Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

अपने हिस्से की मोहब्बत

 

अपने हिस्से की मोहब्बत
— नन्दलाल भारती
मेरी भी बचपन की उम्र थी,
मुझे भी किसी की खूबसूरती लुभाती थी,
आज भी दिल को भाती है।
एक उम्र आई,
जब मन में बदलाव आया,
विचार उपजने लगे,
आज भी उपजते हैं।
दूसरों के विचार समझे,
सभ्य लोगों के संस्कार लुभाए,
कुछ संस्कार जिए,
आज भी जी रहा हूँ।
मैं जानता हूँ,
उम्र की आहट हो चुकी है,
वह घड़ी भी आएगी,
जब न रूप रिझा पाएगा,
न झूठे, मगर मीठे बोल
मन को बहला पाएँगे।
बस, एक तलाश है—
अपनों के बीच कोई ऐसा मिल जाए,
जो बिना कहे मेरी जरूरतें समझ ले,
बिना उलाहने के हाथ बढ़ा दे,
मेरी खामोशी में छिपी थकान पढ़ ले,
और अपनी उँगलियों का
स्नेहिल एहसास करा दे।
क्योंकि
उम्र के आखिरी मुकाम पर,
अपनों का यही रूप सुहाना लगता है,
न दिखावा, न कोई बनावटी बात,
बस सिरहाने किसी अपने का साथ।
यही है मेरे हिस्से की मोहब्बत,
अपनों के स्पर्श का सच्चा एहसास,
लड़खड़ाते कदमों के लिए
किसी अपने का बढ़ा हुआ हाथ।
जब शब्द साथ छोड़ने लगें,
कोई आँखों की भाषा पढ़ ले,
जब रात कुछ लंबी लगने लगे,
कोई पास बैठकर हाथ थाम ले।
उम्र चाहे जितनी ढल जाए,
मन को अपनापन चाहिए,
जीवन की अंतिम साँझ तलक,
बस अपनों का साथ चाहिए।
— नन्दलाल भारत

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