अंतिम दोस्त (दादा-पोते पर आधारित एक सामाजिक कहानी )
— नन्दलाल भारती
धर्मेश बाबू ने जेब से रूमाल निकाला और माथे पर उभर आई पसीने की मोटी-मोटी बूँदें धीरे-धीरे पोंछने लगे। उम्र के इस पड़ाव पर धूप से अधिक थकान रास्ते की नहीं, स्मृतियों की होती है। शरीर कुछ कदम चलकर हाँफने लगता है, मगर मन वर्षों पीछे लौटने में एक क्षण भी नहीं लगाता।
दरवाजे पर खड़े यशवीर बाबू ने उन्हें देखते ही आगे बढ़कर दोनों हाथों से उनका हाथ थाम लिया।
“बहुत तकलीफ हुई यहाँ तक पहुँचने में?”
धर्मेश बाबू मुस्करा दिए।
“कैसी तकलीफ? मुलाकात के आगे तकलीफ की क्या औकात!”
दोनों मित्र कुछ क्षण एक-दूसरे को देखते रहे।
चेहरे बदल गए थे। आवाजों में कंपन उतर आया था। बालों की कालिमा जाने कब सफेदी में बदल गई थी। लेकिन आँखों में बची पहचान ने उम्र की सारी दूरी पाट दी थी।
यशवीर बाबू उन्हें भीतर ले गए।
कमरे में प्रवेश करते ही धर्मेश बाबू की नजर दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी। तस्वीर में यशवीर बाबू और सुहानी विवाह के शुरुआती दिनों में खड़े थे। दोनों के चेहरों पर भविष्य के सपनों की वह चमक थी, जो समय के साथ अक्सर घर की अलमारियों में रखे पुराने कपड़ों की तरह धुँधली पड़ जाती है।
धर्मेश बाबू सोफे पर बैठ गए। यशवीर बाबू सामने वाली कुर्सी पर।
“बताइए,” यशवीर बाबू ने पूछा, “कैसे बीत रहा है बुढ़ापा?”
धर्मेश बाबू हल्का-सा हँसे।
“पोता-पोती, नातिन-नातिन के साथ मौज में।”
“वाह! अद्भुत सुख!”
“हाँ,” धर्मेश बाबू बोले, “बढ़िया बीत रही है जिंदगी। बेटा-बहू हैं, पोता-पोती हैं... घर खाली नहीं है।”
यशवीर बाबू ने उनकी ओर देखा।
“परदेसी हैं?”
धर्मेश बाबू की मुस्कान क्षणभर के लिए ठिठक गई।
“मेरे भी परदेसी हैं।”
“गर्मियों की छुट्टियों में, होली-दीवाली में सब साथ होते होंगे?”
“हाँ। जब आते हैं तो घर की दीवारों में भी जैसे आवाजें उग आती हैं। बच्चों की हँसी, भागते कदम, खिलौनों की खनक... लगता है, मकान फिर से घर हो गया।”
कुछ देर रुककर उन्होंने कहा—
“माता-पिता से लगाव कम नहीं होता, यशवीर। बस जिंदगी बच्चों को दूर ले जाती है।”
यशवीर बाबू मुस्कराए, मगर उनकी आँखों में झाँकते हुए बोले—
“दूरी सिर्फ किलोमीटरों की हो तो आदमी सह लेता है।”
धर्मेश बाबू ने उनकी ओर देखा।
“और अगर?”
“अगर दूरी घर के भीतर पैदा हो जाए तो?”
धर्मेश बाबू चुप हो गए।
कुछ क्षण बाद धीमे स्वर में बोले—
“आना-जाना शुरू हुआ है... लेकिन अभी बहुत दूरी है।”
“किस बात की?”
धर्मेश बाबू खिड़की के बाहर देखते हुए बोले—
“बहू को हम लोग पसंद नहीं हैं। उसे बेटी समझकर घर में लाए थे, लेकिन धीरे-धीरे वह हमसे ऐसी दूर हुई कि अब लगता है जैसे हम उसके लिए अपने ही घर में पराए हैं।”
यशवीर बाबू की भौंहें सिकुड़ गईं।
“अशोक?”
