नारायण ने जब नौकरी शुरू की थी, तब उसकी आँखों में एक साफ सपना था—एक दिन वह अपनी योग्यता के बल पर उस कुर्सी तक पहुँचेगा, जहाँ बैठकर वह निर्णय ले सकेगा।
वह सपना बहुत बड़ा नहीं था। वह किसी पर एहसान नहीं चाहता था, न किसी की कुर्सी छीनना चाहता था। बस इतना चाहता था कि उसकी मेहनत, उसकी शिक्षा और उसकी ईमानदारी को उसके पद से बड़ा समझा जाए।
लेकिन नौकरी के बाइस साल बाद भी वह वहीं था—निम्न श्रेणी क्लर्क।
उसी मेज पर, उसी कुर्सी पर, उन्हीं पुराने रजिस्टर और फाइलों के बीच।
सिर्फ उसकी उम्र बढ़ी थी, उसके बालों में सफेदी उतर आई थी और आँखों के नीचे थकान की गहरी लकीरें खिंच गई थीं।
योग्यता?
वह पोस्ट ग्रेजुएट था।
कानून की पढ़ाई कर चुका था।
प्रशासन में भी पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा उसके पास था।
विभागीय काम का लंबा अनुभव था।
फाइलों की भाषा से लेकर नियम-कायदों तक उसकी पकड़ मजबूत थी।
फिर भी पदोन्नति की सूची में उसका नाम हर बार ऐसे गायब हो जाता, जैसे उसने कभी आवेदन ही न किया हो।
नारायण ने हार नहीं मानी।
जब भी पदोन्नति के लिए विभागीय परीक्षा की सूचना निकलती, वह आवेदन करता।
लिखित परीक्षा होती।
वह मेहनत करता।
रात देर तक पढ़ता।
सुबह उठकर नोट्स दोहराता।
परीक्षा देता और पास हो जाता।
लेकिन कहानी हर बार एक ही जगह आकर रुक जाती—साक्षात्कार।
लिखित परीक्षा में सफल।
साक्षात्कार में असफल।
पहली बार उसे लगा कि शायद उसकी तैयारी में कमी रह गई।
दूसरी बार उसने और मेहनत की।
तीसरी बार उसने अपने वरिष्ठों से पूछा कि आखिर कमी कहाँ है।
किसी ने कहा—"इंटरव्यू में व्यक्तित्व भी देखा जाता है।"
किसी ने कहा—"शायद तुम्हें अपने जवाब देने का तरीका बदलना चाहिए।"
नारायण ने अपना तरीका भी बदलकर देखा।
लेकिन परिणाम नहीं बदला।
साल दर साल वही क्रम चलता रहा।
आवेदन।
परीक्षा।
सफलता।
साक्षात्कार।
असफलता।
और फिर वही पुरानी कुर्सी।
एक दिन महाप्रबंधक विजय प्रताप सिंग के सामने पदोन्नति की फाइल पहुँची। नारायण की फाइल भी उसमें थी।
विजय प्रताप सिंग ने फाइल पर एक नजर डाली और मुस्कराते हुए बोले—
"नारायण बहुत कोशिश करता है।"
पास बैठे अधिकारी ने कहा, "जी साहब, हर बार आवेदन करता है।"प्रमोशन की रट लगाए रहता है l
विजय प्रताप सिंग ने फाइल बंद कर दी।
"जहाँ है, वहीं ठीक है। हर कोई ऊपर जाने लगेगा तो व्यवस्था कैसे चलेगी?" शायद वर्णव्यवस्था की तरफ इशारा था l
फिर उन्होंने धीमे स्वर में एक ऐसी बात कही, जो नारायण के कानों तक पहुँच गई—
"अपनी सीमा समझनी चाहिए।"
नारायण चुप रहा।
उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद विभाग में उसकी योग्यता नहीं, उसकी पहचान देखी जा रही है।
लेकिन उसने खुद को समझाया—
"एक टिप्पणी से जिंदगी तय नहीं होती।"
कुछ महीने बाद उसने प्रशासन विभाग में पदोन्नति और कैडर परिवर्तन के लिए आवेदन किया।
वह प्रशासन विभाग के प्रबंधक सुरेन्द्र सिंग चोरावत के पास पहुँचा।
"सर, मेरा आवेदन देख लीजिए। मेरी शैक्षणिक योग्यता और अनुभव के अनुसार प्रशासन विभाग में काम करने का अवसर मिल सकता है।"
चोरावत ने चश्मा उतारा।
"तुम्हें किसने कहा कि प्रशासन विभाग में आ जाओ?"
"किसी ने नहीं सर। मैं स्वयं आवेदन कर रहा हूँ।"
"क्यों?"
