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बी. पी. मंडल : सामाजिक न्याय और बहुजन राजनीति के नायक

 
आलेख :बी. पी. मंडल : सामाजिक न्याय और बहुजन राजनीति के नायक
— नन्दलाल भारती
सामाजिक न्याय की अधूरी क्रांति-
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन, चुनावी जीत और राजनीतिक दलों के उत्थान-पतन का इतिहास नहीं है। यह सामाजिक प्रतिनिधित्व, अधिकारों की लड़ाई और सदियों से वंचित समुदायों को सत्ता एवं संसाधनों में हिस्सेदारी दिलाने के संघर्ष का इतिहास भी है। भारतीय समाज में जातिगत असमानता ने लंबे समय तक शिक्षा, रोजगार, प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व के अवसरों को सीमित रखा। स्वतंत्रता के बाद संविधान ने समानता और न्याय का वादा किया, लेकिन सामाजिक वास्तविकता में इस वादे को साकार करना एक बड़ी चुनौती थी।
इसी चुनौती के बीच दो ऐतिहासिक व्यक्तित्व भारतीय राजनीति के निर्णायक अध्याय बनकर उभरे—बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष बी. पी. मंडल और प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह। एक ने सामाजिक पिछड़ेपन की पहचान तथा प्रतिनिधित्व का वैचारिक और संस्थागत आधार तैयार किया, तो दूसरे ने राजनीतिक जोखिम उठाकर उस आधार को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने का निर्णय लिया।
बी. पी. मंडल और वी. पी. सिंह का ऐतिहासिक महत्त्व इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए। मंडल आयोग ने सामाजिक न्याय की बहस को ठोस आँकड़ों, सिफारिशों और संवैधानिक दायित्वों से जोड़ा, जबकि वी. पी. सिंह ने आरक्षण की सिफारिशों को लागू करके भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। यह परिवर्तन केवल सरकारी नौकरियों में अवसरों का विस्तार नहीं था, बल्कि लोकतंत्र में सामाजिक भागीदारी के अर्थ को व्यापक बनाने की ऐतिहासिक पहल थी।
बी. पी. मंडल : संघर्ष, व्यक्तित्व और राजनीतिक योगदान-
बी. पी. मंडल का पूरा नाम बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल था। उनका जन्म 25 अगस्त 1918 को बिहार के मधेपुरा क्षेत्र में एक संपन्न यादव परिवार में हुआ था। वे ऐसे समय में सार्वजनिक जीवन में आए, जब भारतीय समाज जातिगत ऊँच-नीच, सामाजिक भेदभाव और राजनीतिक वर्चस्व की जटिलताओं से गुजर रहा था।
उन्होंने शिक्षा और राजनीति के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता को समझा। वे बिहार विधानसभा के सदस्य बने और 1968 में बिहार के मुख्यमंत्री पद पर पहुँचे। उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल बहुत छोटा रहा, लेकिन उनका राजनीतिक जीवन केवल मुख्यमंत्री पद तक सीमित नहीं था। उन्होंने सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों की राजनीतिक भागीदारी और अधिकारों के प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनकी राजनीति का केंद्रीय विचार था कि लोकतंत्र तभी वास्तविक अर्थों में सफल होगा, जब समाज के सभी वर्गों को अवसरों और सत्ता में उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा। केवल मतदान का अधिकार दे देना पर्याप्त नहीं है; शिक्षा, रोजगार, प्रशासन और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भी समान अवसर उपलब्ध कराने होंगे।
यह विचार भारतीय संविधान की सामाजिक न्याय संबंधी भावना से जुड़ता है। बी. पी. मंडल ने इसी भावना को नीतिगत रूप देने की दिशा में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