“अशोक पत्नी और उसके मायके की इच्छाओं के बीच ऐसा फँस गया है कि उसे लगता है पत्नी को खुश रखना ही सबसे बड़ा धर्म है।”
“और माता-पिता?”
धर्मेश बाबू हँसे। वह हँसी हँसी नहीं थी; जैसे सूखी लकड़ी के भीतर कहीं कोई आवाज टूटकर रह गई हो।
“माता-पिता... वे तो उसके जीवन की पुरानी फाइल हैं। जरूरत पड़े तो खोल ली, वरना अलमारी में रख दी।”
यशवीर बाबू ने सिर झुका लिया।
इतने में सुहानी चाय और नाश्ता लेकर आ गईं।
“पुराने दोस्तों की बातें खत्म नहीं होंगी,” उन्होंने मुस्कराकर कहा, “पहले चाय पी लीजिए।”
उन्होंने दोनों के सामने कप रखे।
धर्मेश बाबू ने सुहानी की ओर देखा।
“आप कैसी हैं?”
सुहानी ने सहज स्वर में कहा—
“जैसी आप देख रहे हैं।”
यशवीर बाबू हँस पड़े।
“इनसे ज्यादा मजबूत कौन होगा?”
सुहानी ने उनकी ओर देखा। फिर धीमे स्वर में बोलीं—
“हमारे हिस्से में एक सुख नहीं आया।”
धर्मेश बाबू ने पूछा—
“कौन-सा सुख?”
“नवजातशिशु यानि पोते को अपनी गोद में खिलाने का।”
कमरे की हवा जैसे अचानक भारी हो गई।
धर्मेश बाबू ने यशवीर बाबू की ओर देखा।
“हाँ, भाग्यवान ठीक कह रही हो। मगर दुनिया में आए अपने ‘प्रथम दोस्त’ को उसके ‘अंतिम दोस्त’ की छाती का स्पर्श भी न मिल पाए... क्या यह दुःख कम है?”
सुहानी कुछ नहीं बोलीं।
उनकी उँगलियाँ साड़ी के पल्लू को सहलाती रहीं।
धर्मेश बाबू की आवाज भर्रा गई—
“बच्चा दुनिया में आया और दादा उसके पास नहीं था। उसने पहली बार आँखें खोलीं और मैं उसे देखने के लिए वहाँ नहीं था। उसने पहली बार रोया होगा... किसी और ने उसे चुप कराया होगा। पहली बार मुस्कुराया होगा... किसी और की उँगली पकड़ी होगी।”
वे अचानक रुक गए।
लेकिन आँखें नहीं रुकीं। उनमें से आँसू रिसते रहे।
यशवीर बाबू ने उनकी ओर देखा।
धर्मेश बाबू ने नजरें झुका लीं।
सुहानी ने धीरे से कहा—
“लेकिन आत्मसंतोष का भी तो कोई मूल्य होता है।”
“कैसा आत्मसंतोष?”
“हमने अपना कर्तव्य निभाया। बेटे को पढ़ाया, बढ़ाया, जीवन दिया। उससे बदले में कुछ माँगा नहीं।”
धर्मेश बाबू मुस्कराए।
“बदले में माँगा भी क्या था?”
सुहानी चुप रहीं।
“बस इतना कि जब हमारा शरीर बूढ़ा हो जाए तो वह कभी-कभी हमारी आँखों में झाँक लिया करे।”
उनकी आवाज धीमी हो गई।
“बस इतना कि जब उसके घर कोई नया जीवन आए तो उस जीवन की पहली खुशियों में हमारे हिस्से की भी थोड़ी जगह हो।”
कुछ देर तक कोई नहीं बोला।
फिर धर्मेश बाबू ने जैसे अपने ही भीतर से एक प्रश्न निकाला—
“अशोक के सास-ससुर ने हमारे हिस्से का सुख छीन लिया... क्या वे सुखी रह पाएँगे?”
