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अंतरंग रिपोर्ट

 

अंतरंग रिपोर्ट

— नन्दलाल भारती

“हरिहर साहब, जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ!”

फोन के दूसरी ओर कुछ क्षण खामोशी रही। फिर एक खिलखिलाती आवाज सुनाई l

“अरे वाह, नागार्जुन! तुम्हें मेरा जन्मदिन याद है?”

“जी साहब।”

“पदमुक्त हुए दस साल हो गए। अब मैं सत्तर का होने जा रहा हूँ। मुझे अपना जन्मदिन याद नहीं रहता और तुम्हें याद है... धन्यवाद भाई !”

“साहब, कुछ तारीखें कैलेंडर में नहीं, रिश्तों में दर्ज होती हैं।”

हरिहर साहब हँस पड़े।

“तुम आज भी वैसे ही बोलते हो।”

“आप भी तो वैसे ही सुनते हैं।”

दोनों कुछ क्षण हँसते रहे।

“स्वास्थ्य कैसा है?” हरिहर साहब ने पूछा।

“बिल्कुल ठीक। घर-परिवार सब सकुशल। आप बताइए?”

“मैं भी ठीक हूँ। रिटायरमेंट के बाद शरीर थोड़ा धीमा हुआ है, लेकिन दिमाग अभी भी नौकरी के गलियारों में घूमता रहता है।”

नागार्जुन कुछ क्षण चुप रहा।

“मैंने सोचा, आज के दिन की शुरुआत आपको शुभकामनाओं से करूँ।”

“अच्छा किया।”

हरिहर साहब की आवाज अचानक गंभीर हो गई।

“कुछ अच्छी यादें साथ-साथ चलती हैं। उम्र बढ़ने के साथ वे और बहुमूल्य हो जाती हैं। कठिन समय में सहारा देती हैं। बुरी यादों को...”

वे रुके।

“उन्हें?”

“उन्हें दिल से निकाल देना चाहिए। सड़ती-बजबजाती यादों को भीतर रखकर आदमी खुद ही बीमार होता रहता है।”

नागार्जुन हल्का-सा मुस्कराया।

“कुछ यादें ऐसी होती हैं साहब, जिन्हें दिल से निकाल भी दो तो वे सरकारी फाइलों में पड़ी मिल जाती हैं।”

“कौन-सी फाइल?”

“अंतरंग रिपोर्ट।”

हरिहर साहब की आवाज धीमी हो गई।

“हाँ नागार्जुन... तुम्हारे साथ बुरा हुआ था।”

“इसीलिए तो आप मेरे लिए बहुमूल्य हैं साहब।”

“मैंने क्या किया?”

“आपने मेरी रिपोर्ट पर भरोसा किया था।”

“मैंने तुम्हें वही लिखा था जो मैंने देखा।”

“और वही मेरे लिए जीवन बदलने वाला साबित हुआ।

नागार्जुन का जन्म एक दलित परिवार में हुआ था। अभाव उसके जीवन का पहला शिक्षक था। श्रमिक माता-पिता चाहते थे कि बेटा पढ़े, लेकिन घर की हालत बार-बार रास्ता रोकती।

नागार्जुन ने मजदूरी की, खेतों में काम किया और रातों में जागकर पढ़ाई की। उसने कानून में स्नातक किया, प्रबंधन में उच्च शिक्षा ली और कई व्यावसायिक प्रशिक्षण पूरे किए।

उसके लिए शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं थी। वह उस सामाजिक दीवार को पार करने का रास्ता थी, जिसके सामने उसका परिवार पीढ़ियों से खड़ा था।

