खाद्य प्रसंस्करण कर सके।
युवा कौशल प्रशिक्षण लेकर स्थानीय उद्योग में काम कर सके।
परिवार का कोई सदस्य डिजिटल अथवा सेवा-आधारित छोटा व्यवसाय शुरू कर सके।
सामुदायिक स्तर पर समूह खेती या उत्पादन-सहकारी संस्था बनाई जा सके।
इस तरह भूमिहीन परिवार की आर्थिक पहचान केवल “मजदूर” तक सीमित नहीं रहेगी।
मनरेगा से आगे : रोजगार की स्थायी संरचना-
मनरेगा ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन ग्रामीण विकास की दीर्घकालीन रणनीति यह होनी चाहिए कि मनरेगा से बने श्रम और परिसंपत्तियाँ गाँव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करें।
तालाब बनें तो सिंचाई बढ़े।
जल-संरक्षण हो तो खेती मजबूत हो।
वृक्षारोपण हो तो पर्यावरण और आजीविका दोनों सुधरें।
ग्रामीण सड़क बने तो बाजार तक पहुँच बढ़े।
सामुदायिक संसाधन विकसित हों तो पशुपालन और अन्य गतिविधियों को आधार मिले।
अर्थात रोजगार और विकास को अलग-अलग नहीं, एक-दूसरे का पूरक बनाना होगा।
भूमि से बड़ा है शिक्षा का अधिकार-
यदि भूमिहीन परिवार की अगली पीढ़ी भी उसी मजदूरी पर निर्भर रह जाए तो भूमि-अभाव एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चला जाएगा।
इस चक्र को तोड़ने का सबसे शक्तिशाली माध्यम शिक्षा है।
एक खेतिहर मजदूर का बच्चा यदि डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर, वकील, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी, तकनीशियन, उद्यमी या लेखक बन सकता है तो परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति बदल सकती है।
इसलिए गरीब परिवारों के बच्चों के लिए केवल प्राथमिक शिक्षा नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण और निरंतर शिक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
विद्यालय तक पहुँच, छात्रवृत्ति, छात्रावास, डिजिटल सुविधा, उच्च शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण—इन सभी को एक साथ देखना होगा।
गरीबी के विरुद्ध सबसे प्रभावी लड़ाई वह है जिसमें एक पीढ़ी अपने बच्चों को गरीबी से बाहर निकलने का अवसर देती है।
महिलाओं के बिना भूमिहीनों का विकास अधूरा-
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाएँ अदृश्य श्रम की सबसे बड़ी वाहक हैं।
वे खेत में काम करती हैं, पशुओं की देखभाल करती हैं, घर संभालती हैं, बच्चों का पालन करती हैं और कई बार परिवार की आय में पुरुषों के बराबर योगदान देती हैं।
फिर भी संपत्ति और निर्णय लेने में उनका हिस्सा कमजोर रह सकता है।
भूमिहीन परिवारों के विकास की योजनाओं में महिलाओं को केंद्र में रखना होगा।
आवासीय भूमि अथवा संपत्ति के अधिकार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना, स्वयं सहायता समूहों को उत्पादन से जोड़ना, महिला उद्यमिता को ऋण देना और उनके कौशल का आर्थिक उपयोग करना ग्रामीण परिवार की पूरी आर्थिक स्थिति बदल सकता है।
जब महिला आर्थिक रूप से मजबूत होती है, तो उसका लाभ केवल महिला को नहीं, पूरे परिवार को मिलता है।
भूमिहीनता और पलायन-
यदि किसी व्यक्ति को वर्ष में कुछ महीनों तक ही खेत में मजदूरी मिलती है और बाकी समय वह बेरोजगार अथवा अल्परोजगार रहता है, तो उसकी गरीबी केवल मजदूरी बढ़ाने से समाप्त नहीं होगी।
उसे वर्षभर की आजीविका चाहिए।
बिहार : भूमि, श्रम और गरीबी का गहरा संबंध:
बिहार में भूमि और गरीबी का संबंध और अधिक जटिल दिखाई देता है। राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था लंबे समय से कृषि पर निर्भर रही है। बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार छोटे जोत, बटाई, कृषि मजदूरी और असंगठित रोजगार पर निर्भर हैं।
नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार 2019-21 में अररिया में बहुआयामी गरीबी का अनुपात 52.07 प्रतिशत, पूर्णिया में 50.70 प्रतिशत और सुपौल में 50.64 प्रतिशत था। सहरसा में यह 49 प्रतिशत और मधेपुरा में 45.78 प्रतिशत दर्ज किया गया।
ये आँकड़े बिहार के अनेक क्षेत्रों में मौजूद बहुआयामी वंचना की तस्वीर सामने रखते हैं।
लेकिन यहाँ भी सावधानी जरूरी है—गरीबी का प्रतिशत भूमिहीन परिवारों का प्रतिशत नहीं है। दोनों अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। फिर भी भूमि और उत्पादक परिसंपत्तियों की कमी ग्रामीण गरीबी और आर्थिक असुरक्षा को बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक हो सकती है।
बिहार का अनुभव यह सवाल उठाता है कि यदि व्यक्ति खेती करता है लेकिन उसके पास सुरक्षित पट्टा नहीं है, यदि वह खेत में श्रम करता है लेकिन उसके पास उत्पादन के साधनों तक स्थायी पहुँच नहीं है, यदि वह फसल पैदा करता है लेकिन संस्थागत ऋण और बाजार से दूर है—तो उसके विकास की कल्पना कैसे की जाए?
यहीं भूमि-अधिकार और आजीविका-अधिकार एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
खेत उसका, श्रम उसका—फिर सुरक्षा किसकी?
भूमिहीन खेतिहर मजदूर का जीवन एक विडंबना को सामने लाता है।
वह खेत तैयार करता है।
वह बीज डालता है।
वह सिंचाई /निराई करता है।
वह फसल काटता है।
वह मड़ाई करता है l
वह बोझ ढोता है।
वह अनाज के ढेर को खड़ा करता है।
लेकिन फसल बेचने के बाद उसके हाथ में अक्सर केवल मजदूरी बचती है।
यहाँ प्रश्न किसी व्यक्ति या वर्ग विशेष के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है। प्रश्न व्यवस्था की उस संरचना को समझना है जिसमें श्रम और संपत्ति का संबंध असमान हो सकता है।
इस असमानता का समाधान टकराव में नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण अवसरों में है।
भूमिहीन व्यक्ति को मालिक बनाने का हर मॉडल हर जगह संभव नहीं हो सकता। लेकिन उसे सुरक्षित पट्टेदारी, सामुदायिक खेती, उत्पादक परिसंपत्ति, संस्थागत ऋण, कौशल, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा देकर उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत की जा सकती है।
क्या हर भूमिहीन को जमीन देना ही समाधान है?
यह प्रश्न भावनात्मक भी है और व्यावहारिक भी।
भारत में कृषि भूमि सीमित है।बहुत सारी जमीन -मंदिर -मस्जिद के कब्जे में है जनसंख्या का भारी दबाव है और अनेक क्षेत्रों में भूमि पहले ही अत्यधिक विभाजित हो चुकी है। इसलिए हर भूमिहीन परिवार को पर्याप्त कृषि भूमि उपलब्ध कराना हर स्थान पर संभव नहीं है।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि भूमिहीनता को नियति मान लिया जाए।
जहाँ सरकारी, सीलिंग अथवा अन्य वैधानिक रूप से उपलब्ध भूमि का वितरण संभव हो, वहाँ पात्र भूमिहीन परिवारों को पारदर्शी तरीके से भूमि दी जानी चाहिए।
जहाँ कृषि भूमि उपलब्ध न हो, वहाँ समाधान के दूसरे रास्ते विकसित करने होंगे—
आवासीय भूमि, सुरक्षित पट्टेदारी, सामुदायिक संसाधनों तक न्यायपूर्ण पहुँच, पशुपालन, ग्रामीण उद्योग, कौशल आधारित रोजगार, छोटे उद्यम और सामाजिक सुरक्षा।
भूमि-अधिकार की अवधारणा को इसलिए केवल मालिकाना हक तक सीमित करना उचित नहीं होगा।
सुरक्षित पट्टेदारी : एक महत्वपूर्ण रास्ता