सुहानी ने शांत स्वर में कहा—
“वह तो समय बताएगा।”
धर्मेश बाबू ने सिर हिलाया।
“समय सब बताएगा, लेकिन कुछ चीजें समय भी वापस नहीं कर पाता।”
“क्या?”
“पहला स्पर्श।”
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
“प्रथम दोस्त का पहला स्पर्श।”
यशवीर बाबू चुपचाप उनकी ओर देखते रहे।
अशोक के जन्म की स्मृति उनके भीतर भी आज तक जीवित थी।
वह समय कठिन था।
नौकरी छोटी थी। आमदनी सीमित। घर में जरूरतें बड़ी थीं और उससे भी बड़ा था दफ्तर में अधिकारियों का शोषण, उत्पीड़न और अन्याय।
अशोक बीमार पड़ता तो यशवीर बाबू और सुहानी सारी रात उसके सिरहाने बैठे रहते।
कभी बच्चे का माथा छूते।
कभी पानी की पट्टी रखते।
कभी खिड़की से बाहर देखते और मन ही मन प्रार्थना करते—
“हे भगवान! इसकी बीमारी मुझे दे देना।”
अशोक बड़ा हुआ।
स्कूल गया।
एक दिन दौड़ता हुआ घर आया—
“पापा! आज मास्टरजी ने कहा कि मैं बहुत आगे जाऊँगा।”
यशवीर बाबू ने उसे सीने से लगा लिया।
“तू जितना आगे जाएगा, मैं उतना पीछे रह जाऊँगा।”
अशोक कुछ समझा नहीं।
“क्या मतलब?”
यशवीर बाबू हँस पड़े।
“मतलब यह कि एक दिन तू इतना बड़ा आदमी बनेगा कि तेरे पिता को तुझ पर गर्व होगा।”
“और आप?”
“मैं?”
उन्होंने उसके बालों में हाथ फेरा।
“मैं वहीं रहूँगा... जहाँ से तुझे आगे जाते देख सकूँ।”
वह बात सच हुई।
अशोक आगे बढ़ता गया।
पढ़ाई पूरी हुई। नौकरी मिली। शहर बदल गया। फिर विवाह हुआ।
शुरुआत में सब कुछ सामान्य लगा।
लेकिन धीरे-धीरे यशवीर बाबू को महसूस हुआ कि बेटा उनसे दूर नहीं गया था; उसके आसपास की दुनिया उनसे दूर होती चली गई थी।
फिर एक सुबह फोन आया।
“पापा...”
अशोक की आवाज काँप रही थी।
“हाँ बेटा।”
“आप दादा बन गए।”
यशवीर बाबू कुछ क्षण बोल ही नहीं पाए।
“क्या कहा?”
“बेटा हुआ है।”
फोन उनके हाथ से लगभग छूट गया।
“सुहानी!”
उनकी आवाज में ऐसा उल्लास था, जैसे वर्षों बाद कोई खोया हुआ मौसम लौट आया हो।
सुहानी दौड़ी हुई आईं।
“क्या हुआ?”
यशवीर बाबू की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“तुम दादी बन गईं।”
सुहानी ने दोनों हाथ मुँह पर रख लिए।
उस दिन घर में मिठाई बँटी। दीया जला। यशवीर बाबू ने अपने माता-पिता की तस्वीर के सामने सिर झुकाया।
रात को उन्होंने कहा—
“सुहानी, मैं अपने पोते के लिए कुछ खरीदूँगा।”
“क्या?”