नौकरी मिली तो उसने उसे अवसर की तरह लिया।


वह विभाग में क्लर्क था, लेकिन उसकी मेज पर आने वाली फाइलें उसे कभी छोटी नहीं लगीं। जटिल मामले वह नियमों के साथ पढ़ता। लंबित फाइलें निपटाता। जरूरतमंद कर्मचारियों के आवेदन लिखता। किसी गरीब व्यक्ति को सरकारी प्रक्रिया समझानी हो तो वह समय निकाल लेता।
उसकी एक ही आकांक्षा थी—योग्यता के अनुसार आगे बढ़ना।
लेकिन नौकरी के कुछ वर्षों बाद उसने महसूस किया कि दफ्तर में हर कर्मचारी को केवल उसके काम से नहीं देखा जाता..... जाति से देखा जाता l
कभी किसी की जाति पूछी जाती, कभी उसका गाँव, कभी उसका परिचय।
नागार्जुन इन बातों को अनदेखा कर देता।
उसे विश्वास था कि अंततः काम बोलता है।
पहली अंतरंग रिपोर्ट आई।
उसने उत्सुकता से देखा ।
कुछ पंक्तियाँ थीं—
“कार्य के प्रति अपेक्षित तत्परता नहीं। नेतृत्व क्षमता औसत। पदोन्नति के लिए उपयुक्त नहीं।”
नागार्जुन देर तक रिपोर्ट देखता रहा।
सबसे ज्यादा चोट उसे एक शब्द से लगी—
“औसत।”
उसने अधिकारी से पूछा—
“सर, मेरी कमी कहाँ है?”
अधिकारी ने चश्मा उतारकर कहा—
“रिपोर्ट हो गई है। अब उसे बदलने से क्या होगा?”
“लेकिन सर, मुझे बताया तो जाए कि गलती क्या है।”
“नागार्जुन, नौकरी में हर बात का जवाब नहीं मिलता।”
वह बाहर आ गया।
उस दिन पहली बार उसके मन में सवाल उठा—
क्या मेरी योग्यता देखी गई थी, या मेरी जातीय पहचान?
उसने किसी पर सीधा आरोप नहीं लगाया। प्रमाण उसके पास नहीं था। मगर व्यवहार की छोटी-छोटी घटनाएँ उसकी स्मृति में जुड़ती चली गईं।
एक सहकर्मी ने कभी हँसते हुए कहा था—
“तुम पढ़-लिखकर बहुत आगे जाने की सोचते हो।”
नागार्जुन ने पूछा था—
“इसमें गलत क्या है?”
सहकर्मी ने बात टाल दी थी।
दूसरी रिपोर्ट भी वैसी ही आई।
फिर तीसरी फिर चौथी............ और इक्कीसवी
पदोन्नति की सूची निकलती और नागार्जुन का नाम गायब रहता।
उसके साथ नियुक्त हुए कई लोग अधिकारी बन गए।
किसी से उसे ईर्ष्या नहीं थी।
दुख केवल इतना था कि जिन सीढ़ियों पर दूसरे लोग सामान्य गति से चढ़ रहे थे, उसकी सीढ़ियों पर जैसे कोई अदृश्य भार रख दिया गया था।
घर में बच्चे बड़े हो रहे थे।
फीस बढ़ रही थी।
पत्नी कभी-कभी पूछती—
“आपकी पदोन्नति कब होगी?”
नागार्जुन हँसकर कहता—
“जल्दी।”
उसे खुद नहीं मालूम था कि वह पत्नी को जवाब दे रहा है या अपने भीतर बैठे आदमी को।
एक रात पत्नी ने पूछा—
“आप इतने पढ़े-लिखे हैं। फिर भी वहीं क्यों हैं?”
नागार्जुन ने कुछ देर चुप रहकर कहा—
“कभी-कभी योग्यता को रास्ता मिल जाता है, कभी रास्ते में दीवार खड़ी हो जाती है।”
“किसकी दीवार?”
नागार्जुन ने बच्चों की ओर देखा।
“सो जाओ। सुबह स्कूल जाना है।”
इसी दौरान के.बी. सिंग ने उसकी फाइल देखी।
“तुम्हारी रिपोर्ट तुम्हारे काम से मेल नहीं खाती।”
नागार्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“मुझे भी यही लगता है साहब।”
“फिर शिकायत क्यों नहीं की?”
“किससे करता? रिपोर्ट लिखने वालों से या लिखवाने वालों से ?”
के.बी. सिंग कुछ क्षण चुप रहे।
