कहानी: अनकही लव स्टोरी/नन्दलाल भारती
मैं, नन्दलाल भारती,
आजमगढ़ के गांव चौकी का हूँ
अहिल्या नगरी इंदौर में रहता हूँ
पढ़ता हूँ,लिखता हूँ, सुनता और सुनाता हूँ l
दोस्तों अपने ही पिटारे से आज कहानी
अनकही लव स्टोरी सुनाने आया हूँ l
एग्जाम प्रिपरेशन की छुटियां ख़त्म हो चुकी थी l शिक्षा विभाग ने परीक्षा का टाइम टेबल जारी कर दिया था l उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाके की गर्मी अप्रैल से ही उग्र रूप धारण करने लगती है l
मई-जून की लू के थपेड़े आदमी को वैसे भुजने लगता है जैसे भाड़ में अन्न लायक होते हैं l कितने बेचारे मर भी जाते हैं l इससे लू का अंदाजा लगाया जा सकता है l
ऐसे समय में परीक्षा, खैर परीक्षा तो देना ही पड़ता है l सड़क तो ठीक पर गाड़ी-मोटर कभी-कभार धूल के गुबार में समाये दिखाई पड़ जाते थे l गांव वाले पैदल, साइकिल, ईक्का, बैलगाडी का उपयोग बाजार-हाट के लिए करते थे l हाँ चुनाव के समय सफ़ेद अम्बेसडर कार और जीप खूब नजर आ जाती थी l आम ग्रामीणों के लिए बाजार-हाट पंद्रह-बीस किलोमीटर आने जाने में सुबह से शाम हो जाती थी l
सरकारी स्कूल भी बहुत दूर हुआ करते थे,पर उस वक्त सरकारी स्कूलों में पढ़ाई अव्वल दर्जे की होती थी l गरीब-अमीर एक साथ पढ़ लेते थे l हाँ एक बात बहुत बुरी थी,जातिवाद का विषैला जहर जो था, समता-विरोधी समाज जहर तो अधिक उगल रहा था जैसे मिल-फैक्ट्री के धुएँ l
सूरज नसीब वाला था l प्राइमरी स्कूल उसके गांव के पीछे दो-तीन किलोमीटर दूर था पर स्कूल पहुंचना कठिन था, खेतों की मेड़ो से होकर जाना पड़ता था, जिसमें घंटो लगते थे, किसी के खेत में से गुजर तो रास्ता भी बंद कर दिया जाता l
जूनियर हाई स्कूल तो सूरज के घर के ठीक सामने था l इसी स्कूल में सूरज पढ़ रहा था,अब उसे आठवीं बोर्ड की परीक्षा देना l परीक्षा देना घर से आना-जाना करना, गांव के परीक्षार्थियों के लिए बहुत कठिन था और सूरज के लिए तो और मुश्किल l स्कूल प्रबंधन ने छात्रों के ठहरने की व्यवस्था एक धर्मशाला में कर दिया था l इतनी सहूलियत थी, परीक्षा केंद्र साईकिक यार पैदल पहुँचा जा सकता था l
परीक्षा का पहला दिन था l परीक्षा केंद्र राष्ट्रीय इंटर कालेज में था l इस कालेज के मैदान में भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी भाषण भी दे चुकी थी l सूरज स्कूल तब जाना शुरू ही किया था l सूरज को उसके पिता साईकिल पर बिठाकर प्रधानमंत्री का भाषण सुनाने को ले गए l इंदिराजी को देखने-सुनने के लिए बहुत दूर-दूर से लोग आये हुए थे l कालेज के मैदान में इतनी भीड़ थी कि पैर रखने की जगह नहीं थी l
कालेज का मैदान तो बहुत बड़ा था पर मैदान में भीड़ भेड़-बकरियों जैसी भरी थी l प्रधानमंत्री का हेलिकापटर जब उतरा और उड़ा था तो पूरे मैदान में धूल ही धूल, लोगों के गालों पर धूल ऐसे चिपक गयी थी, जैसे पाउडर l पहली बार सूरज इतना विशाल कालेज और कालेज का मैदान देखा था l कालेज को देखकर वह बहुत प्रभावित हुआ था l आगे की पढ़ाई वह इसी राष्ट्रीय इंटर कालेज से करने का सपना भी देख लिया l
राष्ट्रीय कालेज में पढना तो दूर था परन्तु उसी कालेज की पहली मंजिल के बड़े से हाल में सूरज बोर्ड की परीक्षा दे रहा था l हाल में डर और खौफ था l डरावना सा सन्नाटा पसरा हुआ था l यह कालेज कई और स्कूलों का परीक्षा केंद्र था l
डर और खौफ का माहौल इसलिए था कि एक प्रवेक्षक ने एक परीक्षार्थी को नकल करते हुए पकड़ लिया था l उस लडके को प्रवेक्षक ने इतनी बुरी तरह से पीटा था कि उसके नाक से खून पानी की तरह बहा था l इसी खौफ के माहौल में सूरज को पीछे से हल्की-हल्की आवाजे आ रही थीl
