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बारह मन लकड़ी

 
कहानी बारह मन लकड़ी
-नन्दलाल भारती
......
दोपहर की धूप चौखट तक पहुंच रही में थी।
नीम के पेड़ की छाया सिकुड़कर दीवार के पास जा लगी थी।
राजवीर काका चारपाई पर चुपचाप बैठे थे।
सामने जमीन की एक फाइल खुली थी...
लेकिन उनकी नजर फाइल पर नहीं थी।
वह कहीं बहुत दूर देख रहे थे।
तभी हरिदीप आया।
उसने काका को देखा और पूछा—
“काका... क्यों उदास हो?”
काका ने माथे का पसीना पोंछा।
कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले—
“हरिदीप... धरती का हर आदमी अमीर बनना चाहता है।”
हरिदीप पास बैठ गया।
काका बोले—
“इसके लिए आदमी क्या-क्या नहीं करता! चोरी... बेईमानी... झूठ... दूसरों का हक मारना... और कभी-कभी तो आदमी का कत्ल करने में भी नहीं हिचकता।”
हरिदीप ने धीरे से कहा—
“लेकिन काका... इतना सब करने के बाद भी आदमी ले क्या जाता है?”
काका ने उसकी ओर देखा।
हरिदीप बोला—
“कहते हैं न... कफन में जेब नहीं होती।”
काका के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
कुछ क्षण बाद हरिदीप बोला—
“आज मुझे नाना पाटेकर बहुत याद आ रहे हैं।”
काका ने पूछा—
“क्यों?”
हरिदीप बोला—
“उनकी मृत्यु और जिंदगी को लेकर कही एक बात बार-बार याद आती है। उनका कहना था कि आखिर में आदमी के साथ उसकी सारी संपत्ति नहीं जाती... अंतिम यात्रा में तो बारह मन लकड़ी ही चाहिए।”
काका ने गहरी साँस ली।
“काश... दुनिया का हर आदमी यह बात समझ लेता।”
हरिदीप बोला—
“तब क्या होता?”
काका ने कहा—
“तब शायद यह देश सचमुच सोने की चिड़िया होता।”
थोड़ी देर रुककर बोले—
“और शायद हम आजादी का असली अर्थ भी समझ पाते।”
हरिदीप ने पूछा—
“काका... आदमी की असली प्रॉपर्टी क्या है?”
काका मुस्कराए।
“तू मुझसे पूछ रहा है?”
“हाँ काका।”
“तो सुन...”
काका की आवाज गंभीर हो गई।
“मौत तय है।”
हरिदीप चुप।
“तो चोरी क्यों?”
चुप्पी।
“बेईमानी क्यों?”
चुप्पी।
“खून-खराबा क्यों?”
ऊंच -नीच का भेदभाव क्यों?
हरिदीप काका को देखता रहा।
काका बोले—
“ऊँच-नीच का भेदभाव क्यों? दूसरे का हक छीनने की होड़ क्यों? आखिर में आदमी को चाहिए क्या?”
उन्होंने सामने रखी लकड़ियों की ओर इशारा किया।
“बारह मन लकड़ी।”
हरिदीप चौंक गया।
“काका... क्या आदमी की प्रॉपर्टी सिर्फ बारह मन लकड़ी है?”
काका ने उसकी आँखों में देखा।
“नहीं हरिदीप...”
थोड़ा रुककर बोले—
“बारह मन लकड़ी उसकी आखिरी जरूरत है। असली प्रॉपर्टी उसके कर्म हैं।”
राजवीर काका की अपनी जिंदगी इसका उदाहरण थी।
तीस साल पहले उनके पास केवल कुछ बीसा जमीन थी।
मेहनत की।
ईमानदारी से नगदी खेती की।
धीरे-धीरे आय बढ़ती गई और खेत भी l
उन्होंने अपने दोनों बेटों—रघुवीर और देवेंद्र—को पढ़ाया।
लेकिन समय के साथ बेटों की जरूरतें बढ़ीं...
और जरूरतों के साथ लालच भी।
क्योंकि सड़क के किनारे की हजारों की जमीन अब करोड़ में हो गयी l
रघुवीर शहर में कारोबार करता था।
देवेंद्र गाँव में खेती।
पहले दोनों भाई मिलकर रहते थे।
फिर पिता की जमीन बीच में आ गई।
रघुवीर को जमीन चाहिए थी।
देवेंद्र को भी।
पहले बातचीत हुई।
फिर बहस।
फिर तकरार।
और एक दिन दोनों भाई एक-दूसरे के दुश्मन बन गए।
राजवीर काका ने दोनों को बुलाया।
कहा—
“बेटा, जमीन तुम्हें जोड़ने के लिए है, लड़ाने के लिए नहीं।”
रघुवीर बोला—
“बाबूजी , भावनाओं से पेट नहीं भरता।”
देवेंद्र बोला—
“मुझे मेरा हिस्सा चाहिए।”
काका ने दोनों को देखा।
धीरे से पूछा—
“तुम्हें जमीन चाहिए... या तुम्हारा पिता?”
