आजादी की वे गुमनाम औरतें जिन्होंने अपना तन, हुनर और धन देश के काम लगाया, पर इतिहास में जगह नहीं मिली... प्रकाशनार्थ
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आजादी की वे गुमनाम औरतें
जिन्होंने अपना तन, हुनर और धन देश के काम लगाया, पर इतिहास में जगह नहीं मिली
लेखक : नन्दलाल भारती
लेखक एवं सामाजिक चिंतक
15 अगस्त हमारे लिए केवल राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात स्त्री-पुरुषों को याद करने का दिन है, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व लगाया। लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास पढ़ते समय एक सवाल बार-बार सामने आता है—क्या इतिहास में वही लोग दर्ज हुए, जिन्हें तत्कालीन समाज सम्मान की दृष्टि से देखता था?शायद नहीं।
इतिहास के हाशिये पर ऐसी अनेक स्त्रियाँ भी थीं, जिन्हें समाज ने ‘तवायफ’, ‘नाचने वाली’ या ‘वेश्या’ जैसे शब्दों में सीमित कर दिया। उनके जीवन, कला, आर्थिक स्वतंत्रता और देश के लिए किए गए योगदान को लंबे समय तक गंभीरता से नहीं देखा गया।
यहाँ एक अंतर समझना जरूरी है। उस दौर की हर तवायफ को आज के अर्थ में ‘वेश्या’ कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। अनेक तवायफें संगीत, नृत्य, कविता, शायरी और तहजीब की उच्च प्रशिक्षित कलाकार थीं। वे संपत्ति रखती थीं, कर देती थीं और कई बार पुरुषों की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र जीवन जीती थीं। लखनऊ जैसे शहरों में उनका सांस्कृतिक और आर्थिक प्रभाव इतना मजबूत था कि वे उच्च करदाता वर्ग में शामिल थीं।
लेकिन 19वीं शताब्दी में औपनिवेशिक शासन और बदलती सामाजिक नैतिकता ने उनके संसार को कलंकित करना शुरू किया। अंग्रेजी शासन ने तवायफों को अक्सर केवल देह और यौनता के संकुचित नजरिए से देखा। उनकी कला, सामाजिक भूमिका और स्वतंत्र आर्थिक अस्तित्व पीछे धकेल दिए गए।
1857 के विद्रोह के बाद तो कई तवायफों की संपत्तियाँ तक जब्त की गईं। शोधकर्ताओं के अनुसार अवध और लखनऊ में कुछ तवायफों ने विद्रोहियों को आश्रय, आर्थिक सहायता और संपर्क उपलब्ध कराया था।
अजीज़ुनबाई- जिसने पिस्तौल उठाई,1857 की क्रांति में कानपुर की अजीज़ुनबाई का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वह एक तवायफ थीं, लेकिन विद्रोह के समय उन्होंने केवल दर्शक बने रहना स्वीकार नहीं किया। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उन्हें विद्रोही सैनिकों के साथ देखा गया और उनके पास पिस्तौल भी थी। उनके बारे में उपलब्ध सामग्री बताती है कि उन्होंने विद्रोहियों की सहायता की और संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई। फिर भी उनका नाम आजादी के मुख्य इतिहास में लगभग अनुपस्थित है।
अज़ीज़न : कोठे से क्रांति तक,लखनऊ की अज़ीज़न का नाम भी 1857 के विद्रोह से जुड़ा मिलता है। उपलब्ध ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार उन्होंने नाना साहब के आह्वान पर विद्रोह में भाग लिया। उनका नाम आज भी बहुत कम लोगों को मालूम है। यह विस्मृति केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरी स्त्री-परंपरा की विस्मृति है जिसे इतिहास ने सम्मानजनक स्थान नहीं दिया।
इन स्त्रियों के लिए उनका कोठा केवल मनोरंजन का स्थान नहीं था। वह कला, संगीत, कविता और बातचीत का केंद्र था।
1857 के दौर में कुछ कोठे विद्रोहियों के मिलने-जुलने, संदेशों के आदान-प्रदान और आश्रय के स्थान भी बने। इसलिए उन्हें केवल ‘देह व्यापार’ की संकीर्ण परिभाषा में देखना उस समय की सामाजिक वास्तविकता को अधूरा देखना है।