“काम करते रहो। सच को कागज तक पहुँचने में कभी-कभी समय लगता है।”
कुछ समय बाद विभाग में हरिहर साहब आए।
उन्होंने नागार्जुन का काम देखा।
एक दिन पूछा—
“तुम्हारी पदोन्नति क्यों नहीं हुई?”
“मेरी अंतरंग रिपोर्ट।”
“रिपोर्ट खराब है?”
“कागज कहता है।”
“और तुम?”
“मैं कहता हूँ—मेरा काम देख लीजिए।”
हरिहर साहब ने उसका काम देखा। फाइलें देखीं। पुराने रिकॉर्ड देखे। सहकर्मियों से बात की।
फिर उन्होंने रिपोर्ट लिखी—
“कर्मचारी कार्यकुशल, जिम्मेदार एवं अध्ययनशील है। जटिल कार्यों को समयबद्ध ढंग से पूरा करता है। पदोन्नति के लिए उपयुक्त।”
नागार्जुन ने रिपोर्ट पढ़ी।
उसकी आँखें भर आईं।
“धन्यवाद साहब।”
हरिहर साहब बोले—
“धन्यवाद मुझे नहीं। अपने काम को देना।”
उस रिपोर्ट से वह एक ही छलांग में अधिकारी नहीं बन गया।
लेकिन पदोन्नति की एक सीढ़ी खुल गई।
नागार्जुन के लिए वह सीढ़ी बहुत बड़ी थी।
किसी ने पहली बार उसके पद से पहले उसकी योग्यता देखी थी।
कुछ वर्ष बाद उसका स्थानांतरण गुजरात हो गया।
वहाँ उसका अधिकारी था—विरोधकुमार चाहू।
वे स्वयं पिछड़े वर्ग से आते थे नागार्जुन को लगा था कि सामाजिक भेदभाव की पीड़ा समझने वाला व्यक्ति शायद दूसरे की पीड़ा भी समझेगा।
शुरुआत सामान्य रही।
फिर मतभेद शुरू हुए फिर विरोध कुमार चाहू का घोर जातिवादी चेहरा सामने आ गया l
नागार्जुन किसी निर्देश को आँख बंद करके स्वीकार नहीं करता था। नियमों के विरुद्ध कुछ लगता तो प्रश्न करता।
एक दिन विरोधकुमार ने कहा—
“तुम बहुत सवाल पूछते हो।”
“काम समझने के लिए पूछता हूँ सर।”
“तुम्हें लगता है तुम बहुत योग्य हो?”तुम कामचोर, फर्जी डिग्री वाले,आलसी कामचोर हो काम आता नहीं l
नागार्जुन ने शांत स्वर में कहा—
“यह मेरा दावा नहीं है। मेरा काम बताएगा।”
उसके बाद वातावरण बदल गया।
वार्षिक अंतरंग रिपोर्ट आई।
नागार्जुन ने कंप्यूटर पर रिपोर्ट देखा l
इस बार लिखा था—
“कार्य के प्रति अपेक्षित रुचि नहीं। आलसी एवं कामचोर। वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का अनुपालन संतोषजनक नहीं। सेवा में बनाए रखना उचित नहीं।”
वह कुर्सी पर बैठ गया।
दस वर्ष पीछे का वही दर्द उसके सामने खड़ा था।
उसने अधिकारी से पूछा—
“सर, यदि मेरे काम में कमी है तो बताइए।”
“रिपोर्ट में सब लिखा है।”
“कामचोर किस आधार पर?”
“बहुत बहस मत करो।”
“मैं बहस नहीं कर रहा। केवल जानना चाहता हूँ।”
“तुम्हें नौकरी करनी है तो नौकरी करो।”
नागार्जुन बाहर आ गया।
इस बार उसने चुप रहने का फैसला नहीं किया।
उसने अपने काम के रिकॉर्ड जुटाए—फाइलों की संख्या, समय पर निपटाए गए मामलों की सूची, प्रशिक्षण प्रमाणपत्र और प्रशंसा-पत्र।
उसने विभागीय स्तर पर अपनी बात रखी।
मामला लंबा चला।
उसे तनाव हुआ, बीपी शुगर की बीमारी और बढ़ गयी l
घर पर बच्चों ने पूछा—
“पापा, क्या हुआ?”
उसने कहा—
“कुछ नहीं। दफ्तर की एक फाइल है।”
पत्नी उसकी आँखें पढ़ रही थी।
वह जानती थी कि यह सिर्फ फाइल नहीं है।
यह वही कागज था जो परिवार की आर्थिक सुरक्षा तक को प्रभावित कर रहा था।
समीक्षा हुई।