कई गरीब ग्रामीण परिवार स्वयं की जमीन के अभाव में दूसरों की जमीन पर खेती करते हैं। यदि ऐसी खेती अनौपचारिक व्यवस्था पर निर्भर हो और खेती करने वाले व्यक्ति के पास कोई वैधानिक सुरक्षा न हो, तो उसे ऋण, बीमा और सरकारी सहायता प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है।
नीति आयोग की कृषि भूमि लीजिंग संबंधी रिपोर्ट ने भी सुरक्षित और वैध कृषि पट्टेदारी की आवश्यकता पर बल दिया है।
इसलिए ऐसी व्यवस्था आवश्यक है जिसमें—
- भूमि मालिक का अधिकार सुरक्षित रहे,
- खेती करने वाले का अधिकार सुरक्षित रहे,
- पट्टा स्पष्ट और वैधानिक हो,
- किसान को संस्थागत ऋण मिल सके,
- फसल बीमा और अन्य सुविधाओं तक पहुँच हो,
- विवाद की स्थिति में त्वरित समाधान मिल सके।
यह व्यवस्था भूमि-मालिक और भूमिहीन कृषक के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि विश्वास और आर्थिक साझेदारी का आधार बन सकती है।
भूमिहीनों को मजदूर से उत्पादक बनाना होगा
किसी भी समाज में मजदूरी सम्मानजनक होनी चाहिए। खेतिहर मजदूर का श्रम राष्ट्र निर्माण का हिस्सा है। इसलिए न्यूनतम मजदूरी, समय पर भुगतान, सुरक्षित कार्य वातावरण और सामाजिक सुरक्षा उसकी बुनियादी जरूरतें हैं।
लेकिन केवल मजदूरी बढ़ाने से स्थायी आर्थिक स्वतंत्रता नहीं आएगी।
भूमिहीन परिवार को ऐसी परिसंपत्तियाँ और अवसर देने होंगे जिनसे उसकी आय के अनेक स्रोत बनें।
उदाहरण के लिए—
एक परिवार कृषि मजदूरी के साथ पशुपालन कर सके।
महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़कर खाद्य प्रसंस्करण कर सके।
युवा कौशल प्रशिक्षण लेकर स्थानीय उद्योग में काम कर सके।
परिवार का कोई सदस्य डिजिटल अथवा सेवा-आधारित छोटा व्यवसाय शुरू कर सके।
सामुदायिक स्तर पर समूह खेती या उत्पादन-सहकारी संस्था बनाई जा सके।
इस तरह भूमिहीन परिवार की आर्थिक पहचान केवल “मजदूर” तक सीमित नहीं रहेगी।
मनरेगा से आगे : रोजगार की स्थायी संरचना-
मनरेगा ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन ग्रामीण विकास की दीर्घकालीन रणनीति यह होनी चाहिए कि मनरेगा से बने श्रम और परिसंपत्तियाँ गाँव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करें।
तालाब बनें तो सिंचाई बढ़े।
जल-संरक्षण हो तो खेती मजबूत हो।
वृक्षारोपण हो तो पर्यावरण और आजीविका दोनों सुधरें।
ग्रामीण सड़क बने तो बाजार तक पहुँच बढ़े।
सामुदायिक संसाधन विकसित हों तो पशुपालन और अन्य गतिविधियों को आधार मिले।
अर्थात रोजगार और विकास को अलग-अलग नहीं, एक-दूसरे का पूरक बनाना होगा।
भूमि से बड़ा है शिक्षा का अधिकार-
यदि भूमिहीन परिवार की अगली पीढ़ी भी उसी मजदूरी पर निर्भर रह जाए तो भूमि-अभाव एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चला जाएगा।
इस चक्र को तोड़ने का सबसे शक्तिशाली माध्यम शिक्षा है।
एक खेतिहर मजदूर का बच्चा यदि डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर, वकील, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी, तकनीशियन, उद्यमी या लेखक बन सकता है तो परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति बदल सकती है।
इसलिए गरीब परिवारों के बच्चों के लिए केवल प्राथमिक शिक्षा नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण और निरंतर शिक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
विद्यालय तक पहुँच, छात्रवृत्ति, छात्रावास, डिजिटल सुविधा, उच्च शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण—इन सभी को एक साथ देखना होगा।
गरीबी के विरुद्ध सबसे प्रभावी लड़ाई वह है जिसमें एक पीढ़ी अपने बच्चों को गरीबी से बाहर निकलने का अवसर देती है।