"मेरी योग्यता इस काम के अनुकूल है।"
सुरेन्द्र सिंह कुछ क्षण उसे देखते रहे।
फिर बोले—
"नारायण, तुम्हारे लोगों के लिए यह विभाग नहीं है।"अपनी जाति देखोl
नारायण के भीतर कुछ टूटकर गिरा।
वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन शब्द गले में अटक गए।
उसने सिर्फ इतना पूछा—
"सर, क्या किसी विभाग में जाने के लिए योग्यता के साथ कोई और प्रमाणपत्र भी चाहिए?"
सुरेन्द्र सिंग ने कोई उत्तर नहीं दिया।
नारायण बाहर आ गया।
गलियारे में चलते हुए उसे लगा जैसे उसके पैरों के नीचे फर्श नहीं, कोई लंबी अंधेरी सुरंग है।
उस शाम घर पहुँचकर पत्नी ने पूछा—
"आज बहुत चुप हो।"
"कुछ नहीं।"
"कुछ तो है।"
नारायण ने जूते उतारे और कुर्सी पर बैठ गया।
"तुम्हें पता है, आदमी कब थकता है?"
पत्नी चुप रही।
"जब उसे काम से नहीं, अपने अस्तित्व को साबित करने से थकान होने लगे।"
पत्नी ने उसके चेहरे की ओर देखा।
वह कुछ समझी, कुछ नहीं समझी।
नारायण ने उस रात खाना कम खाया।
लेकिन अगले दिन फिर समय पर कार्यालय पहुँच गया।
उसकी लड़ाई नौकरी से नहीं थी।
वह अपने अधिकार के लिए लड़ रहा था।
समय किसी के लिए रुकता नहीं।
नारायण के साथ नौकरी शुरू करने वाले कई कर्मचारी उससे आगे निकल गए।
जो कभी उसके साथ एक ही पंक्ति में बैठे थे, वे पहले वरिष्ठ अधिकारी बने, फिर प्रबंधक और कुछ तो वरिष्ठ प्रबंधक तक पहुँच गए।
नारायण हर पदोन्नति सूची देखता।
अपना नाम खोजता।
फिर सूची मोड़कर दराज में रख देता।
एक दिन एक पुराने सहकर्मी ने मजाक में कहा—
"नारायण, तुम्हारी कुर्सी तो तुम्हें छोड़ने को तैयार ही नहीं।"
नारायण मुस्करा दिया।
"कुर्सी मुझे नहीं छोड़ रही या मैं कुर्सी को?"
दोनों हँस पड़े।
लेकिन उस हँसी में नारायण का दर्द छिपा था।
बाइस साल गुजर चुके थे।
उसके बच्चे बड़े हो रहे थे।
बेटी कॉलेज में थी।
बेटा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था।
नारायण उनसे हमेशा कहता—
"पढ़ो। खूब पढ़ो।"
बेटा एक दिन पूछ बैठा—
"पापा, पढ़ने से क्या होता है?"
नारायण कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
"पढ़ाई तुम्हें यह अधिकार देती है कि तुम किसी के सामने अपना सिर झुकाकर अपनी कीमत न पूछो।"
उसे नहीं पता था कि उसका बेटा उस वाक्य को कितने वर्षों तक अपने भीतर सँजोए रखेगा।
कुछ वर्षों बाद विभाग में एक नए मुख्य प्रबंधक ने कार्यभार संभाला।
नाम था—अवद प्रताप सिंग ।
उन्होंने आते ही अधिकारियों और कर्मचारियों की बैठक बुलाई।
सभागार भरा हुआ था।
अवद प्रताप सिंग ने कहा—
"जिस किसी का कोई काम लंबित है, कोई शिकायत है, कोई सुझाव है, वह खुलकर बताए। मैं चाहता हूँ कि विभाग में पारदर्शिता रहे।"
एक-एक करके कर्मचारी अपनी बातें रखने लगे।
किसी की पदोन्नति का मामला लंबित था।
किसी की वेतन विसंगति थी।
किसी ने कार्यालय की व्यवस्था सुधारने का सुझाव दिया।
तभी पीछे बैठे विवेक सिंग ने हँसते हुए कहा—
"सर, एक व्यक्ति है जो सबसे ज्यादा शिकायत करता है।"
अवद प्रताप सिंग ने पूछा—
"कौन?"
विवेक ने नारायण की ओर देखते हुए कहा—
"अरे नारायण! सबसे शिकायत करता रहता है। साहब पूछ रहे हैं, तो बता क्यों नहीं रहा?"
कई लोग मुस्करा दिए।
अवद प्रताप सिंग ने नारायण को देखा।
"हाँ नारायण, बताओ। क्या समस्या है?"