गौहर जान : आवाज से स्वराज तक, बीसवीं शताब्दी में गौहर जान का उदाहरण और भी महत्वपूर्ण है। वह अपने समय की अत्यंत प्रसिद्ध गायिका और रिकॉर्डिंग कलाकार थीं। जब महात्मा गांधी के स्वराज फंड के लिए सहयोग जुटाया जा रहा था, तब गौहर जान ने धन जुटाने के लिए कार्यक्रम किया।
एक ऐतिहासिक विवरण के अनुसार कार्यक्रम से लगभग 24,000 रुपये एकत्र हुए, लेकिन गांधी के स्वयं कार्यक्रम में न पहुँच पाने से गौहर जान ने आधी राशि—12,000 रुपये—ही दी। उनके इस निर्णय में आत्मसम्मान की भावना भी दिखाई देती है; उन्होंने यह माना कि जब उनसे किया गया वादा पूरा नहीं हुआ तो वह भी अपने वादे का पूरा हिस्सा देने के लिए बाध्य नहीं हैं।
गौहर जान का जीवन यह भी बताता है कि इन स्त्रियों के पास केवल देह नहीं थी—आवाज थी, कला थी, हुनर था, कमाने की क्षमता थी और निर्णय लेने का साहस था।
जिनका हुनर हमने लिया, नाम नहीं
विडंबना यह है कि स्वतंत्र भारत ने तवायफों की कला से बहुत कुछ लिया, लेकिन स्वयं उन कलाकार स्त्रियों को सम्मान देने में देर की।
ठुमरी, दादरा, कथक और गायन की परंपराओं को आगे बढ़ाने में तवायफों की भूमिका रही। आगे चलकर इनके परिवारों और परंपरा से जुड़ी महिलाओं ने रंगमंच, रिकॉर्डिंग और सिनेमा में भी प्रवेश किया। इतिहासकारों ने यह रेखांकित किया है कि तवायफ परंपरा से आई कुछ महिलाओं ने अभिनय, गायन, संगीत निर्देशन और फिल्म निर्माण तक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में कितना धन दिया या कितनी बार अंग्रेजों के खिलाफ खड़ी हुईं। बड़ा प्रश्न यह है कि हमने उनके जीवन को समझने की कोशिश कितनी की?
जिस समाज ने पुरुषों की रखैल संस्कृति को अक्सर चुपचाप स्वीकार किया, उसी समाज ने स्त्री को ‘चरित्रहीन’ कहकर उसकी पूरी मनुष्यता को नकार दिया। यही दोहरा मापदंड इतिहास में भी दिखाई देता है।
यह आलेख देह-व्यापार का महिमामंडन नहीं करता। शोषण, मजबूरी और देह के व्यापार से जुड़ी पीड़ा को किसी भी स्थिति में रोमांटिक नहीं बनाया जा सकता। लेकिन किसी स्त्री का पेशा उसकी पूरी मनुष्यता को समाप्त नहीं कर देता। उसके भीतर कलाकार, नागरिक, माँ, बेटी, कमाने वाली महिला और देशभक्त—इनमें से कोई भी पहचान हो सकती है।
आजादी का अर्थ
15 अगस्त 2026 को जब हम तिरंगा फहराएँ तो स्वतंत्रता का अर्थ केवल अंग्रेजों से मिली राजनीतिक मुक्ति तक सीमित न रखें।
सच्ची आजादी उस मानसिकता से भी मुक्ति है, जो किसी मनुष्य को उसके पेशे, जाति, लिंग या सामाजिक स्थिति के आधार पर छोटा समझती है।
अजीज़ुनबाई, अज़ीज़न और गौहर जान जैसी स्त्रियाँ हमें याद दिलाती हैं कि राष्ट्र निर्माण केवल राजमहलों, संसदों और युद्धभूमियों में नहीं होता। कभी-कभी इतिहास के अँधेरे कोनों में खड़ी कोई गुमनाम स्त्री भी अपने हिस्से का दीपक जलाती है।
उनका योगदान छोटा हो सकता है, बड़ा हो सकता है, प्रमाण सीमित हो सकते हैं—लेकिन उसे केवल इसलिए मिटा देना कि समाज ने उन्हें सम्मानजनक नाम नहीं दिया, इतिहास के साथ न्याय नहीं है।
जिन्होंने अपने हुनर से कमाया, अपनी संपत्ति से सहयोग दिया, अपने कोठों को संपर्क और आश्रय का स्थान बनाया और कहीं-कहीं हथियार तक उठाए—वे भी इस देश की आजादी की कहानी का हिस्सा हैं।
आजादी का तिरंगा उन सबका है—
जिनके नाम इतिहास की किताबों में लिखे हैं और उन गुमनाम स्त्रियों का भी, जिनके नाम इतिहास ने लिखे ही नहीं।
शायद स्वतंत्रता दिवस पर उन्हें याद करना ही इतिहास के प्रति हमारी एक छोटी-सी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
