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Dr. Srimati Tara Singh
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अपनी जमीन अपना आसमान

 

अपनी जमीन अपना आसमान l
कहने को तो मैं दलित हूँ
इससे पहले मैं इंसान हूँ
हाँ मैं मान लेता हूँ
वर्णवाद की मरुभूमि पर मैं दलित हो गया हूँ,
ये मेरा अपराध नहीं है
अपराधी तो वो हैं जिनका जमीर मर चुका है l
मैं दलित हूँ, जिंदा हूँ छाती तानकर
मैं भारत की माटी हूँ,
यह अपनी माटी का सम्मान है
तुमने तो मुझे कुत्ते -बिल्ली से कमतर कर दिया
जीवन के हर चौराहे पर,
अत्याचार और अपमान किया l
मैं टूटा पर रुका नहीं उठ खड़ा हुआ,
मैंने तुम्हारे जुल्म की जंजीरो को चटका दिया
मैंने बहुत जुल्म ढोया है मौन
मैं बेज़ुबान नहीं, मेरी आवाज़ शंखनाद करेगी
सदियों का जुल्म तूफान बनेगा
मेरी आवाज़ हुंकार भरेगी
जाति वर्ण के नाम खड़ी हर मीनार ढहेगी l
इतिहास बदलेगा, शूद्र -अशूद्र का भेद मिटेगा
समतावादी समाज बनेगा,भारतवासी बराबर होगा,
दलित, आदिवासी शिक्षा को हथियार बनाएगा,
अपना इतिहास अपनी कहानी लिखेगा
सदियों का संघर्ष अब थम जायेगा
दलित,आदिवासी अपनी जमीन अपना आसमान पायेगा l
नन्दलाल भारती

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