महिलाओं के बिना भूमिहीनों का विकास अधूरा-
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाएँ अदृश्य श्रम की सबसे बड़ी वाहक हैं।
वे खेत में काम करती हैं, पशुओं की देखभाल करती हैं, घर संभालती हैं, बच्चों का पालन करती हैं और कई बार परिवार की आय में पुरुषों के बराबर योगदान देती हैं।
फिर भी संपत्ति और निर्णय लेने में उनका हिस्सा कमजोर रह सकता है।
भूमिहीन परिवारों के विकास की योजनाओं में महिलाओं को केंद्र में रखना होगा।
आवासीय भूमि अथवा संपत्ति के अधिकार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना, स्वयं सहायता समूहों को उत्पादन से जोड़ना, महिला उद्यमिता को ऋण देना और उनके कौशल का आर्थिक उपयोग करना ग्रामीण परिवार की पूरी आर्थिक स्थिति बदल सकता है।
जब महिला आर्थिक रूप से मजबूत होती है, तो उसका लाभ केवल महिला को नहीं, पूरे परिवार को मिलता है।
भूमिहीनता और पलायन-
बिहार और उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों में ग्रामीण श्रमिक रोजगार के लिए महानगरों और दूसरे राज्यों की ओर जाते हैं।
पलायन हमेशा समस्या नहीं है। अवसर के लिए किया गया पलायन आर्थिक प्रगति का माध्यम हो सकता है।
समस्या तब है जब पलायन भूख और बेरोजगारी की मजबूरी बन जाए।
यदि गाँव में वर्षभर सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध नहीं है, तो मजदूर को शहर जाना ही पड़ेगा। शहर में वह निर्माण स्थल, फैक्टरी, होटल, परिवहन या अन्य असंगठित कामों में लग सकता है। परिवार पीछे रह जाता है या पूरा परिवार असुरक्षित जीवन की ओर बढ़ता है।
इसलिए ग्रामीण विकास का उद्देश्य पलायन को रोकना नहीं, बल्कि मजबूरी के पलायन को अवसर के पलायन में बदलना होना चाहिए।
गाँव में ही अर्थव्यवस्था के नए केंद्र क्यों न बनें?
हर गाँव को केवल कृषि पर निर्भर रखना अब पर्याप्त नहीं है।
गाँवों में छोटे-छोटे आर्थिक केंद्र विकसित किए जा सकते हैं—
खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, बागवानी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, हस्तशिल्प, सिलाई, मरम्मत सेवाएँ, डिजिटल सेवा केंद्र, स्थानीय परिवहन, ग्रामीण पर्यटन और अन्य सूक्ष्म उद्यम।
इससे भूमिहीन परिवारों को भूमि के बाहर भी आर्थिक अवसर मिलेंगे।
यहाँ कौशल विकास की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जिस युवा के पास भूमि नहीं है, उसके हाथ में कौशल एक नई उत्पादक संपत्ति है।
ग्रामसभा बने भूमिहीनों की आवाज-
भूमिहीन परिवारों की पहचान और उनकी वास्तविक समस्याओं को समझने के लिए ग्रामसभा महत्वपूर्ण संस्था हो सकती है।
हर गाँव में सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के माध्यम से यह पता होना चाहिए—
कितने परिवार भूमिहीन हैं?
कितने खेतिहर मजदूर हैं?
कितने परिवारों के पास आवासीय भूमि नहीं है?
कितने बच्चों की शिक्षा बाधित है?
कितने युवाओं को कौशल प्रशिक्षण चाहिए?
कितने परिवारों को आजीविका परिसंपत्ति की आवश्यकता है?
कितने परिवार संस्थागत ऋण से बाहर हैं?
यदि ग्रामसभा के स्तर पर यह जानकारी पारदर्शी हो और विकास योजनाएँ वास्तविक जरूरतों के आधार पर बनाई जाएँ, तो योजनाओं का प्रभाव कहीं अधिक हो सकता है।
सामाजिक न्याय : विकास की अंतिम कसौटी-
किसी राष्ट्र की प्रगति का मूल्यांकन केवल बड़े शहरों, एक्सप्रेसवे, उद्योगों और ऊँची इमारतों से नहीं किया जा सकता।
वास्तविक प्रश्न यह है—
क्या उस प्रगति की रोशनी गाँव के उस घर तक पहुँची जहाँ आज भी परिवार अपनी अगली मजदूरी की प्रतीक्षा कर रहा है?