मंडल आयोग का गठन : सामाजिक पिछड़ेपन की पहचान-
भारत के संविधान में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। अनुच्छेद 15(4) और 16(4) इसी संवैधानिक दृष्टि के महत्त्वपूर्ण आधार हैं। इन प्रावधानों का उद्देश्य उन वर्गों को अवसर उपलब्ध कराना है, जो ऐतिहासिक और संरचनात्मक कारणों से शिक्षा तथा सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं कर सके थे।
जनता पार्टी की सरकार ने 1 जनवरी 1979 को संविधान के अनुच्छेद 340 के अंतर्गत द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया। बी. पी. मंडल को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इसी कारण यह आयोग लोकप्रिय रूप से मंडल आयोग के नाम से जाना गया।
आयोग को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करने तथा उनके उत्थान के उपाय सुझाने का दायित्व सौंपा गया।
यह कार्य आसान नहीं था। भारत की सामाजिक संरचना अत्यंत जटिल थी। विभिन्न क्षेत्रों में जातियों की स्थिति, शिक्षा, आर्थिक संसाधन, सामाजिक प्रतिष्ठा और सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व के स्तर अलग-अलग थे। आयोग ने व्यापक अध्ययन, सामाजिक संकेतकों और उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर पिछड़ेपन को समझने का प्रयास किया।
आयोग ने सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक संकेतकों को मिलाकर पिछड़ेपन के निर्धारण के लिए 11 मानदंड अपनाए। इनमें जाति की सामाजिक स्थिति, महिलाओं की स्थिति, शिक्षा में पिछड़ापन, विद्यालय छोड़ने की दर, श्रम में भागीदारी, आवास और संपत्ति जैसे पहलू शामिल थे।
यहाँ आयोग की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता सामने आती है। उसने पिछड़ेपन को केवल गरीबी का पर्याय नहीं माना, बल्कि सामाजिक वंचना और ऐतिहासिक असमानता के व्यापक संदर्भ में देखा।
मंडल आयोग की सिफारिशें : प्रतिनिधित्व का ऐतिहासिक दस्तावेज-
मंडल आयोग ने दिसंबर 1980 में अपनी रिपोर्ट तत्कालीन केंद्र सरकार को सौंपी। आयोग ने देश की आबादी में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की हिस्सेदारी लगभग 52 प्रतिशत आँकी। उसने केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की।
यह सिफारिश इसलिए भी महत्त्वपूर्ण थी कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए पहले से निर्धारित 22.5 प्रतिशत आरक्षण के साथ इसे जोड़ने पर कुल आरक्षण 49.5 प्रतिशत होता था।
आयोग ने केवल आरक्षण की बात नहीं की, बल्कि शिक्षा, रोजगार, तकनीकी प्रशिक्षण और सामाजिक उन्नति के लिए अनेक उपाय सुझाए। उसका उद्देश्य पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों तक पहुँचाने के साथ-साथ उनके सामाजिक और शैक्षणिक विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार करना था।
आयोग की सिफारिशों का मूल संदेश स्पष्ट था—प्रतिभा किसी जाति की निजी संपत्ति नहीं होती और अवसरों का असमान वितरण प्रतिभा के विकास को भी बाधित करता है।
यह समझना आवश्यक है कि आरक्षण किसी व्यक्ति के विरुद्ध दंडात्मक व्यवस्था नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को समान अवसर उपलब्ध कराने का संवैधानिक माध्यम है।
मंडल आयोग ने भारतीय लोकतंत्र को यह सोचने के लिए विवश किया कि यदि शासन और प्रशासन में समाज के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व नहीं है, तो लोकतंत्र की सामाजिक विश्वसनीयता कैसे सुनिश्चित होगी?