नारायण कुछ क्षण चुप रहा।
फिर वह धीरे से खड़ा हुआ।
"सर, मेरी समस्या व्यक्तिगत नहीं है।"
"तो?"
"मैं पोस्ट ग्रेजुएट हूँ। कानून में स्नातक हूँ। प्रशासन में भी पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। बाइस साल से इस विभाग में काम कर रहा हूँ। विभागीय परीक्षाएँ पास की हैं। लेकिन आज भी निम्न श्रेणी क्लर्क हूँ। न मेरी योग्यता के अनुसार पदोन्नति हुई और न कैडर बदलने का अवसर मिल रहा है ।"
सभागार में अचानक सन्नाटा छा गया।
नारायण ने आगे कहा—
"मैं केवल यह जानना चाहता हूँ कि मेरी बार - बार कमी कहाँ रह जाती है?"
अवद प्रताप सिंग की भौंहें तन गईं।
"तुम अपने लोगों को देखो, वे क्या कर रहे हैं। तुम्हें अफसर बनना है तो गले में अफसर की पट्टी डाल लो।"
कुछ लोग हँस पड़े।
किसी ने धीमे से कहा—
"कुत्ते की तरह।"
नारायण ने सुन लिया।
उसका चेहरा लाल हो गया।
वह कुछ क्षण खड़ा रहा।
फिर बोला—
"सर, मैं आपका सम्मान करता हूँ। लेकिन मैं अपनी गरिमा का भी सम्मान करता हूँ।"
अवद प्रताप सिंग ने मेज पर हाथ मारा।
"बहुत बोलते हो!"मुझे वकालत पढ़ा रहे हो?
नारायण ने शांत स्वर में कहा—
"बहुत साल चुप रहा हूँ, सर। इसलिए शायद आज मेरी आवाज आपको ज्यादा सुनाई दे रही है।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
तभी अशोक चिरपाठी बोल पड़े—
"साहब ने क्या गलत कहा? तुम इतने अच्छे विभाग में नौकरी कर रहे हो, जहाँ तुम्हारे लोगों का प्रवेश ही मुश्किल है। तुम्हारे लोग खेतों में काम कर रहे हैं, शहरों में मजदूरी कर रहे हैं और तुम्हें अफसर बनना है?" दूसरों पर राज करना है l
नारायण ने उसकी ओर देखा।
उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था।
सिर्फ एक दृढ़ता थी।
"हाँ।"
अशोक चिरपाठी हँसा।
"क्या?"
"मैं अफसर बनना चाहता हूँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने पढ़ाई की है। मेहनत की है। परीक्षा पास की है। नौकरी ईमानदारी से की है। और अगर मेरी योग्यता मुझे उस पद के योग्य बनाती है, तो मैं वहाँ पहुँचने का सपना क्यों न देखूँ?"
कुछ लोग चुप थे।
कुछ के चेहरे पर असहमति थी।
लेकिन कुछ आँखों में पहली बार नारायण के लिए सम्मान दिखाई दे रहा था।
बैठक समाप्त हो गई।
नारायण बाहर आया।
उसके कदम भारी थे, लेकिन मन हल्का।
उसने पहली बार महसूस किया कि अपनी बात कहना भी एक तरह की मुक्ति है।
उस घटना के बाद कार्यालय का माहौल कुछ समय तक बदला-बदला रहा।
किसी ने कहा—नारायण ने सीमा पार कर दी।
किसी ने कहा—वह मुसीबत मोल ले रहा है।
किसी ने सलाह दी—
"चुप रहो। नौकरी करनी है तो समझौता करना पड़ता है।"
नारायण ने सिर्फ इतना कहा—
"समझौता काम की शर्तों से किया जा सकता है, आत्मसम्मान से नहीं।"
उसने फिर आवेदन किया।
फिर दस्तावेज लगाए।
फिर विभागीय नियमों का अध्ययन किया।
फिर परीक्षा दी।
फिर इंतजार किया।
इस बार उसने केवल अपने लिए नहीं, उन सभी लोगों के लिए आवेदन किया था जो योग्यता होने के बावजूद अवसर के दरवाजे पर खड़े रह जाते हैं।
महीने बीत गए।
एक सुबह कार्यालय में आदेश आया।
पदोन्नति सूची जारी हुई।
कर्मचारी सूची के चारों ओर जमा हो गए।
नारायण दूर खड़ा था।
उसे डर लग रहा था।
वह धीरे-धीरे सूची के पास गया।
उसकी उँगली नामों पर चलती हुई नीचे पहुँची।
फिर अचानक रुक गई।
नारायण—जूनियर मैनेजर।
उसकी आँखें कुछ क्षणों के लिए स्थिर हो गईं।
उसे लगा जैसे आसपास की सारी आवाजें बंद हो गई हैं।
पचीस साल की असफलताएँ, इंटरव्यू में मिली निराशाएँ, बंद दरवाजे, कटु शब्द, हँसी और ताने—सब एक साथ उसकी आँखों के सामने घूम गए।
उसने सूची को फिर पढ़ा।
नाम वही था।
पद वही था।
सचमुच उसका प्रमोशन हुआ था।
एक सहकर्मी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"बधाई हो नारायण!"