रिपोर्ट में दर्ज कई आरोपों के समर्थन में ठोस तथ्य नहीं मिले जो जातीय घृणा से लिखे गए थे l
नागार्जुन नौकरी से नहीं निकाला गया।
लेकिन इस घटना ने उसके भीतर एक बात हमेशा के लिए बैठा दी—
जातीय पूर्वाग्रह केवल गाली में दिखाई नहीं देता। कभी-कभी वह एक साफ-सुथरे सरकारी कागज पर सुंदर अक्षरों में लिखा होता है।
और यह भी सच था कि पूर्वाग्रह किसी एक जाति या वर्ग की निजी संपत्ति नहीं है। जिस व्यक्ति ने भेदभाव सहा हो, वह भी यदि पद और सत्ता पाकर दूसरे के प्रति वही दृष्टि अपना ले, तो अन्याय का चक्र वहीं से फिर शुरू हो जाता है।
नागार्जुन ने उस दिन तय किया—
वह अपनी पीड़ा को किसी दूसरे के खिलाफ हथियार नहीं बनाएगा।
वर्ष बीत गए।
नागार्जुन सेवानिवृत्त हो गया।
बड़ा पद नहीं मिला।
सरकारी गाड़ी नहीं मिली।
बड़ा बंगला नहीं मिला।
लेकिन उसके बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए थे।
और शायद यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
उसने कभी बच्चों को नहीं बताया कि उनकी फीस भरने के लिए कितनी बार उसने अपनी इच्छाएँ टाली थीं।
वह चाहता था कि वे अपने पिता को असफल कर्मचारी नहीं, संघर्ष से निकलकर खड़ा हुआ आदमी समझें।
इसीलिए वह हरिहर साहब का जन्मदिन कभी नहीं भूलता था।
फोन पर बातचीत फिर शुरू हुई।
हरिहर साहब ने पूछा—
“नागार्जुन, कभी उन लोगों पर गुस्सा नहीं आता?”
“आता था।”
“अब?”
“अब नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि गुस्सा आदमी को उसी जगह बाँधकर रखता है, जहाँ से वह निकलना चाहता है।”
“मलाल?”
नागार्जुन कुछ देर चुप रहा।
“मलाल है।”
“किस बात का?”
“इस बात का कि अगर मेरी योग्यता को समय पर पहचाना जाता तो शायद मैं बड़ा अधिकारी होता। मेरे साथ के लोग बहुत आगे निकल गए। मैं भी जा सकता था।”
हरिहर साहब ने धीरे से कहा—
“यह तुम्हारा व्यक्तिगत नुकसान था।”
“हाँ।”
“और जातीय भेदभाव?”
नागार्जुन की आवाज भर्रा गई।
“वह केवल मेरा नुकसान नहीं था साहब। जब किसी कर्मचारी को उसकी योग्यता के बावजूद पीछे रखा जाता है, तो उसके बच्चों की शिक्षा, परिवार की आर्थिक सुरक्षा और आने वाली पीढ़ी के अवसर भी प्रभावित होते हैं।”
कुछ क्षण दोनों चुप रहे।
फिर हरिहर साहब बोले—
“लेकिन एक बात याद रखना। तुम्हारे साथ जो हुआ, वह तुम्हारी पहचान की सीमा नहीं है।”
“कैसे?”
“क्योंकि किसी ने तुम्हारी रिपोर्ट में जो लिखा, वह तुम्हारा सच नहीं था।”
नागार्जुन खिड़की के पास चला गया।
बाहर सुबह हो रही थी।
“साहब,” उसने कहा, “कभी-कभी सोचता हूँ, मेरी वे पुरानी रिपोर्टें अब कहाँ होंगी?”
“सरकारी रिकॉर्ड में।”
“धूल खा रही होंगी?”
“शायद।”
“और जो सच था?”
हरिहर साहब मुस्कराए।
“वह कहाँ रखा था?”
“लोगों के जीवन में।”
“बस। वही असली अंतरंग रिपोर्ट है।”
नागार्जुन चुप रहा।
हरिहर साहब बोले—
“तुमने कितने लोगो की मदद किया?”आश्रय दिया?
“याद नहीं।”
“कितने अच्छे काम विभाग के हित में किये ?”
“गिनती नहीं की।”
“कितने लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया?”