वी. पी. सिंह : सत्ता, सिद्धांत और ऐतिहासिक निर्णय-
बी. पी. मंडल आयोग की रिपोर्ट 1980 में प्रस्तुत हो गई थी, लेकिन उसके लागू होने की राजनीतिक इच्छाशक्ति लंबे समय तक दिखाई नहीं दी। रिपोर्ट संसद के पटल पर रखी गई, उस पर चर्चा हुई, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इस बीच देश की राजनीति में अनेक परिवर्तन हुए। सामाजिक न्याय की माँग तेज होती गई और पिछड़े वर्गों के संगठनों ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया।
2 दिसंबर 1989 को विश्वनाथ प्रताप सिंह भारत के प्रधानमंत्री बने। उनका राजनीतिक जीवन सत्ता के लिए संघर्ष के साथ-साथ भ्रष्टाचार के विरोध और राजनीतिक जवाबदेही के सवालों से भी जुड़ा रहा। उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का निर्णय लिया।
7 अगस्त 1990 को उनकी सरकार ने केंद्र सरकार की सेवाओं में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की घोषणा की। इसके बाद 13 अगस्त 1990 को कार्मिक विभाग ने इस संबंध में कार्यालय ज्ञापन जारी किया। लगभग एक दशक से सरकारी फाइलों में प्रतीक्षा कर रही सिफारिशें अब राष्ट्रीय राजनीति की वास्तविकता बन चुकी थीं। 
यह निर्णय वी. पी. सिंह की राजनीतिक सत्ता का सबसे महत्त्वपूर्ण और दूरगामी कदम साबित हुआ। उन्होंने जानते हुए भी यह निर्णय लिया कि इससे स्थापित राजनीतिक और सामाजिक शक्तियों में तीखी प्रतिक्रिया हो सकती है। वास्तव में ऐसा ही हुआ।
मंडल बनाम कमंडल : भारतीय राजनीति का निर्णायक मोड़
मंडल आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन ने भारतीय राजनीति में एक नए सामाजिक विमर्श को जन्म दिया। एक ओर पिछड़े वर्गों में शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी की उम्मीदें बढ़ीं, दूसरी ओर आरक्षण के विरोध में देश के अनेक हिस्सों में आंदोलन शुरू हुए।
कुछ स्थानों पर हिंसक प्रदर्शन हुए और आत्मदाह की घटनाओं ने समाज को झकझोर दिया। इस दौर में आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में तीखी बहस हुई। मीडिया, विश्वविद्यालयों, राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों में प्रतिनिधित्व तथा योग्यता की परिभाषा पर व्यापक चर्चा शुरू हुई।
इसी समय भारतीय राजनीति में मंडल और कमंडल की बहस उभरी। मंडल सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अवसरों के विस्तार का प्रतीक बना, जबकि कमंडल धार्मिक पहचान आधारित राजनीतिक लामबंदी का प्रतीक बनकर सामने आया।
इस राजनीतिक टकराव को केवल दो नेताओं या दो राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा मानना उचित नहीं होगा। इसके भीतर भारतीय समाज की दो अलग-अलग राजनीतिक आकांक्षाएँ और सत्ता-समीकरणों का संघर्ष भी दिखाई देता है।
वी. पी. सिंह की सरकार को इस दौर में गंभीर राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। भाजपा ने अपना समर्थन वापस ले लिया और नवंबर 1990 में उनकी सरकार गिर गई। लेकिन सरकार का पतन मंडल आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन के ऐतिहासिक प्रभाव को समाप्त नहीं कर सका।
वी. पी. सिंह ने प्रधानमंत्री पद खोया, लेकिन सामाजिक न्याय के विमर्श में उनका निर्णय एक स्थायी राजनीतिक संदर्भ बन गया।
सामाजिक न्याय की राजनीति और बहुजन चेतना-
मंडल आयोग के लागू होने के बाद भारतीय राजनीति में पिछड़े वर्गों की भूमिका का विस्तार हुआ। उत्तर भारत सहित देश के अनेक क्षेत्रों में सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न चुनावी राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बन गया।
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पिछड़े वर्गों के नेतृत्व का उभार अधिक स्पष्ट दिखाई दिया। अनेक ऐसे राजनीतिक चेहरे सामने आए, जिनकी राजनीति का आधार सामाजिक न्याय, पिछड़ों की हिस्सेदारी और सत्ता में भागीदारी था।
इस परिवर्तन ने लोकतंत्र की सामाजिक संरचना को प्रभावित किया। पहले जिन समुदायों की राजनीतिक उपस्थिति सीमित थी, वे अब विधानसभा, संसद, मंत्रिमंडल और प्रशासन में अपनी हिस्सेदारी की माँग अधिक प्रभावशाली ढंग से रखने लगे।
मंडल राजनीति ने यह स्थापित किया कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व केवल संख्यात्मक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है। यदि किसी समुदाय की आबादी बड़ी है, लेकिन सत्ता और संसाधनों में उसकी भागीदारी नगण्य है, तो लोकतांत्रिक समानता का दावा अधूरा रह जाता है।
यहाँ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि बहुजन समाज कोई एकरूप राजनीतिक या सामाजिक समूह नहीं है। इसमें अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा अन्य वंचित समुदायों की विविध सामाजिक वास्तविकताएँ शामिल हैं। इनके बीच एकता, सहयोग और साझा अधिकारों की चेतना विकसित करना सामाजिक परिवर्तन की बड़ी चुनौती है।
बी. पी. मंडल की ऐतिहासिक भूमिका इसी व्यापक सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
आरक्षण और योग्यता : एक पुरानी बहस का नया संदर्भ-
मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद आरक्षण को लेकर एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाया गया—क्या आरक्षण योग्यता के विरुद्ध है?