नारायण मुस्कराया।
"धन्यवाद।"
"अब तो अफसर बन गए।"
नारायण ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
"अफसर की पट्टी पहनकर नहीं। योग्यता की सीढ़ियाँ चढ़कर।"
सहकर्मी कुछ कह नहीं पाया।
उस शाम घर पहुँचा तो बेटे ने दरवाजा खोला।
"पापा, आज बहुत खुश लग रहे हो।"
नारायण ने जेब से आदेश की प्रति निकाली।
बेटे ने पढ़ा।
"पापा! आपका प्रमोशन हो गया!"
बेटी भी दौड़कर आई।
पत्नी की आँखें भर आईं।
नारायण ने कागज मेज पर रखा।
कुछ देर तक वह उसे देखता रहा।
फिर बोला—
"मैं जनरल मैनेजर नहीं बन पाया।"
पत्नी ने कहा—
"लेकिन आज तुमने उससे बड़ी चीज हासिल की है।"
नारायण ने उसकी ओर देखा।
"क्या?"
"तुमने अपने बच्चों को यह विश्वास दिया है कि रास्ता कितना भी लंबा हो, कोशिश छोड़नी नहीं चाहिए।"
नारायण की आँखें नम हो गईं।
उसने बच्चों से कहा—
"याद रखना, सफलता हमेशा मंजिल का नाम नहीं होती। कभी-कभी रास्ते में गिरकर भी खड़े हो जाना सफलता होती है।"
बेटे ने पूछा—
"और आपकी उड़ान?"
नारायण मुस्कराया।
"उड़ान पूरी नहीं हुई।"
"क्यों?"
"क्योंकि मंजिल अभी बाकी है।"
बेटी ने कहा—
"तो फिर?"
नारायण ने खिड़की के बाहर देखा।
आकाश में चाँद था।
"लेकिन जीत पूरी है।
अगले दिन जब नारायण पहली बार जूनियर मैनेजर की कुर्सी पर बैठा, तो उसने कमरे का दरवाजा खुला रखा।
एक कर्मचारी फाइल लेकर आया।
"सर, यह फाइल देखनी है।"
नारायण ने फाइल ली।
फिर पूछा—
"आपका नाम?"
"रमेश।"
"बैठिए रमेश साहब ।"
रमेश बैठ गया।
नारायण ने फाइल पढ़ते हुए कहा—
"अगर इसमें कोई नियमगत समस्या है तो बताइए। हम मिलकर समाधान खोजेंगे।"
रमेश ने उसकी ओर देखा।
उसे शायद उम्मीद नहीं थी कि नया अधिकारी उससे इस तरह बात करेगा।
नारायण मुस्कराया।
उसे अपनी पुरानी कुर्सी याद आ गई।
वही मेज।
वही फाइलें।
वही इंतजार।
उसने मन ही मन कहा—
"मैं उस कुर्सी से ऊपर उठा हूँ, लेकिन उन दिनों को पीछे नहीं छोड़ूँगा।"
उसने तय किया कि उसके कमरे से किसी योग्य व्यक्ति को सिर्फ इसलिए वापस नहीं जाना पड़ेगा कि वह किसी विशेष पृष्ठभूमि से आता है।
वह किसी का एहसान नहीं करेगा।
बस अवसर को अवसर की तरह देखेगा।
नारायण जनरल मैनेजर नहीं बन पाया।
उसकी उड़ान सचमुच अधूरी रही।
लेकिन जिस व्यवस्था ने उसे वर्षों तक रोकने की कोशिश की, उसके सामने उसने अपने श्रम, शिक्षा और आत्मसम्मान से यह साबित कर दिया कि हर उड़ान की ऊँचाई पद से नहीं मापी जाती।
कुछ उड़ानें मनुष्य की उस क्षमता से मापी जाती हैं, जिसमें वह अपमान के बाद भी टूटता नहीं, असफलता के बाद भी रुकता नहीं और बंद दरवाजों के सामने खड़े होकर लौटता नहीं।
नारायण की उड़ान अधूरी थी।
लेकिन उसकी जीत पूरी थी।
क्योंकि उसने सिर्फ एक पद नहीं पाया था—
उसने अपने भीतर उस विश्वास को बचाए रखा था कि योग्यता को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता।
और शायद यही उसकी सबसे बड़ी पदोन्नति थी।
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वह सपना बहुत बड़ा नहीं था। वह किसी पर एहसान नहीं चाहता था, न किसी की कुर्सी छीनना चाहता था। बस इतना चाहता था कि उसकी मेहनत, उसकी शिक्षा और उसकी ईमानदारी को उसके पद से बड़ा समझा जाए।
लेकिन नौकरी के बाइस साल बाद भी वह वहीं था—निम्न श्रेणी क्लर्क।
उसी मेज पर, उसी कुर्सी पर, उन्हीं पुराने रजिस्टर और फाइलों के बीच।
सिर्फ उसकी उम्र बढ़ी थी, उसके बालों में सफेदी उतर आई थी और आँखों के नीचे थकान की गहरी लकीरें खिंच गई थीं।
योग्यता?