“उसका हिसाब कौन रखता है?”
“यही तुम्हारी अंतरंग रिपोर्ट है।”
नागार्जुन की आँखें नम हो गईं।
हरिहर साहब आगे बोले—
जिस अधिकारी ने तुम्हें ‘औसत’ लिखा, उसने शायद उस दिन केवल तुम्हारी फाइल देखी थी। जिसने तुम्हें ‘कामचोर’ लिखा, उसने शायद अपनी धारणा को तुम्हारे काम से बड़ा मान लिया था। लेकिन जीवन ने तुम्हारा मूल्यांकन उन शब्दों से नहीं किया।”
नागार्जुन ने धीरे से पूछा—
“फिर किससे किया?”
“तुम्हारे कर्मों से।”
कमरे में कुछ देर मौन रहा।
नागार्जुन की आँखों के सामने जैसे वर्षों की पूरी नौकरी घूम गई—एक छोटी मेज, फाइलों का ढेर, रात तक जलता टेबल लैंप, बच्चों की फीस की रसीद, बीमार -पत्नी की चुप चिंता, खराब रिपोर्ट का लिफाफा, हरिहर साहब के हस्ताक्षर और वह एक सीढ़ी, जो बहुत देर से सही, उसके लिए खुली थी।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“साहब...”
“हाँ?”
“आपने मेरी रिपोर्ट सुधारी थी।”
“याद है।”
“उस दिन आपने मेरी पदोन्नति ही नहीं की थी।”
“फिर?”
“आपने मेरा आत्मविश्वास बचाया था।”
हरिहर साहब कुछ बोल नहीं पाए।
नागार्जुन ने कहा—
“जब लगातार कोई आपको बताता रहे कि आप योग्य नहीं हैं, तो एक समय आदमी खुद पर भी शक करने लगता है। आपने उस दिन मेरी फाइल नहीं, मेरा विश्वास पढ़ा था।”
फोन के उस पार लंबी खामोशी थी।
फिर हरिहर साहब की धीमी आवाज आई—
“नागार्जुन, मैंने केवल वही लिखा था जो सच था।”
नागार्जुन की आँखों में सावन -भादों उमड़ पड़े ।
“काश साहब... सबने यही किया होता।”
“सब नहीं कर पाए।”
“हाँ।”
“लेकिन तुमने क्या किया?”
नागार्जुन ने आँखें पोंछीं।
“मैंने अपनी पीड़ा को अपने बच्चों की विरासत नहीं बनने दिया।”
हरिहर साहब चुप रहे।
नागार्जुन ने आगे कहा—
“मैं चाहता था कि मेरे बच्चे कभी यह न सोचें कि उनके पिता दलित होने के कारण छोटे थे। वे यह सोचें कि उनके पिता ने कठिन समय में भी अपने कर्म को छोटा नहीं होने दिया।”
हरिहर साहब की आवाज काँप गई।
“नागार्जुन... आज तुम्हारी बात सुनकर लगता है, तुम्हारी सबसे बड़ी पदोन्नति किसी सरकारी आदेश में नहीं हुई।”
“कहाँ हुई?”
“तुम्हारे भीतर।”
नागार्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
खिड़की से आती धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
अंतरंग की वह फाइल शायद अब किसी पुराने रिकॉर्ड रूम में धूल खा रही थी।
उस पर किसी अधिकारी के हस्ताक्षर थे।
कुछ कठोर शब्द थे।
कुछ टिप्पणियाँ थीं।
लेकिन वे शब्द अब नागार्जुन का जीवन तय नहीं करते थे।
हरिहर साहब ने पूछा—
“एक बात बताओ। अगर आज तुम्हें अपनी अंतरंग रिपोर्ट खुद लिखनी हो तो क्या लिखोगे?”
नागार्जुन कुछ देर सोचता रहा।
फिर बहुत धीमे स्वर में बोला—
“शायद लिखूँगा—‘पद में सामान्य, संघर्ष में असामान्य।’”
हरिहर साहब हँसते हुए बोले—
“और?”
नागार्जुन की आवाज भर्रा गई—
“‘जाति से पहले इंसान बनने की कोशिश की।’”
कुछ क्षण बाद हरिहर साहब बोले—
“और अंतिम टिप्पणी?”
नागार्जुन ने खिड़की के बाहर देखा।
सुबह पूरी तरह उतर चुकी थी।
सड़क पर बच्चे स्कूल जा रहे थे।