दोनों चुप हो गए।
लेकिन वह चुप्पी ज्यादा देर नहीं रही।
कुछ दिनों बाद गाँव के बाहर रहने वाला बूढ़ा रामफेर बीमार पड़ गया।
उसके पास इलाज के पैसे नहीं थे।
बेटे ने फोन पर कहा—
“बाबूजी , अभी पैसे नहीं हैं... दो दिन रुक जाइए।”
दो दिन बीत गए।
रामफेर की हालत बिगड़ती गई।
राजवीर काका उसे अस्पताल ले गए।
अपने पैसे से इलाज कराया।
डॉक्टर ने कहा—
“थोड़ी और देर होती तो इन्हें बचाना मुश्किल था।”
रामफेर की आँखों में आँसू आ गए।
उसने कहा—
“काका... मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है।”
काका मुस्कराए—
“तू जिंदा रह... यही मेरी कमाई है।”
हरिदीप यह सब देख रहा था।
वापस लौटते हुए उसने पूछा—
“काका, आपने इतना पैसा क्यों खर्च किया?”
काका बोले—
“क्योंकि पैसा मेरे पास पड़ा रहता तो सिर्फ पैसा रहता।”
थोड़ा रुककर बोले—
“किसी की जान बचाने में लग गया... तो इंसानियत बन गया।”
हरिदीप के भीतर कुछ बदलने लगा।
उसी रात राजवीर काका देर तक सो नहीं पाए।
एक तरफ उनके दोनों बेटे जमीन के लिए लड़ रहे थे।
दूसरी तरफ रामफेर इलाज के लिए तरस रहा था।
काका उठे।
अलमारी खोली।
जमीन के कागज निकाले।
बैंक की पासबुक निकाली।
बीमा के कागज निकाले।
फिर एक-एक करके सब देखते रहे।
अचानक उनके चेहरे पर एक सवाल उभरा—
“मैं किस चीज का मालिक हूँ?”
बहुत देर तक वह उस सवाल का जवाब खोजते रहे।
फिर उन्हें समझ आया—
“जिसे मैं अपनी संपत्ति समझता रहा... वह सब मेरे जाने के बाद यहीं रह जाएगा।
अगली सुबह काका ने हरिदीप को बुलाया।
दोनों खेत की ओर गए।
एक पुराने कमरे का दरवाजा खोला।
अंदर सूखी लकड़ियाँ रखी थीं।
हरिदीप ने पूछा—
“काका... यह?”
काका मुस्कराए।
“मेरी आखिरी प्रॉपर्टी।”
हरिदीप उन्हें देखता रह गया।
काका बोले—
“जिंदगी भर जमीन जोड़ता रहा। अब समझ आया कि अंत में जमीन मुझे नहीं मिलेगी... मैं जमीन को मिल जाऊँगा।”
हरिदीप की आँखें नम हो गईं।
काका बोले—
“जिस दिन आदमी मृत्यु को समझ लेता है, उस दिन उसका लालच छोटा हो जाता है।”
फिर बोले—
“उसे समझ आता है कि किसी को नीचा दिखाकर ऊँचा नहीं हुआ जा सकता।”
“दूसरे का हक छीनकर अमीर नहीं हुआ जा सकता।”
“और नफरत जमा करके कोई अमर नहीं हो सकता।”
लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।
एक दिन रघुवीर जमीन के कागज लेकर आया।
बोला—
“बाबूजी , यहाँ दस्तख्त कर दीजिए।”
काका ने पूछा—
“किसलिए?”
“पीछे वाली जमीन बेचनी है।”
“क्यों?”
“कारोबार बढ़ाना है।”
काका ने कागज वापस कर दिया।
“नहीं।”
रघुवीर का चेहरा लाल हो गया।
“आप मुझे अपना बेटा नहीं समझते?”
काका शांत रहे।
“बेटा समझता हूँ... इसलिए तुम्हें गलत रास्ते पर नहीं जाने दूँगा।”
रघुवीर गुस्से में बाहर चला गया।
उसी शाम देवेंद्र आया।
उसने भी जमीन का हिस्सा माँगा।
काका ने उसे भी मना कर दिया।
अब दोनों भाइयों को लगा—
पिता उनके खिलाफ हैं।
लेकिन राजवीर काका ने फैसला कर लिया था।
उन्होंने जमीन का एक बड़ा हिस्सा गाँव के स्कूल के नाम करने का निर्णय लिया।
एक हिस्सा गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए।
एक हिस्सा जरूरतमंदों के लिए।
और बाकी जमीन दोनों बेटों के नाम बराबर।
जब दोनों भाइयों को यह पता चला तो वे पिता के सामने खड़े हो गए।
रघुवीर चिल्लाया—
“आप हमारी जमीन दान कर रहे हैं?”