वह पोस्ट ग्रेजुएट था।
कानून की पढ़ाई कर चुका था।
प्रशासन में भी पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा उसके पास था।
विभागीय काम का लंबा अनुभव था।
फाइलों की भाषा से लेकर नियम-कायदों तक उसकी पकड़ मजबूत थी।
फिर भी पदोन्नति की सूची में उसका नाम हर बार ऐसे गायब हो जाता, जैसे उसने कभी आवेदन ही न किया हो।
नारायण ने हार नहीं मानी।
जब भी पदोन्नति के लिए विभागीय परीक्षा की सूचना निकलती, वह आवेदन करता।
लिखित परीक्षा होती।
वह मेहनत करता।
रात देर तक पढ़ता।
सुबह उठकर नोट्स दोहराता।
परीक्षा देता और पास हो जाता।
लेकिन कहानी हर बार एक ही जगह आकर रुक जाती—साक्षात्कार।
लिखित परीक्षा में सफल।
साक्षात्कार में असफल।
पहली बार उसे लगा कि शायद उसकी तैयारी में कमी रह गई।
दूसरी बार उसने और मेहनत की।
तीसरी बार उसने अपने वरिष्ठों से पूछा कि आखिर कमी कहाँ है।
किसी ने कहा—"इंटरव्यू में व्यक्तित्व भी देखा जाता है।"
किसी ने कहा—"शायद तुम्हें अपने जवाब देने का तरीका बदलना चाहिए।"
नारायण ने अपना तरीका भी बदलकर देखा।
लेकिन परिणाम नहीं बदला।
साल दर साल वही क्रम चलता रहा।
आवेदन।
परीक्षा।
सफलता।
साक्षात्कार।
असफलता।
और फिर वही पुरानी कुर्सी।
एक दिन महाप्रबंधक विजय प्रताप सिंग के सामने पदोन्नति की फाइल पहुँची। नारायण की फाइल भी उसमें थी।
विजय प्रताप सिंग ने फाइल पर एक नजर डाली और मुस्कराते हुए बोले—
"नारायण बहुत कोशिश करता है।"
पास बैठे अधिकारी ने कहा, "जी साहब, हर बार आवेदन करता है।"प्रमोशन की रट लगाए रहता है l
विजय प्रताप सिंग ने फाइल बंद कर दी।
"जहाँ है, वहीं ठीक है। हर कोई ऊपर जाने लगेगा तो व्यवस्था कैसे चलेगी?" शायद वर्णव्यवस्था की तरफ इशारा था l
फिर उन्होंने धीमे स्वर में एक ऐसी बात कही, जो नारायण के कानों तक पहुँच गई—
"अपनी सीमा समझनी चाहिए।"
नारायण चुप रहा।
उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद विभाग में उसकी योग्यता नहीं, उसकी पहचान देखी जा रही है।
लेकिन उसने खुद को समझाया—
"एक टिप्पणी से जिंदगी तय नहीं होती।"
कुछ महीने बाद उसने प्रशासन विभाग में पदोन्नति और कैडर परिवर्तन के लिए आवेदन किया।
वह प्रशासन विभाग के प्रबंधक सुरेन्द्र सिंग चोरावत के पास पहुँचा।
"सर, मेरा आवेदन देख लीजिए। मेरी शैक्षणिक योग्यता और अनुभव के अनुसार प्रशासन विभाग में काम करने का अवसर मिल सकता है।"
चोरावत ने चश्मा उतारा।
"तुम्हें किसने कहा कि प्रशासन विभाग में आ जाओ?"
"किसी ने नहीं सर। मैं स्वयं आवेदन कर रहा हूँ।"
"क्यों?"