क्या खेत में काम करने वाला श्रमिक अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पा रहा है?
क्या बीमारी आने पर उसे कर्ज नहीं लेना पड़ता?
क्या वृद्धावस्था में उसके पास सामाजिक सुरक्षा है?
क्या उसकी बेटी को भी समान अवसर मिल रहा है?
क्या उसके पास सुरक्षित आवास है?
क्या वह अपनी मेहनत का उचित मूल्य पा रहा है?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक नहीं है तो विकास अभी अधूरा है।
संविधान की दृष्टि से भूमिहीनों का प्रश्न-
भारतीय संविधान की मूल भावना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना से जुड़ी है। समानता, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार लोकतांत्रिक भारत की आधारशिला है।
इसलिए भूमिहीनों के विकास को किसी वर्ग पर उपकार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
यह समान अवसर और गरिमापूर्ण जीवन की संवैधानिक भावना से जुड़ा प्रश्न है।
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी मजबूत होगी जब खेत में श्रम करने वाला व्यक्ति भी यह महसूस करे कि राष्ट्र की विकास-यात्रा में उसका समान अधिकार और सम्मान है।
डॉ. आंबेडकर की दृष्टि और भूमि का प्रश्न-
भारत में सामाजिक न्याय की चर्चा डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों के बिना अधूरी है। उन्होंने आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र को राजनीतिक लोकतंत्र के लिए आवश्यक माना।
भूमि और संसाधनों का असमान वितरण सामाजिक असमानता को मजबूत कर सकता है। इसलिए सामाजिक न्याय की व्यापक दृष्टि में आर्थिक संसाधनों तक न्यायपूर्ण पहुँच महत्वपूर्ण है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि आंबेडकर की सामाजिक न्याय की दृष्टि को समकालीन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संदर्भ में समझा जाए।
भूमिहीनों के लिए शिक्षा, रोजगार, आर्थिक अवसर, संपत्ति तक पहुँच और सामाजिक सम्मान—इन सभी को एक-दूसरे से जोड़कर देखना होगा।
समाधान की दिशा : दस सूत्र
भूमिहीनों के अधिकार और विकास के लिए एक राष्ट्रीय कार्ययोजना में निम्न बिंदुओं को प्राथमिकता दी जा सकती है—
1. पारदर्शी भूमि अभिलेख-भूमि रिकॉर्ड का अद्यतन, डिजिटलीकरण और सरल उपलब्धता।
2. पात्र भूमिहीनों की पहचान-ग्राम स्तर पर पारदर्शी सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण।
3. जहाँ संभव हो भूमि का वितरण-उपलब्ध वैधानिक सरकारी/सीलिंग भूमि का न्यायपूर्ण उपयोग।
4. सुरक्षित कृषि पट्टेदारी-भूमिहीन कृषकों को वैधानिक सुरक्षा।
5. आवासीय भूमि और सुरक्षित आवास-किसी परिवार का अपना सुरक्षित घर उसकी आर्थिक सुरक्षा की पहली सीढ़ी है।
6. वर्षभर रोजगार-मनरेगा के साथ ग्रामीण उद्योग और कौशल आधारित रोजगार।
7. उत्पादक परिसंपत्ति-पशुधन, उपकरण, सिंचाई, छोटे उद्यम और सामुदायिक उत्पादन।
8. शिक्षा और कौशल-भूमिहीन परिवारों की अगली पीढ़ी को उच्च शिक्षा और रोजगार योग्य कौशल।