“कुछ कपड़े... जिन पर हमारा स्पर्श होगा।”
अगले दिन वे बाजार गए और बच्चे के लिए ढेर सारे कपड़े खरीद लाए।
कपड़ों को देखकर वे देर तक मुस्कराते रहे।
फिर अचानक बोले—
“काश, सब कुछ ठीक होता। हम अपने हाथों से उसे पहनाते। अब तो डाक से भेजना पड़ेगा।”
सुहानी ने उनके कंधे पर हाथ रखा।
“हमारा आशीर्वाद तो पहुँच जाएगा।”
यशवीर बाबू कपड़ों का पैकेट उठाकर पोस्ट ऑफिस की ओर चल पड़े।
रास्ते में अचानक उनके कदम ठिठक गए।
उन्होंने पैकेट को देखा और बुदबुदाए—
“काश... अंतिम दोस्त के सामने उसका पहला दोस्त होता।”
फिर स्वयं ही मुस्करा दिए।
“कोई बात नहीं। यह दिन भी बीत जाएगा। अंतिम दोस्त खुद आएगा, तब दिल खोलकर आशीर्वाद देंगे।”
कुछ दिनों बाद उन्होंने अशोक को फोन किया।
फोन नहीं उठा।
शायद श्रेया आसपास थी। शायद नहीं थी। लेकिन यशवीर बाबू के मन में आशंकाएँ बढ़ती जा रही थीं।
कुछ देर बाद अशोक ने बाहर जाकर फोन किया।
सुहानी ने धीरे से पूछा—
“बेटा, हम आ जाएँ?”
कुछ क्षण चुप्पी रही।
“हम दोनों का मन बच्चे को देखने का हो रहा है।”
फिर भी आवाज में एक डर था।
“आ जाएँ?”
दूसरी ओर कुछ क्षण खामोशी रही।
फिर फोन कट गया।
यशवीर बाबू देर तक मोबाइल हाथ में लिए खड़े रहे।
सुहानी ने पूछा—
“नहीं जाना है?”
उन्होंने सिर हिला दिया।
उस रात उन्होंने पहली बार महसूस किया कि आदमी कभी-कभी अपने ही बेटे के घर जाने के लिए भी अनुमति का मोहताज हो जाता है।
कई बरस बाद अशोक पत्नी श्रेया और बच्चे के साथ आया।
दरवाजे पर यशवीर बाबू खड़े थे।
कार रुकी।
अशोक उतरा।
उसकी गोद में बच्चा था।
श्रेया भी कार से उतर गई।
यशवीर बाबू की साँस जैसे अटक गई।
छोटा-सा चेहरा।
बंद मुट्ठियाँ।
आँखों में अनजान दुनिया की चमक।
उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया।
“आओ...”
सुहानी आरती की थाली सजा लाई थीं।
श्रेया ने बच्चे को थोड़ा पीछे कर लिया।
“अभी छोटा है, मम्मी।”
यशवीर बाबू का हाथ हवा में ही रुक गया।
उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की।
“हाँ... अभी छोटा है।”
उस क्षण उन्हें पहली बार समझ आया कि कुछ दूरियाँ दरवाजे से नहीं, मन से तय होती हैं।
रात को बच्चा रोया।
यशवीर बाबू अपने कमरे से बाहर आए।
उन्होंने बहू के कमरे के बाहर खड़े होकर बच्चे के रोने की आवाज सुनी।
उनका मन हुआ कि दरवाजा खटखटाएँ।
लेकिन उन्होंने हाथ वापस खींच लिया।
“दादा होने का भी अपना समय होता है,” उन्होंने स्वयं को समझाया।
सुबह बच्चे को दूर से देखा।
उसकी छोटी-सी उँगली हवा में हिल रही थी।
यशवीर बाबू ने अपनी उँगली उसकी ओर बढ़ाई।
दोनों उँगलियों के बीच कुछ इंच की दूरी थी।
बस उतनी ही दूरी थी, जितनी उनके जीवन और उनके ‘अंतिम दोस्त’ के बीच।
समय चलता रहा।
बच्चा बड़ा होता गया।
पहली बार बैठा।
पहली बार चला।
पहला शब्द बोला।
हर उपलब्धि की खबर फोन पर चोरी छिपे आती रही।
यशवीर बाबू हर खबर पर खिल उठते।
“उसने पहला शब्द क्या बोला?”
“पा...”
यशवीर बाबू मुस्कराए।
“अच्छा है।”
फिर एक दिन फोन आया।
“दादाजी!”
यशवीर बाबू चुप रह गए।
“क्या हुआ पापा?” अशोक ने पूछा।
“कुछ नहीं बेटा... बच्चे ने ‘दादाजी’ कहा?”