"मेरी योग्यता इस काम के अनुकूल है।"
सुरेन्द्र सिंह कुछ क्षण उसे देखते रहे।
फिर बोले—
"नारायण, तुम्हारे लोगों के लिए यह विभाग नहीं है।"अपनी जाति देखोl
नारायण के भीतर कुछ टूटकर गिरा।
वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन शब्द गले में अटक गए।
उसने सिर्फ इतना पूछा—
"सर, क्या किसी विभाग में जाने के लिए योग्यता के साथ कोई और प्रमाणपत्र भी चाहिए?"
सुरेन्द्र सिंग ने कोई उत्तर नहीं दिया।
नारायण बाहर आ गया।
गलियारे में चलते हुए उसे लगा जैसे उसके पैरों के नीचे फर्श नहीं, कोई लंबी अंधेरी सुरंग है।
उस शाम घर पहुँचकर पत्नी ने पूछा—
"आज बहुत चुप हो।"
"कुछ नहीं।"
"कुछ तो है।"
नारायण ने जूते उतारे और कुर्सी पर बैठ गया।
"तुम्हें पता है, आदमी कब थकता है?"
पत्नी चुप रही।
"जब उसे काम से नहीं, अपने अस्तित्व को साबित करने से थकान होने लगे।"
पत्नी ने उसके चेहरे की ओर देखा।
वह कुछ समझी, कुछ नहीं समझी।
नारायण ने उस रात खाना कम खाया।
लेकिन अगले दिन फिर समय पर कार्यालय पहुँच गया।
उसकी लड़ाई नौकरी से नहीं थी।
वह अपने अधिकार के लिए लड़ रहा था।
समय किसी के लिए रुकता नहीं।
नारायण के साथ नौकरी शुरू करने वाले कई कर्मचारी उससे आगे निकल गए।
जो कभी उसके साथ एक ही पंक्ति में बैठे थे, वे पहले वरिष्ठ अधिकारी बने, फिर प्रबंधक और कुछ तो वरिष्ठ प्रबंधक तक पहुँच गए।
नारायण हर पदोन्नति सूची देखता।
अपना नाम खोजता।
फिर सूची मोड़कर दराज में रख देता।
एक दिन एक पुराने सहकर्मी ने मजाक में कहा—
"नारायण, तुम्हारी कुर्सी तो तुम्हें छोड़ने को तैयार ही नहीं।"
नारायण मुस्करा दिया।
"कुर्सी मुझे नहीं छोड़ रही या मैं कुर्सी को?"
दोनों हँस पड़े।
लेकिन उस हँसी में नारायण का दर्द छिपा था।
बाइस साल गुजर चुके थे।
उसके बच्चे बड़े हो रहे थे।
बेटी कॉलेज में थी।
बेटा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था।
नारायण उनसे हमेशा कहता—
"पढ़ो। खूब पढ़ो।"
बेटा एक दिन पूछ बैठा—
"पापा, पढ़ने से क्या होता है?"
नारायण कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
"पढ़ाई तुम्हें यह अधिकार देती है कि तुम किसी के सामने अपना सिर झुकाकर अपनी कीमत न पूछो।"
उसे नहीं पता था कि उसका बेटा उस वाक्य को कितने वर्षों तक अपने भीतर सँजोए रखेगा।
कुछ वर्षों बाद विभाग में एक नए मुख्य प्रबंधक ने कार्यभार संभाला।
नाम था—अवद प्रताप सिंग ।
उन्होंने आते ही अधिकारियों और कर्मचारियों की बैठक बुलाई।
सभागार भरा हुआ था।
अवद प्रताप सिंग ने कहा—
"जिस किसी का कोई काम लंबित है, कोई शिकायत है, कोई सुझाव है, वह खुलकर बताए। मैं चाहता हूँ कि विभाग में पारदर्शिता रहे।"
एक-एक करके कर्मचारी अपनी बातें रखने लगे।
किसी की पदोन्नति का मामला लंबित था।
किसी की वेतन विसंगति थी।
किसी ने कार्यालय की व्यवस्था सुधारने का सुझाव दिया।
तभी पीछे बैठे विवेक सिंग ने हँसते हुए कहा—
"सर, एक व्यक्ति है जो सबसे ज्यादा शिकायत करता है।"
अवद प्रताप सिंग ने पूछा—
"कौन?"
विवेक ने नारायण की ओर देखते हुए कहा—
"अरे नारायण! सबसे शिकायत करता रहता है। साहब पूछ रहे हैं, तो बता क्यों नहीं रहा?"
कई लोग मुस्करा दिए।
अवद प्रताप सिंग ने नारायण को देखा।
"हाँ नारायण, बताओ। क्या समस्या है?"
नारायण कुछ क्षण चुप रहा।
फिर वह धीरे से खड़ा हुआ।
"सर, मेरी समस्या व्यक्तिगत नहीं है।"
"तो?"