9. महिलाओं की आर्थिक भागीदारी-संयुक्त संपत्ति अधिकार, स्वयं सहायता समूह और महिला उद्यमिता।
10. सामाजिक सुरक्षा-स्वास्थ्य, वृद्धावस्था, दुर्घटना और अन्य जोखिमों से सुरक्षा
अंतोगत्व,भारत का भूमिहीन खेतिहर मजदूर केवल गरीबी का आँकड़ा नहीं है।
वह उस भारत का श्रमिक चेहरा है जिसने अपनी हथेलियों से खेतों को जीवन दिया है।
उसके पसीने से अन्न पैदा हुआ है।
उसके श्रम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था चली है।
उसने दूसरों के खेतों में फसल खड़ी की है और अपने बच्चों के लिए भविष्य का सपना देखा है।
इसलिए उसके प्रश्न को केवल मजदूरी के प्रश्न तक सीमित करना न्यायपूर्ण नहीं होगा।
भूमिहीनों के विकास का अर्थ है—उन्हें अधिकार, अवसर, सुरक्षा और सम्मान देना।
जहाँ भूमि उपलब्ध है, वहाँ न्यायपूर्ण भूमि-अधिकार मिले।
जहाँ भूमि उपलब्ध नहीं है, वहाँ सुरक्षित पट्टेदारी और उत्पादक संसाधनों तक पहुँच मिले।
जहाँ कृषि रोजगार सीमित है, वहाँ ग्रामीण उद्योग विकसित हों।
जहाँ परिवार गरीब है, वहाँ बच्चों की शिक्षा उसकी सबसे बड़ी पूँजी बने।
जहाँ महिला अदृश्य श्रम कर रही है, वहाँ उसे आर्थिक पहचान और संपत्ति में भागीदारी मिले।
जहाँ युवा के पास जमीन नहीं है, वहाँ उसके हाथ में कौशल हो।
और जहाँ कोई परिवार संकट में है, वहाँ सामाजिक सुरक्षा उसका सहारा बने।
विकास का अर्थ यह नहीं कि कुछ लोग ऊपर उठते जाएँ और कुछ लोग पीढ़ियों तक नीचे खड़े रहें। विकास का अर्थ है—सबसे पीछे खड़े व्यक्ति को आगे आने का रास्ता मिलना।
भारत की लोकतांत्रिक चेतना तभी पूर्ण होगी जब खेत में पसीना बहाने वाला भूमिहीन श्रमिक भी अपने जीवन को असुरक्षा की नियति नहीं, बल्कि अधिकार और अवसर की यात्रा समझ सके।
हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें—
भूमि हो तो अधिकार के साथ,
पट्टा हो तो सुरक्षा के साथ,
श्रम हो तो सम्मान के साथ,
रोजगार हो तो निरंतरता के साथ,
शिक्षा हो तो अवसर के साथ,
और विकास हो तो बराबरी के साथ।
क्योंकि जिस हाथ ने मिट्टी को उपजाऊ बनाया है, उस हाथ को केवल मजदूरी नहीं—सम्मानजनक जीवन की पूरी जमीन चाहिए।
यही भूमिहीनों के अधिकार का वास्तविक अर्थ है और यही समावेशी भारत के विकास की अनिवार्य दिशा।
*****
nlbharatiauthor@gmail.com
पलायन हमेशा समस्या नहीं है। अवसर के लिए किया गया पलायन आर्थिक प्रगति का माध्यम हो सकता है।
समस्या तब है जब पलायन भूख और बेरोजगारी की मजबूरी बन जाए।
यदि गाँव में वर्षभर सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध नहीं है, तो मजदूर को शहर जाना ही पड़ेगा। शहर में वह निर्माण स्थल, फैक्टरी, होटल, परिवहन या अन्य असंगठित कामों में लग सकता है। परिवार पीछे रह जाता है या पूरा परिवार असुरक्षित जीवन की ओर बढ़ता है।
इसलिए ग्रामीण विकास का उद्देश्य पलायन को रोकना नहीं, बल्कि मजबूरी के पलायन को अवसर के पलायन में बदलना होना चाहिए।
गाँव में ही अर्थव्यवस्था के नए केंद्र क्यों न बनें?