एक लड़का अपनी माँ की उँगली पकड़े हुए था।
नागार्जुन की आँखें उस दृश्य पर टिक गईं।
उसने कहा—
“अंतिम टिप्पणी होगी—‘जिसने अन्याय सहा, लेकिन अन्याय करना नहीं सीखा।’”
हरिहर साहब की आँखें भी भर आईं।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
“नागार्जुन, यही तुम्हारी असली अंतरंग रिपोर्ट है।”
फोन कट गया।
नागार्जुन बहुत देर तक वहीं खड़ा रहा।
उसने अलमारी खोली।
पुरानी फाइलों के बीच एक पीला पड़ा लिफाफा था।
उसने उसे बाहर निकाला।
लिफाफे पर पुराने अक्षर थे—
“गोपनीय—अंतरंग रिपोर्ट।”
उसने लिफाफा खोला।
कागज पीला पड़ चुका था।
स्याही फीकी थी।
शब्द अब भी मौजूद थे।
औसत।
पदोन्नति के लिए उपयुक्त नहीं।
कार्य में अपेक्षित तत्परता नहीं।
नागार्जुन कुछ देर उन्हें देखता रहा।
फिर उसने कागज मोड़ा।
फाड़ा नहीं।
जलाया नहीं।
बस वापस लिफाफे में रख दिया।
उसने मन ही मन कहा—
“तुम्हारा अपना समय था। तुमने अपना फैसला लिख दिया। अब मेरी बारी है।”
अलमारी बंद करके वह बाहर आया।
दरवाजे पर उसका पोता स्कूल की किताब लेकर खड़ा था।
“दादाजी, यह सवाल समझ नहीं आ रहा।”
नागार्जुन ने मुस्कराकर किताब ले ली।
“आओ, साथ बैठकर समझते हैं।”
वह बच्चे के पास बैठ गया।
कुछ देर बाद पोते ने पूछा—
“दादाजी, आप इतने पढ़े-लिखे होकर इतने साल एक ही नौकरी में क्यों रहे?”
नागार्जुन ने बच्चे के सिर पर हाथ फेरा।
एक पल के लिए उसकी आँखों में पुरानी पीड़ा तैर गई।
फिर वह मुस्कराया।
“क्योंकि बेटा, कभी-कभी रास्ता लंबा होता है।”
“तो आप रुके क्यों नहीं?”
नागार्जुन ने उसकी किताब खोली।
“रुका था... लेकिन चला भी बहुत।”
बच्चा समझा नहीं।
नागार्जुन ने उसकी ओर देखा।
“तुम बस इतना याद रखना—किसी को तुम्हारे बारे में कुछ भी लिखने दो, लेकिन अपने कर्मों की रिपोर्ट हमेशा अच्छी रखना।”
बच्चा मुस्करा दिया।
नागार्जुन ने किताब पर झुकते हुए महसूस किया—
उसकी नौकरी समाप्त हो चुकी थी।
उसका पद समाप्त हो चुका था।
उसके खिलाफ लिखी गई रिपोर्टें भी अपने समय के साथ बूढ़ी हो चुकी थीं।
लेकिन उसकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।
क्योंकि सरकारी फाइल में दर्ज अंतरंग रिपोर्ट आदमी का पद बता सकती है; उसके जीवन का मूल्य नहीं।
और उस दिन, पहली बार, नागार्जुन को लगा—
उसकी सबसे सच्ची अंतरंग रिपोर्ट किसी अधिकारी ने नहीं लिखी थी।
वह उसके बच्चों की आँखों में थी।
उसके किए हुए कामों में थी।
उन लोगों की स्मृतियों में थी, जिन्हें उसने बिना किसी स्वार्थ के सहारा दिया था।
और समय के उस विशाल रजिस्टर में, जहाँ जाति का कोई कॉलम नहीं था—
सिर्फ कर्म का।
उसकी रिपोर्ट के सामने लिखा था—
**“पद में साधारण।
संघर्ष में असाधारण।
मनुष्यता में—उत्तीर्ण।”**
नागार्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
एक आँसू चुपचाप गाल से उतरकर उसके हाथ पर गिरा।
इस बार उसने उसे पोंछा नहीं।
उसे लगा—
शायद यह आँसू हार का नहीं,
देर से मिले न्याय का था।
— समाप्त —

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