"मैं पोस्ट ग्रेजुएट हूँ। कानून में स्नातक हूँ। प्रशासन में भी पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। बाइस साल से इस विभाग में काम कर रहा हूँ। विभागीय परीक्षाएँ पास की हैं। लेकिन आज भी निम्न श्रेणी क्लर्क हूँ। न मेरी योग्यता के अनुसार पदोन्नति हुई और न कैडर बदलने का अवसर मिल रहा है ।"
सभागार में अचानक सन्नाटा छा गया।
नारायण ने आगे कहा—
"मैं केवल यह जानना चाहता हूँ कि मेरी बार - बार कमी कहाँ रह जाती है?"
अवद प्रताप सिंग की भौंहें तन गईं।
"तुम अपने लोगों को देखो, वे क्या कर रहे हैं। तुम्हें अफसर बनना है तो गले में अफसर की पट्टी डाल लो।"
कुछ लोग हँस पड़े।
किसी ने धीमे से कहा—
"कुत्ते की तरह।"
नारायण ने सुन लिया।
उसका चेहरा लाल हो गया।
वह कुछ क्षण खड़ा रहा।
फिर बोला—
"सर, मैं आपका सम्मान करता हूँ। लेकिन मैं अपनी गरिमा का भी सम्मान करता हूँ।"
अवद प्रताप सिंग ने मेज पर हाथ मारा।
"बहुत बोलते हो!"मुझे वकालत पढ़ा रहे हो?
नारायण ने शांत स्वर में कहा—
"बहुत साल चुप रहा हूँ, सर। इसलिए शायद आज मेरी आवाज आपको ज्यादा सुनाई दे रही है।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
तभी अशोक चिरपाठी बोल पड़े—
"साहब ने क्या गलत कहा? तुम इतने अच्छे विभाग में नौकरी कर रहे हो, जहाँ तुम्हारे लोगों का प्रवेश ही मुश्किल है। तुम्हारे लोग खेतों में काम कर रहे हैं, शहरों में मजदूरी कर रहे हैं और तुम्हें अफसर बनना है?" दूसरों पर राज करना है l
नारायण ने उसकी ओर देखा।
उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था।
सिर्फ एक दृढ़ता थी।
"हाँ।"
अशोक चिरपाठी हँसा।
"क्या?"
"मैं अफसर बनना चाहता हूँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने पढ़ाई की है। मेहनत की है। परीक्षा पास की है। नौकरी ईमानदारी से की है। और अगर मेरी योग्यता मुझे उस पद के योग्य बनाती है, तो मैं वहाँ पहुँचने का सपना क्यों न देखूँ?"
कुछ लोग चुप थे।
कुछ के चेहरे पर असहमति थी।
लेकिन कुछ आँखों में पहली बार नारायण के लिए सम्मान दिखाई दे रहा था।
बैठक समाप्त हो गई।
नारायण बाहर आया।
उसके कदम भारी थे, लेकिन मन हल्का।
उसने पहली बार महसूस किया कि अपनी बात कहना भी एक तरह की मुक्ति है।
उस घटना के बाद कार्यालय का माहौल कुछ समय तक बदला-बदला रहा।
किसी ने कहा—नारायण ने सीमा पार कर दी।
किसी ने कहा—वह मुसीबत मोल ले रहा है।
किसी ने सलाह दी—
"चुप रहो। नौकरी करनी है तो समझौता करना पड़ता है।"
नारायण ने सिर्फ इतना कहा—
"समझौता काम की शर्तों से किया जा सकता है, आत्मसम्मान से नहीं।"
उसने फिर आवेदन किया।
फिर दस्तावेज लगाए।
फिर विभागीय नियमों का अध्ययन किया।
फिर परीक्षा दी।
फिर इंतजार किया।
इस बार उसने केवल अपने लिए नहीं, उन सभी लोगों के लिए आवेदन किया था जो योग्यता होने के बावजूद अवसर के दरवाजे पर खड़े रह जाते हैं।
महीने बीत गए।
एक सुबह कार्यालय में आदेश आया।
पदोन्नति सूची जारी हुई।
कर्मचारी सूची के चारों ओर जमा हो गए।
नारायण दूर खड़ा था।
उसे डर लग रहा था।
वह धीरे-धीरे सूची के पास गया।
उसकी उँगली नामों पर चलती हुई नीचे पहुँची।
फिर अचानक रुक गई।
नारायण—जूनियर मैनेजर।
उसकी आँखें कुछ क्षणों के लिए स्थिर हो गईं।
उसे लगा जैसे आसपास की सारी आवाजें बंद हो गई हैं।
पचीस साल की असफलताएँ, इंटरव्यू में मिली निराशाएँ, बंद दरवाजे, कटु शब्द, हँसी और ताने—सब एक साथ उसकी आँखों के सामने घूम गए।
उसने सूची को फिर पढ़ा।
नाम वही था।
पद वही था।
सचमुच उसका प्रमोशन हुआ था।
एक सहकर्मी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"बधाई हो नारायण!"