हर गाँव को केवल कृषि पर निर्भर रखना अब पर्याप्त नहीं है।
गाँवों में छोटे-छोटे आर्थिक केंद्र विकसित किए जा सकते हैं—
खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, बागवानी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, हस्तशिल्प, सिलाई, मरम्मत सेवाएँ, डिजिटल सेवा केंद्र, स्थानीय परिवहन, ग्रामीण पर्यटन और अन्य सूक्ष्म उद्यम।
इससे भूमिहीन परिवारों को भूमि के बाहर भी आर्थिक अवसर मिलेंगे।
यहाँ कौशल विकास की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जिस युवा के पास भूमि नहीं है, उसके हाथ में कौशल एक नई उत्पादक संपत्ति है।
ग्रामसभा बने भूमिहीनों की आवाज-
भूमिहीन परिवारों की पहचान और उनकी वास्तविक समस्याओं को समझने के लिए ग्रामसभा महत्वपूर्ण संस्था हो सकती है।
हर गाँव में सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के माध्यम से यह पता होना चाहिए—
कितने परिवार भूमिहीन हैं?
कितने खेतिहर मजदूर हैं?
कितने परिवारों के पास आवासीय भूमि नहीं है?
कितने बच्चों की शिक्षा बाधित है?
कितने युवाओं को कौशल प्रशिक्षण चाहिए?
कितने परिवारों को आजीविका परिसंपत्ति की आवश्यकता है?
कितने परिवार संस्थागत ऋण से बाहर हैं?
यदि ग्रामसभा के स्तर पर यह जानकारी पारदर्शी हो और विकास योजनाएँ वास्तविक जरूरतों के आधार पर बनाई जाएँ, तो योजनाओं का प्रभाव कहीं अधिक हो सकता है।
सामाजिक न्याय : विकास की अंतिम कसौटी-
किसी राष्ट्र की प्रगति का मूल्यांकन केवल बड़े शहरों, एक्सप्रेसवे, उद्योगों और ऊँची इमारतों से नहीं किया जा सकता।
वास्तविक प्रश्न यह है—
क्या उस प्रगति की रोशनी गाँव के उस घर तक पहुँची जहाँ आज भी परिवार अपनी अगली मजदूरी की प्रतीक्षा कर रहा है?
क्या खेत में काम करने वाला श्रमिक अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पा रहा है?
क्या बीमारी आने पर उसे कर्ज नहीं लेना पड़ता?
क्या वृद्धावस्था में उसके पास सामाजिक सुरक्षा है?
क्या उसकी बेटी को भी समान अवसर मिल रहा है?
क्या उसके पास सुरक्षित आवास है?
क्या वह अपनी मेहनत का उचित मूल्य पा रहा है?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक नहीं है तो विकास अभी अधूरा है।
संविधान की दृष्टि से भूमिहीनों का प्रश्न-
भारतीय संविधान की मूल भावना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना से जुड़ी है। समानता, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार लोकतांत्रिक भारत की आधारशिला है।
इसलिए भूमिहीनों के विकास को किसी वर्ग पर उपकार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
यह समान अवसर और गरिमापूर्ण जीवन की संवैधानिक भावना से जुड़ा प्रश्न है।
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी मजबूत होगी जब खेत में श्रम करने वाला व्यक्ति भी यह महसूस करे कि राष्ट्र की विकास-यात्रा में उसका समान अधिकार और सम्मान है।
डॉ. आंबेडकर की दृष्टि और भूमि का प्रश्न-
भारत में सामाजिक न्याय की चर्चा डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों के बिना अधूरी है। उन्होंने आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र को राजनीतिक लोकतंत्र के लिए आवश्यक माना।
भूमि और संसाधनों का असमान वितरण सामाजिक असमानता को मजबूत कर सकता है। इसलिए सामाजिक न्याय की व्यापक दृष्टि में आर्थिक संसाधनों तक न्यायपूर्ण पहुँच महत्वपूर्ण है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि आंबेडकर की सामाजिक न्याय की दृष्टि को समकालीन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संदर्भ में समझा जाए।