nlbharatiauthor@ gmail. com
जिन्होंने अपना तन, हुनर और धन देश के काम लगाया, पर इतिहास में जगह नहीं मिली
लेखक : नन्दलाल भारती
लेखक एवं सामाजिक चिंतक
15 अगस्त हमारे लिए केवल राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात स्त्री-पुरुषों को याद करने का दिन है, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व लगाया। लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास पढ़ते समय एक सवाल बार-बार सामने आता है—क्या इतिहास में वही लोग दर्ज हुए, जिन्हें तत्कालीन समाज सम्मान की दृष्टि से देखता था?शायद नहीं।
इतिहास के हाशिये पर ऐसी अनेक स्त्रियाँ भी थीं, जिन्हें समाज ने ‘तवायफ’, ‘नाचने वाली’ या ‘वेश्या’ जैसे शब्दों में सीमित कर दिया। उनके जीवन, कला, आर्थिक स्वतंत्रता और देश के लिए किए गए योगदान को लंबे समय तक गंभीरता से नहीं देखा गया।
यहाँ एक अंतर समझना जरूरी है। उस दौर की हर तवायफ को आज के अर्थ में ‘वेश्या’ कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। अनेक तवायफें संगीत, नृत्य, कविता, शायरी और तहजीब की उच्च प्रशिक्षित कलाकार थीं। वे संपत्ति रखती थीं, कर देती थीं और कई बार पुरुषों की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र जीवन जीती थीं। लखनऊ जैसे शहरों में उनका सांस्कृतिक और आर्थिक प्रभाव इतना मजबूत था कि वे उच्च करदाता वर्ग में शामिल थीं।
लेकिन 19वीं शताब्दी में औपनिवेशिक शासन और बदलती सामाजिक नैतिकता ने उनके संसार को कलंकित करना शुरू किया। अंग्रेजी शासन ने तवायफों को अक्सर केवल देह और यौनता के संकुचित नजरिए से देखा। उनकी कला, सामाजिक भूमिका और स्वतंत्र आर्थिक अस्तित्व पीछे धकेल दिए गए।
1857 के विद्रोह के बाद तो कई तवायफों की संपत्तियाँ तक जब्त की गईं। शोधकर्ताओं के अनुसार अवध और लखनऊ में कुछ तवायफों ने विद्रोहियों को आश्रय, आर्थिक सहायता और संपर्क उपलब्ध कराया था।
अजीज़ुनबाई- जिसने पिस्तौल उठाई,1857 की क्रांति में कानपुर की अजीज़ुनबाई का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वह एक तवायफ थीं, लेकिन विद्रोह के समय उन्होंने केवल दर्शक बने रहना स्वीकार नहीं किया। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उन्हें विद्रोही सैनिकों के साथ देखा गया और उनके पास पिस्तौल भी थी। उनके बारे में उपलब्ध सामग्री बताती है कि उन्होंने विद्रोहियों की सहायता की और संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई। फिर भी उनका नाम आजादी के मुख्य इतिहास में लगभग अनुपस्थित है।
अज़ीज़न : कोठे से क्रांति तक,लखनऊ की अज़ीज़न का नाम भी 1857 के विद्रोह से जुड़ा मिलता है। उपलब्ध ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार उन्होंने नाना साहब के आह्वान पर विद्रोह में भाग लिया। उनका नाम आज भी बहुत कम लोगों को मालूम है। यह विस्मृति केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरी स्त्री-परंपरा की विस्मृति है जिसे इतिहास ने सम्मानजनक स्थान नहीं दिया।
इन स्त्रियों के लिए उनका कोठा केवल मनोरंजन का स्थान नहीं था। वह कला, संगीत, कविता और बातचीत का केंद्र था।
1857 के दौर में कुछ कोठे विद्रोहियों के मिलने-जुलने, संदेशों के आदान-प्रदान और आश्रय के स्थान भी बने। इसलिए उन्हें केवल ‘देह व्यापार’ की संकीर्ण परिभाषा में देखना उस समय की सामाजिक वास्तविकता को अधूरा देखना है।