इस प्रश्न का उत्तर सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों को समझे बिना नहीं दिया जा सकता। सदियों तक शिक्षा, संपत्ति, ज्ञान और अवसरों पर समाज के कुछ वर्गों का विशेषाधिकार रहा। दूसरी ओर, बड़ी आबादी को सामाजिक पहचान के आधार पर अवसरों से दूर रखा गया। ऐसी परिस्थिति में सभी को एक ही शुरुआती रेखा पर खड़ा मान लेना वास्तविक समानता नहीं हो सकती।
योग्यता का विकास अवसरों, संसाधनों, शिक्षा और सामाजिक वातावरण से होता है। जिस बच्चे को अच्छी शिक्षा, पुस्तकालय, मार्गदर्शन और आर्थिक सुरक्षा मिलती है, उसकी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति उस बच्चे से अलग होती है, जिसे इन सुविधाओं से वंचित रखा गया हो।
आरक्षण का उद्देश्य किसी की योग्यता को कमतर करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक वंचना के कारण पैदा हुई असमानताओं को कम करना है।
1992 में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक इंद्रा साहनी निर्णय ने अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को संवैधानिक रूप से स्वीकार किया। साथ ही पिछड़े वर्गों में सामाजिक-आर्थिक रूप से उन्नत वर्गों अर्थात् क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का सिद्धांत स्थापित किया। न्यायालय ने सामान्यतः आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित की, कुछ असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर। Indian Kanoon +1
इस निर्णय ने मंडल आयोग की सिफारिशों को न्यायिक परीक्षण के बाद एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक आधार प्रदान किया।
वी. पी. सिंह की राजनीतिक विरासत-
विश्वनाथ प्रताप सिंह की राजनीतिक विरासत का मूल्यांकन केवल उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल की अवधि से नहीं किया जा सकता। वे लगभग एक वर्ष तक ही प्रधानमंत्री रहे, लेकिन उनके कार्यकाल का एक निर्णय भारतीय राजनीति में दूरगामी परिवर्तन का कारण बना।
उन्होंने सामाजिक न्याय के प्रश्न को केवल चुनावी घोषणा या राजनीतिक भाषण तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सरकारी नीति के रूप में लागू करने का साहस दिखाया।
उनकी सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके पिछड़े वर्गों के युवाओं के सामने नए अवसरों के द्वार खोले। इस निर्णय ने भारतीय राजनीति में नेतृत्व की सामाजिक संरचना को बदलने की प्रक्रिया को गति दी।
हालाँकि, यह भी स्वीकार करना होगा कि केवल आरक्षण लागू कर देने से सामाजिक असमानता समाप्त नहीं हो जाती। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भूमि सुधार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक सम्मान के बिना समानता का सपना अधूरा रहता है।
वी. पी. सिंह की राजनीतिक विरासत का वास्तविक मूल्यांकन इसी आधार पर होना चाहिए कि उनके निर्णय ने सामाजिक न्याय की दिशा में जो रास्ता खोला, उसे आगे की सरकारों ने कितना विस्तारित किया।
मंडल आयोग के बाद : अधूरे लक्ष्य और नई चुनौतियाँ-
मंडल आयोग के बाद तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है। इस दौरान पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक चेतना में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। अनेक समुदायों से नए नेतृत्व का उदय हुआ है। शिक्षा और सरकारी सेवाओं में आरक्षण ने अवसरों का विस्तार किया है।