काका ने शांत स्वर में कहा—
“मेरी जमीन है।”
देवेंद्र बोला—
“लेकिन हम आपके बेटे हैं!”
काका ने दोनों की ओर देखा।
“इसीलिए तुम्हें हिस्सा दे रहा हूँ।”
फिर अचानक काका की आवाज भारी हो गई—
“लेकिन बताओ...”
दोनों उनकी ओर देखने लगे।
“तुम्हें जमीन चाहिए...”
“या पिता?”
दोनों भाइयों के चेहरे झुक गए।
काका की आँखों से आँसू निकल आए।
“तुमने कभी सोचा... जिस जमीन के लिए लड़ रहे हो, वह तुमसे पहले भी थी और तुम्हारे बाद भी रहेगी।”
“मैं चला जाऊँगा...”
“तुम चले जाओगे...”
“तुम्हारे बच्चे भी एक दिन चले जाएँगे...”
“लेकिन जमीन यहीं रहेगी।”
कमरे में सन्नाटा था।
काका ने कहा—
“हम जमीन के मालिक नहीं हैं... कुछ समय के लिए उसके रखवाले हैं।”
उस रात रघुवीर सो नहीं सका।
वह चुपचाप गाँव के पुराने श्मशान की ओर चला गया।
वहाँ एक चिता जल रही थी।
किसी ने कहा—
“जिसकी चिता है, उसके पास बहुत पैसा था।”
रघुवीर चिता को देखता रहा।
लपटें उठती रहीं।
और धीरे-धीरे सब कुछ राख में बदलता गया।
उसे पहली बार समझ आया—
आग ने किसी की हैसियत नहीं पूछी।
न जमीन पूछी।
न बैंक बैलेंस।
न मकान।
न कारोबार।
सब बराबर।
उसके कानों में पिता की आवाज गूँजी—
“आखिर में बारह मन लकड़ी।”
उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
उधर देवेंद्र भी बदल रहा था।
अगले दिन उसने खेत में काम कर रहे मजदूर को पहली बार मालिक की तरह नहीं, इंसान की तरह देखा।
उसे पानी दिया।
मजदूर ने हैरानी से पूछा—
“क्या हुआ मालिक?”
देवेंद्र ने कहा—
“आज समझ आया... खेत मेरा हो सकता है, लेकिन मेहनत करने वाला इंसान मुझसे छोटा नहीं।”
यह कहते हुए उसकी अपनी आँखें झुक गईं।
शाम को दोनों भाई पिता के पास पहुँचे।
रघुवीर ने पिता के पैर पकड़ लिए।
“बाबूजी ... हमें माफ कर दीजिए।”
देवेंद्र भी रो पड़ा।
“हम जमीन के पीछे भागते रहे... और आपको खोते रहे।”
राजवीर काका ने दोनों को उठाया।
गले लगा लिया।
फिर बोले—
“मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी जमीन से ज्यादा मेरी सोच विरासत में लो।”
रघुवीर ने पूछा—
“कौन-सी सोच?”
काका मुस्कराए।
“आदमी खाली हाथ आता है... और खाली हाथ जाता है।”
फिर बोले—
“बीच का समय ही असली परीक्षा है।”
कुछ वर्षों बाद...
राजवीर काका नहीं रहे।
उनकी अंतिम यात्रा में दोनों बेटे साथ चल रहे थे।
हरिदीप भी वहाँ था।
श्मशान में चिता तैयार थी।
हरिदीप की नजर लकड़ियों पर पड़ी।
उसे काका की आवाज सुनाई दी—
“हरिदीप... आदमी की असली प्रॉपर्टी क्या है?”
आज उसके पास जवाब था।
उसने मन ही मन कहा—
“काका... अब समझ गया हूँ।”
चिता जल उठी।
लपटें ऊपर उठने लगीं।
और हरिदीप को लगा...
आज सिर्फ एक शरीर नहीं जल रहा।
आज लालच जल रहा है।
अहंकार जल रहा है।
ऊंच नीच का भेदभाव ज़ल रहा है l
नफरत जल रही है।
दूसरे का हक छीनने की भूख जल रही है।
और राख से...
शायद एक नई समझ जन्म ले रही है।
हरिदीप ने आसमान की ओर देखा।
धीरे से बोला—
“काका... आखिर में सचमुच बारह मन लकड़ी ही लगी।”
फिर कुछ क्षण रुककर कहा—
“काश... आदमी यह बात मरने से पहले समझ जाए।


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