खौफ तो भरपूर पसरा हुआ था, सूरज कनअंखिया पीछे देखा तो वह एक लड़की थी l वह लड़की याचना भरी निगाहों से सूरज की तरफ देख रही थी और उसकी आँखों से आँसू लुढ़क रहे थे l
मैथ का पेपर बहुत कठिन हैl मदद कर दो वह लड़की धीरे -धीरे गुड़गिड़ा कर बोल रही थी l
खौफ इतना था कि मुंह से आवाज नहीं फुट रही थी सूरज ने इंकार इशारे में सिर इधर-उधर किया l
लड़की याचना भरी निगाहों से देख रही थी, उसकी डबडबाई हुई थी l लड़की के आंसूओ को देखकर सूरज नरम पड़ गया l आख़िरकार, वह पीछे बैठी हुई लड़की को मौका देख-देखकर अपनी कॉपी दिखा देता l लड़की के मैथ का पेपर ठीक-ठाक हो गया l
कहते हैं न हवन में हाथ काले हो जाते हैं, उस अनजान लड़की के सवाल हल करवाने में सूरज का मैथ का ही पेपर बिगड़ प्रवेक्षक ने कॉपी छिन लिया l
एग्जाम हाल से निकलते हुए अनजान स्कूल की अनजान लड़की तितली सी चहकते हुए धन्यवाद दिया और बोली मैं सरोज राय l
शर्मिंले स्वभाव का खांटी गाँव का लड़का बस इतना बोला-सूरज l
दोनों साथ-साथ कुछ दूर तक गए पर कोई संवाद नहीं l वह तितली सी लड़की एक कार में बैठ गयी, जहां तक सूरज दिखाई पड़ा, वह मुड़मुड़ कर देखती रही और कुछ ही देर में कार ओझल हो गयी थी l
सूरज के ग्रुप में यह खबर फैल गयी कि एक लड़की से सूरज को प्यार हो गया है, लड़की का पर्चा हल करवाने में खुद का पेपर हल नहीं कर पाया l
एक पेपर के बाद गैप भी पड़ जाता था, इसलिए परीक्षा लम्बी खींची थी l सूरज और सरोज अक्सर परीक्षा हाल से साथ-साथ बातचीत करते निकलते और कुछ दूर जाते फिर वह तितली सी मचलाती लड़की कार में बैठ जाती, दोनों-अपने अपने रास्ते l
छोटी-छोटी मुलाकातों में दोनों को एक दूसरे से लगाव हो गया था, होता भी क्यों न सूरज तो मदद कर रहा था l परीक्षा हाल से निकलते-निकलते बात कर लेना प्रेमी या प्रेयसी की मोहब्बत का इजहार तो नहीं हो सकता था l
सरोज ने एग्जाम के आखिरी दिन अपनी कार के आगे बढ़ते ही अपनी रुमाल सूरज की तरफ हवा में उछाल दी थी, यही थी एक निशानी प्यार का इजहार या निशानी अथवा एहसान l
सामाजिक रूप से दोनों एक नदी के दो किनारे थे भला बहती नदी के किनारे कभी मिल तो नहीं सकते ? सूरज अपने स्कूल को तो ना... ना करता परन्तु उसके दिल में कुछ-कुछ तो हो रहा था शायद यही अल्हड़ बचपन की नई-नई तरुणाई की अनकही लवस्टोरी भी l
सरोज की आँखों में सूरज के प्रति आकर्षण तो था, यही हाल सूरज का भी था l रिजल्ट आया तो सूरजकुमार कई विषयों में डिस्टिक्शन के साथ पास हुआ हाँ मैथ में कम नम्बर आये थे l
खुशी की बात ये थी परीक्षा पास करने के बाद अपने सपनों के राष्ट्रीय इंटर कालेज में सूरज ने एडमिशन लिया, जिस कालेज के मैदान में इंदिरा गाँधीजी का बचपन में भाषण सुना था और तो उसी कॉलेज में सूरज का परीक्षा केंद्र भी आया था l
राष्ट्रीय इंटर कॉलेज से सरोज का इंटर कालेज दस-पंद्रह किलोमीटर दूर था l
सरोज भी पास हो गयी थी, उसी हाई स्कूल में उसने एडमिशन लिया था, जिस स्कूल से परीक्षा उत्तीर्ण की थी l
सूरज और सरोज की एक-दो बारे मुलाक़ात भी हुई l सरोज की आँखों में प्यार लबालब था और सूरज के भी l
आँखों और इशारों के अलावा और कोई संवाद नहीं l
दोनों के लब्ज़ जबान से नहीं फिसले तो नहीं फिसले l
सरोजराय और सूरजप्रसाद के तरुणाई की मोहब्बत यही दास्तान थम गयी एक अनकही लवस्टोरी बनकर l सूरज ने फिर कभी किसी कालेज लड़की की तरफ मोहब्बत से नहीं देखा अपनी अनकही लवस्टोरी को दिल की गहराई में सजाये lदोस्तों यह कहानी बस यही तक l
नन्दलाल भारती
01/07/2025
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