भूमिहीनों के लिए शिक्षा, रोजगार, आर्थिक अवसर, संपत्ति तक पहुँच और सामाजिक सम्मान—इन सभी को एक-दूसरे से जोड़कर देखना होगा।
समाधान की दिशा : दस सूत्र
भूमिहीनों के अधिकार और विकास के लिए एक राष्ट्रीय कार्ययोजना में निम्न बिंदुओं को प्राथमिकता दी जा सकती है—
1. पारदर्शी भूमि अभिलेख-भूमि रिकॉर्ड का अद्यतन, डिजिटलीकरण और सरल उपलब्धता।
2. पात्र भूमिहीनों की पहचान-ग्राम स्तर पर पारदर्शी सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण।
3. जहाँ संभव हो भूमि का वितरण-उपलब्ध वैधानिक सरकारी/सीलिंग भूमि का न्यायपूर्ण उपयोग।
4. सुरक्षित कृषि पट्टेदारी-भूमिहीन कृषकों को वैधानिक सुरक्षा।
5. आवासीय भूमि और सुरक्षित आवास-किसी परिवार का अपना सुरक्षित घर उसकी आर्थिक सुरक्षा की पहली सीढ़ी है।
6. वर्षभर रोजगार-मनरेगा के साथ ग्रामीण उद्योग और कौशल आधारित रोजगार।
7. उत्पादक परिसंपत्ति-पशुधन, उपकरण, सिंचाई, छोटे उद्यम और सामुदायिक उत्पादन।
8. शिक्षा और कौशल-भूमिहीन परिवारों की अगली पीढ़ी को उच्च शिक्षा और रोजगार योग्य कौशल।
9. महिलाओं की आर्थिक भागीदारी-संयुक्त संपत्ति अधिकार, स्वयं सहायता समूह और महिला उद्यमिता।
10. सामाजिक सुरक्षा-स्वास्थ्य, वृद्धावस्था, दुर्घटना और अन्य जोखिमों से सुरक्षा
अंतोगत्व,भारत का भूमिहीन खेतिहर मजदूर केवल गरीबी का आँकड़ा नहीं है।
वह उस भारत का श्रमिक चेहरा है जिसने अपनी हथेलियों से खेतों को जीवन दिया है।
उसके पसीने से अन्न पैदा हुआ है।
उसके श्रम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था चली है।
उसने दूसरों के खेतों में फसल खड़ी की है और अपने बच्चों के लिए भविष्य का सपना देखा है।
इसलिए उसके प्रश्न को केवल मजदूरी के प्रश्न तक सीमित करना न्यायपूर्ण नहीं होगा।
भूमिहीनों के विकास का अर्थ है—उन्हें अधिकार, अवसर, सुरक्षा और सम्मान देना।
जहाँ भूमि उपलब्ध है, वहाँ न्यायपूर्ण भूमि-अधिकार मिले।
जहाँ भूमि उपलब्ध नहीं है, वहाँ सुरक्षित पट्टेदारी और उत्पादक संसाधनों तक पहुँच मिले।
जहाँ कृषि रोजगार सीमित है, वहाँ ग्रामीण उद्योग विकसित हों।
जहाँ परिवार गरीब है, वहाँ बच्चों की शिक्षा उसकी सबसे बड़ी पूँजी बने।
जहाँ महिला अदृश्य श्रम कर रही है, वहाँ उसे आर्थिक पहचान और संपत्ति में भागीदारी मिले।
जहाँ युवा के पास जमीन नहीं है, वहाँ उसके हाथ में कौशल हो।
और जहाँ कोई परिवार संकट में है, वहाँ सामाजिक सुरक्षा उसका सहारा बने।
विकास का अर्थ यह नहीं कि कुछ लोग ऊपर उठते जाएँ और कुछ लोग पीढ़ियों तक नीचे खड़े रहें। विकास का अर्थ है—सबसे पीछे खड़े व्यक्ति को आगे आने का रास्ता मिलना।
भारत की लोकतांत्रिक चेतना तभी पूर्ण होगी जब खेत में पसीना बहाने वाला भूमिहीन श्रमिक भी अपने जीवन को असुरक्षा की नियति नहीं, बल्कि अधिकार और अवसर की यात्रा समझ सके।
हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें—
भूमि हो तो अधिकार के साथ,
पट्टा हो तो सुरक्षा के साथ,
श्रम हो तो सम्मान के साथ,
रोजगार हो तो निरंतरता के साथ,
शिक्षा हो तो अवसर के साथ,
और विकास हो तो बराबरी के साथ।
क्योंकि जिस हाथ ने मिट्टी को उपजाऊ बनाया है, उस हाथ को केवल मजदूरी नहीं—सम्मानजनक जीवन की पूरी जमीन चाहिए।
यही भूमिहीनों के अधिकार का वास्तविक अर्थ है और यही समावेशी भारत के विकास की अनिवार्य दिशा।
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