लेकिन प्रश्न आज भी मौजूद हैं।
क्या पिछड़े वर्गों के सभी समुदायों तक आरक्षण का लाभ समान रूप से पहुँचा है? क्या अत्यंत पिछड़े समुदायों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला है? क्या ग्रामीण क्षेत्रों के वंचित बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध है? क्या निजी क्षेत्र में भी सामाजिक प्रतिनिधित्व और समान अवसर पर गंभीर बहस हो रही है?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल राजनीतिक नारों से नहीं मिलेगा। इसके लिए विश्वसनीय सामाजिक आँकड़ों, पारदर्शी नीतियों और निरंतर मूल्यांकन की आवश्यकता है।
बहुजन समाज के भीतर भी आर्थिक और शैक्षणिक असमानताएँ मौजूद हैं। इसलिए सामाजिक न्याय की राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम बनाने के बजाय समाज के अंतिम व्यक्ति तक अवसर पहुँचाने का साधन बनाना होगा।
मंडल आयोग की मूल भावना तभी सार्थक होगी, जब आरक्षण का लाभ वास्तविक रूप से वंचित समुदायों तक पहुँचे और शिक्षा तथा आर्थिक विकास के रास्ते सबके लिए खुलें।
इतिहास के दो नायक, सामाजिक न्याय की एक यात्रा-
बी. पी. मंडल और विश्वनाथ प्रताप सिंह भारतीय लोकतंत्र के ऐसे दो महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं, जिनकी भूमिकाएँ अलग-अलग होते हुए भी एक ऐतिहासिक उद्देश्य से जुड़ती हैं।
बी. पी. मंडल ने सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को पहचानने के लिए आयोग के माध्यम से तथ्य, तर्क और नीतिगत आधार प्रस्तुत किया। उन्होंने वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व के प्रश्न को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
वी. पी. सिंह ने उस रिपोर्ट को लागू करने का राजनीतिक निर्णय लेकर सामाजिक न्याय के आंदोलन को नई दिशा दी। एक ने परिवर्तन की रूपरेखा तैयार की, दूसरे ने उसे सरकारी नीति में बदलने का साहस दिखाया।
दोनों के योगदान का महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को एक बुनियादी प्रश्न के सामने खड़ा किया—क्या आजादी और लोकतंत्र का लाभ समाज के सभी वर्गों को समान रूप से मिल रहा है?
आज आवश्यकता है कि बी. पी. मंडल को केवल मंडल आयोग के अध्यक्ष और वी. पी. सिंह को केवल आरक्षण लागू करने वाले प्रधानमंत्री के रूप में याद न किया जाए। उनके योगदान को सामाजिक परिवर्तन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक समानता के व्यापक संदर्भ में समझा जाए।
सामाजिक न्याय किसी एक वर्ग के विरुद्ध संघर्ष नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था के निर्माण का संकल्प है, जिसमें किसी व्यक्ति का भविष्य उसके जन्म से निर्धारित न हो।
लोकतंत्र की सार्थकता सत्ता के गलियारों में चेहरों की अदला-बदली से नहीं, बल्कि उन चेहरों को सम्मान और अवसर मिलने से तय होती है, जिन्हें सदियों तक सत्ता, शिक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा से दूर रखा गया।
बी. पी. मंडल की विचारधारा और वी. पी. सिंह का ऐतिहासिक निर्णय इसी लोकतांत्रिक परिवर्तन की यात्रा के महत्त्वपूर्ण पड़ाव हैं। उनकी विरासत हमें याद दिलाती है कि सामाजिक न्याय कोई पूर्ण हो चुका अध्याय नहीं, बल्कि समानता, स्वतंत्रता, बंधुता और मानवीय गरिमा पर आधारित भारत के निर्माण का सतत संघर्ष है।
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