गौहर जान : आवाज से स्वराज तक, बीसवीं शताब्दी में गौहर जान का उदाहरण और भी महत्वपूर्ण है। वह अपने समय की अत्यंत प्रसिद्ध गायिका और रिकॉर्डिंग कलाकार थीं। जब महात्मा गांधी के स्वराज फंड के लिए सहयोग जुटाया जा रहा था, तब गौहर जान ने धन जुटाने के लिए कार्यक्रम किया।
एक ऐतिहासिक विवरण के अनुसार कार्यक्रम से लगभग 24,000 रुपये एकत्र हुए, लेकिन गांधी के स्वयं कार्यक्रम में न पहुँच पाने से गौहर जान ने आधी राशि—12,000 रुपये—ही दी। उनके इस निर्णय में आत्मसम्मान की भावना भी दिखाई देती है; उन्होंने यह माना कि जब उनसे किया गया वादा पूरा नहीं हुआ तो वह भी अपने वादे का पूरा हिस्सा देने के लिए बाध्य नहीं हैं।
गौहर जान का जीवन यह भी बताता है कि इन स्त्रियों के पास केवल देह नहीं थी—आवाज थी, कला थी, हुनर था, कमाने की क्षमता थी और निर्णय लेने का साहस था।
जिनका हुनर हमने लिया, नाम नहीं
विडंबना यह है कि स्वतंत्र भारत ने तवायफों की कला से बहुत कुछ लिया, लेकिन स्वयं उन कलाकार स्त्रियों को सम्मान देने में देर की।
ठुमरी, दादरा, कथक और गायन की परंपराओं को आगे बढ़ाने में तवायफों की भूमिका रही। आगे चलकर इनके परिवारों और परंपरा से जुड़ी महिलाओं ने रंगमंच, रिकॉर्डिंग और सिनेमा में भी प्रवेश किया। इतिहासकारों ने यह रेखांकित किया है कि तवायफ परंपरा से आई कुछ महिलाओं ने अभिनय, गायन, संगीत निर्देशन और फिल्म निर्माण तक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में कितना धन दिया या कितनी बार अंग्रेजों के खिलाफ खड़ी हुईं। बड़ा प्रश्न यह है कि हमने उनके जीवन को समझने की कोशिश कितनी की?
जिस समाज ने पुरुषों की रखैल संस्कृति को अक्सर चुपचाप स्वीकार किया, उसी समाज ने स्त्री को ‘चरित्रहीन’ कहकर उसकी पूरी मनुष्यता को नकार दिया। यही दोहरा मापदंड इतिहास में भी दिखाई देता है।
यह आलेख देह-व्यापार का महिमामंडन नहीं करता। शोषण, मजबूरी और देह के व्यापार से जुड़ी पीड़ा को किसी भी स्थिति में रोमांटिक नहीं बनाया जा सकता। लेकिन किसी स्त्री का पेशा उसकी पूरी मनुष्यता को समाप्त नहीं कर देता। उसके भीतर कलाकार, नागरिक, माँ, बेटी, कमाने वाली महिला और देशभक्त—इनमें से कोई भी पहचान हो सकती है।
आजादी का अर्थ
15 अगस्त 2026 को जब हम तिरंगा फहराएँ तो स्वतंत्रता का अर्थ केवल अंग्रेजों से मिली राजनीतिक मुक्ति तक सीमित न रखें।
सच्ची आजादी उस मानसिकता से भी मुक्ति है, जो किसी मनुष्य को उसके पेशे, जाति, लिंग या सामाजिक स्थिति के आधार पर छोटा समझती है।
अजीज़ुनबाई, अज़ीज़न और गौहर जान जैसी स्त्रियाँ हमें याद दिलाती हैं कि राष्ट्र निर्माण केवल राजमहलों, संसदों और युद्धभूमियों में नहीं होता। कभी-कभी इतिहास के अँधेरे कोनों में खड़ी कोई गुमनाम स्त्री भी अपने हिस्से का दीपक जलाती है।
उनका योगदान छोटा हो सकता है, बड़ा हो सकता है, प्रमाण सीमित हो सकते हैं—लेकिन उसे केवल इसलिए मिटा देना कि समाज ने उन्हें सम्मानजनक नाम नहीं दिया, इतिहास के साथ न्याय नहीं है।
जिन्होंने अपने हुनर से कमाया, अपनी संपत्ति से सहयोग दिया, अपने कोठों को संपर्क और आश्रय का स्थान बनाया और कहीं-कहीं हथियार तक उठाए—वे भी इस देश की आजादी की कहानी का हिस्सा हैं।
आजादी का तिरंगा उन सबका है—
जिनके नाम इतिहास की किताबों में लिखे हैं और उन गुमनाम स्त्रियों का भी, जिनके नाम इतिहास ने लिखे ही नहीं।
शायद स्वतंत्रता दिवस पर उन्हें याद करना ही इतिहास के प्रति हमारी एक छोटी-सी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
nlbharatiauthor@ gmail. com
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