“हाँ।”
यशवीर बाबू ने आँखें बंद कर लीं।
“फिर तो वह मुझे पहचानने लगा।”
“सबको पहचानता है। चाचा, बुआ, दादा-दादी...”
“कैसे?”
“पूरे परिवार की तस्वीरें दिखाकर।”
उस दिन यशवीर बाबू देर तक अपने कमरे में बैठे उस एक शब्द को दोहराते रहे—
“दादाजी... दादाजी...”
जैसे कोई सूखी जमीन पहली बारिश की बूँद को बार-बार छूती है।
एक बार अशोक अपने परिवार के साथ आया।
बच्चा अब थोड़ा बड़ा था।
यशवीर बाबू उसे देखकर मुस्कराए।
बच्चा पहले तो उन्हें देखता रहा।
फिर अचानक दौड़कर उनके पास आया—
“दादाजी!”
यशवीर बाबू झुक गए।
बच्चे ने उनके गले में बाँहें डाल दीं।
वह क्षण वर्षों की तपस्या का फल था।
उन्होंने बच्चे को उठा लिया। छाती से लगा लिया। आँखें बंद कर लीं।
उनकी उँगलियाँ बच्चे की पीठ पर काँप रही थीं।
उन्होंने फुसफुसाकर कहा—
“मेरे अंतिम दोस्त...”
बच्चे ने पूछा—
“अंतिम दोस्त कौन?”
यशवीर बाबू हँसते हुए रो पड़े।
“तुम।”
“आप मेरे दोस्त हैं, दादाजी?”
“हाँ, गौरव।”
“प्रथम?”
यशवीर बाबू ने उसे और कसकर सीने से लगा लिया।
“तुम मेरे अंतिम दोस्त हो, गौरव।”
गौरव ने मासूमियत से पूछा—
“और आप?”
यशवीर बाबू ने हँसकर कहा—
“मैं?”
“आप भी मेरे दोस्त?”
“हाँ। मैं तुम्हारा प्रथम दोस्त।”
गौरव खिलखिला पड़ा।
“तो आप मेरे प्रथम दोस्त और मैं आपका अंतिम दोस्त!”
यशवीर बाबू की आँखें भर आईं।
दूर खड़ी सुहानी यह दृश्य देख रही थीं।
उनकी आँखों में भी आँसू थे।
उस दिन पहली बार उन्हें लगा कि प्रतीक्षा व्यर्थ नहीं जाती।
वह बस अपना समय चुनती है।
लेकिन विदा का समय जल्दी आ गया।
गौरव दरवाजे पर खड़ा था।
“दादाजी, जल्दी आना।”
यशवीर बाबू ने हाथ उठाया।
“गौरव बुलाएगा तो जरूर आऊँगा।”
गौरव बोला—
“मैं बुलाऊँगा... दादा-दादी, दोनों को।”
कार आगे बढ़ गई।
यशवीर बाबू बहुत देर तक सड़क को देखते रहे।
सुहानी ने उनके कंधे पर हाथ रखा।
“अंदर चलिए।”
उन्होंने अचानक पूछा—
“सुहानी, क्या बच्चे बड़े होकर अपने माता-पिता को भी ऐसे ही दूर कर देते हैं?”
सुहानी ने उत्तर नहीं दिया।
यशवीर बाबू स्वयं बोले—
“शायद नहीं। शायद हम ही उनके रास्ते में खड़े होने लगते हैं।”
“आपने तो कभी रास्ता नहीं रोका।”
“लेकिन प्रेम भी कभी-कभी बोझ समझ लिया जाता है।”
सुहानी ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“आप बोझ नहीं हैं।”
यशवीर बाबू मुस्कराए।
“तुम हो न?”
“हाँ।”
“बस... कभी-कभी मन करता है कि कोई और भी कह दे।”
वर्ष बीतते गए।
गौरव स्कूल जाने लगा। फिर ऑनलाइन पढ़ाई। फिर नई दुनिया।
यशवीर बाबू की दुनिया छोटी होती गई।
सुबह की चाय।
कुछ पौधे।
जीने के लिए कलम और किताबें।
सुहानी।
और हाँ—मोबाइल की स्क्रीन पर अंतिम दोस्त गौरव का चेहरा।
कभी वीडियो कॉल आती—
“दादाजी, देखो मेरा प्रोजेक्ट!”
