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अदृश्य दीवार

 

लघुकथा/ अदृश्य दीवार
— नन्दलाल भारती
बूढ़े पिता अक्सर कहा करते थे, "घर ईंटों से बनता है, परिवार विश्वास से।"
उन्होंने अपने इकलौते बेटे को बड़े लाड़-प्यार से पाला, पढ़ाया-लिखाया और जीवन के हर संघर्ष से बचाने की कोशिश की। विवाह के बाद उन्हें लगा था कि घर में बहू नहीं, बेटी आएगी। लेकिन धीरे-धीरे बेटे और माता-पिता के बीच एक ऐसी अदृश्य दीवार खड़ी हो गई, जिसे कोई देख नहीं सकता था, पर सब महसूस करते थे।
समय बीता। पोते के जन्म ने उम्मीद जगाई कि शायद रिश्तों की बर्फ पिघल जाएगी। मुंडन संस्कार के बहाने पूरा परिवार वर्षों बाद एक साथ जुटा, पर अगले ही दिन खुशियों का घर कलह का मैदान बन गया। आरोप, अपमान और पुलिस बुलाने की धमकियों ने रिश्तों की बची-खुची गरिमा भी छीन ली।
वर्षों बाद बूढ़ा पिता अपने बेटे और पोते से मिलने की चाह रोक न सका। वह अकेला शहर पहुँचा। दरवाज़ा खुला, पर स्वागत के बजाय उसे उपेक्षा मिली। अपमान का घूँट पीकर वह चुपचाप लौटने लगा।
तभी छोटा-सा पोता दौड़ता हुआ आया। उसने दादा का हाथ कसकर पकड़ लिया और रोते हुए बोला—
"दादा... मुझे भी अपने साथ दादी के पास ले चलो।"
बूढ़े ने उसे सीने से लगा लिया। लेकिन अगले ही क्षण नन्हा हाथ उससे छीन लिया गया।
वापसी की ट्रेन में बैठा वह देर तक खिड़की के बाहर देखता रहा। पेड़, खेत और शहर पीछे छूटते जा रहे थे, पर उसके कानों में अब भी वही मासूम आवाज़ गूँज रही थी।
उसने सोचा—
सम्पत्ति का बँटवारा आसान है, लेकिन रिश्तों का बँटवारा पीढ़ियों तक दर्द देता है।
सच तो यह है कि दीवारें ईंटों से नहीं बनतीं; वे अहम, अविश्वास और मौन से खड़ी होती हैं। और जब वे खड़ी हो जाती हैं, तो सबसे पहले घर नहीं, दिल बँट जाते हैं।
नन्दलाल भारती
nlbharatiauthor@gmail.com
10/07/2026

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