नारायण मुस्कराया।
"धन्यवाद।"
"अब तो अफसर बन गए।"
नारायण ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
"अफसर की पट्टी पहनकर नहीं। योग्यता की सीढ़ियाँ चढ़कर।"
सहकर्मी कुछ कह नहीं पाया।
उस शाम घर पहुँचा तो बेटे ने दरवाजा खोला।
"पापा, आज बहुत खुश लग रहे हो।"
नारायण ने जेब से आदेश की प्रति निकाली।
बेटे ने पढ़ा।
"पापा! आपका प्रमोशन हो गया!"
बेटी भी दौड़कर आई।
पत्नी की आँखें भर आईं।
नारायण ने कागज मेज पर रखा।
कुछ देर तक वह उसे देखता रहा।
फिर बोला—
"मैं जनरल मैनेजर नहीं बन पाया।"
पत्नी ने कहा—
"लेकिन आज तुमने उससे बड़ी चीज हासिल की है।"
नारायण ने उसकी ओर देखा।
"क्या?"
"तुमने अपने बच्चों को यह विश्वास दिया है कि रास्ता कितना भी लंबा हो, कोशिश छोड़नी नहीं चाहिए।"
नारायण की आँखें नम हो गईं।
उसने बच्चों से कहा—
"याद रखना, सफलता हमेशा मंजिल का नाम नहीं होती। कभी-कभी रास्ते में गिरकर भी खड़े हो जाना सफलता होती है।"
बेटे ने पूछा—
"और आपकी उड़ान?"
नारायण मुस्कराया।
"उड़ान पूरी नहीं हुई।"
"क्यों?"
"क्योंकि मंजिल अभी बाकी है।"
बेटी ने कहा—
"तो फिर?"
नारायण ने खिड़की के बाहर देखा।
आकाश में चाँद था।
"लेकिन जीत पूरी है।
अगले दिन जब नारायण पहली बार जूनियर मैनेजर की कुर्सी पर बैठा, तो उसने कमरे का दरवाजा खुला रखा।
एक कर्मचारी फाइल लेकर आया।
"सर, यह फाइल देखनी है।"
नारायण ने फाइल ली।
फिर पूछा—
"आपका नाम?"
"रमेश।"
"बैठिए रमेश साहब ।"
रमेश बैठ गया।
नारायण ने फाइल पढ़ते हुए कहा—
"अगर इसमें कोई नियमगत समस्या है तो बताइए। हम मिलकर समाधान खोजेंगे।"
रमेश ने उसकी ओर देखा।
उसे शायद उम्मीद नहीं थी कि नया अधिकारी उससे इस तरह बात करेगा।
नारायण मुस्कराया।
उसे अपनी पुरानी कुर्सी याद आ गई।
वही मेज।
वही फाइलें।
वही इंतजार।
उसने मन ही मन कहा—
"मैं उस कुर्सी से ऊपर उठा हूँ, लेकिन उन दिनों को पीछे नहीं छोड़ूँगा।"
उसने तय किया कि उसके कमरे से किसी योग्य व्यक्ति को सिर्फ इसलिए वापस नहीं जाना पड़ेगा कि वह किसी विशेष पृष्ठभूमि से आता है।
वह किसी का एहसान नहीं करेगा।
बस अवसर को अवसर की तरह देखेगा।
नारायण जनरल मैनेजर नहीं बन पाया।
उसकी उड़ान सचमुच अधूरी रही।
लेकिन जिस व्यवस्था ने उसे वर्षों तक रोकने की कोशिश की, उसके सामने उसने अपने श्रम, शिक्षा और आत्मसम्मान से यह साबित कर दिया कि हर उड़ान की ऊँचाई पद से नहीं मापी जाती।
कुछ उड़ानें मनुष्य की उस क्षमता से मापी जाती हैं, जिसमें वह अपमान के बाद भी टूटता नहीं, असफलता के बाद भी रुकता नहीं और बंद दरवाजों के सामने खड़े होकर लौटता नहीं।
नारायण की उड़ान अधूरी थी।
लेकिन उसकी जीत पूरी थी।
क्योंकि उसने सिर्फ एक पद नहीं पाया था—
उसने अपने भीतर उस विश्वास को बचाए रखा था कि योग्यता को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता।
और शायद यही उसकी सबसे बड़ी पदोन्नति थी।
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