“बहुत अच्छा।”
“दादाजी, मैं दौड़ में प्रथम आया।”
यशवीर बाबू हँसते—
“मेरा अंतिम दोस्त हमेशा प्रथम रहेगा।”
“ओके दादाजी! मेरे प्रथम दोस्त!”
गौरव खिलखिला देता।q
कॉल कट जाती।
कमरा फिर शांत हो जाता।
यशवीर बाबू मोबाइल को कुछ देर तक देखते रहते।
फिर कहते—
“अच्छा, अब तुम अपनी दुनिया में जाओ।”
मानो गौरव सचमुच उनके सामने बैठा हो।
एक दिन धर्मेश बाबू उनसे मिलने आए।
बातों-बातों में यशवीर बाबू ने वही दर्द कह दिया, जो वर्षों से भीतर दबा था।
“समय बीत जाएगा, धर्मेश। लेकिन प्रथम दोस्त के प्रथम स्पर्श से वंचित रहने का दर्द कैसे मिटेगा?”
धर्मेश बाबू ने उनकी ओर देखा।
यशवीर बाबू ने पूछा—
“दिल को सुकून और सुख तो वही देगा, है न?”
“कौन?”q
“प्रथम दोस्त।”
धर्मेश बाबू मुस्कराए।
“तुम्हारा अंतिम दोस्त?”
यशवीर बाबू की आँखें चमक उठीं।
“हाँ।”
सुहानी ने मुस्कुराते हुए कहा—
“अंतिम दोस्त को प्रथम दोस्त का इंतजार रहेगा।”
यशवीर बाबू ने पत्नी की ओर देखा।
“तुमने आज मेरी बात कह दी।”
उन्होंने मोबाइल उठाया।
स्क्रीन पर गौरव की तस्वीर थी।
उन्होंने तस्वीर को उँगली से छुआ।
“देख रहे हो, धर्मेश?”
कोई उत्तर नहीं था।
फिर भी उन्हें लगा, जैसे स्क्रीन के उस पार से आवाज आई—
“दादाजी!”
यशवीर बाबू की आँखें भर आईं।
उन्होंने मोबाइल को सीने से लगा लिया।
कुछ देर बाद धीरे से बोले—
“मैं इंतजार करूँगा।”
सुहानी ने पूछा—
“किसका?”
यशवीर बाबू मुस्कुराए।
“अपने अंतिम दोस्त का।”
फिर कुछ क्षण बाद उन्होंने जोड़ा—
“जब तक साँस है।”
कमरे में सन्नाटा था।
बाहर शाम उतर रही थी।
आकाश में सूरज की आखिरी किरणें दीवार पर टिककर जैसे ठहरना चाह रही थीं।
यशवीर बाबू ने आँखें बंद कर लीं।
उन्हें लगा—कोई नन्हा हाथ उनकी उँगली पकड़ रहा है।
शायद वह सच नहीं था।
शायद स्मृति थी।
शायद प्रतीक्षा।
लेकिन बुजुर्गों के जीवन में कभी-कभी स्मृति ही स्पर्श बन जाती है और प्रतीक्षा ही रिश्ते की आखिरी साँस।
यशवीर बाबू उसी प्रतीक्षा में बैठे रहे।
उन्हें पता था—
दूरी चाहे जितनी हो जाए, रक्त का रिश्ता किसी न किसी दिन दरवाजा खटखटाता है।
और उस दिन—
एक बूढ़ा पिता नहीं,
एक बच्चा अपने अंतिम दोस्त का इंतजार कर रहा होगा।
क्योंकि जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुके यशवीर बाबू के लिए गौरव केवल पोता नहीं था—
वह उनका अंतिम दोस्त था।
और प्रथम दोस्त को हमेशा अपने अंतिम दोस्त की प्रतीक्षा रहती है।
— समाप्त —
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