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सामाजिक समानता के महान संत शिरोमणि गुरु रविदास

 

आलेख:सामाजिक समानता के महान संत शिरोमणि गुरु रविदास

सामाजिक समानता के महान संत शिरोमणि गुरु रविदास पर मेरा लेख l यह लेख श्रुतियों,पुस्तकों,ऑनलाइन सर्च एवं अध्ययन पर आधारित हैl

दोस्तों भारत की संत परंपरा में संतशिरोमणि ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने जाति, ऊँच-नीच और भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता के सच्चे मार्ग को प्रशस्त किया। संत शिरोमणि गुरु रविदास का नाम उन महापुरुषों में सर्वोच्च स्थान रखता है। वे केवल धार्मिक संत ही नहीं बल्कि सामाजिक क्रांतिकारी, समानता और मानवाधिकारों के महान प्रवक्ता थे। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग जाति, धर्म, वंश या संप्रदाय से नहीं बल्कि सच्चे कर्म, भक्ति और मानवीय गुणों से होकर जाता है।

संत रविदास का जन्म ऐसे समय हुआ जब भारतीय समाज जातिवाद की गहरी खाई चौथे दर्जे के शुद्रो के विनाश का कारण बनी हुई थी। शूद्र और अछूत कही जाने वाली जातियों के लिए शिक्षा, पूजा और सामाजिक अधिकार वर्जित था। ऐसे विषम समय में रविदास ने न केवल इस भेदभाव को चुनौती दी बल्कि अपने भजनों और उपदेशों से मानव को एक समान मानने की भी शिक्षा दिए l

बचपन से ही रविदास अत्यंत विनम्र, करुणामय और ईश्वर-भक्त थे। वे समाज के दबे-कुचले लोगों की पीड़ा को गहराई से महसूस करते थे। उनका जीवन दरिद्रता और कठिनाइयों में बीता, परंतु वे सदा संतोष और ईश्वर-भक्ति में लीन रहे।

रविदास जी अपनी भक्ति और समाज सुधार के कार्यों में सक्रिय रहे। धीरे-धीरे उनकी ख्याति चारों ओर फैलने लगी थी l

रविदास जी के समय में भारतीय समाज में चारों वर्णों और उनकी अनेक जातियों में कठोर विभाजन था। अस्पृश्यता की प्रथा इतनी गहरी थी कि निचली जातियों को मंदिर में प्रवेश, शिक्षा प्राप्त करने की धार्मिक विधान के अनुसार अनुमति तक नहीं थी, यहाँ तक कि सार्वजनिक स्थलों पर स्वतंत्र रूप से चलने-फिरने तक की भी अनुमति नहीं थी।

ऐसे माहौल में संत रविदास ने अपनी रचनाओं के माध्यम से यह उद्घोष किया कि –

ईश्वर एक है और वह सबका है।

जाति और जन्म से कोई ऊँच-नीच नहीं होता, सच्चे कर्म और भक्ति से ही मनुष्य महान बनता है।

सच्ची भक्ति वही है जिसमें दया, करुणा, सत्य और समानता हो।

संत रविदास भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे। वे निर्गुण निराकार ईश्वर के उपासक थे।वे राजा दशरथ के पुत्र राम के नहीं थे,उनका विश्वास था कि ईश्वर न तो मूर्तियों में है और न किसी विशेष स्थान में। वह तो हर जीव और हर अणु में विद्यमान है।

संत शिरोमणि रविदास जी की भक्ति और दर्शन दुनिया की आँख खोलने के लिए काफ़ी हैंl

संत शिरोमणि रविदास जी का सच दुनिया के लिए सबसे प्रसिद्ध संदेश था,जो आज भी मान्य है l जी हाँ ऐसा ही सन्देश है-"मन चंगा तो कठौती में गंगा।" इस सन्देश का शाब्दिक अर्थ है-यदि मनुष्य मन से शुद्ध और निर्मल है तो साधारण पात्र में भी गंगा का अनुभव हो सकता है।

संत रविदास ने कहा कि जब तक समाज जाति और छुआछूत की बेड़ियों में जकड़ा रहेगा तब तक सच्चा धर्म और ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है। उन्होंने एक ऐसे समाज की कल्पना की जिसमें सबको समान अधिकार हों।

उनकी प्रसिद्ध रचना बेगमपुरा इसी का प्रमाण है। उन्होंने "बेगमपुरा" अर्थात् ऐसा नगर बताया जहाँ कोई दुःख नहीं, कोई कर नहीं है, न कोई जातिगत भेदभाव है।

बेगमपुरा संत शिरोमणि रविदास के सामाजिक समानता की पराकाष्ठा है – जहाँ सबको समान अवसर और सम्मान मिले, उन्होंने कहा है l

"बेगमपुरा शहर को नाऊ,

दुख अंधु न तिस गाव बसाऊ।

ना तसवीस खिराजु न माला,

खौफ़ु न खता न तरसु जिव जाला।"

रविदास जी की वाणी आज भी गुरु ग्रंथ साहिब में सुरक्षित है। उन्होंने सैकड़ों पद और भजन रचे जिनमें भक्ति और सामाजिक समरसता का संदेश है।

उनके पदों में प्रमुख बातें मिलती हैं –ईश्वर-भक्ति ही सच्चा मार्ग है।

सभी मनुष्य एक समान हैं।

जाति, धर्म, संप्रदाय से ऊपर उठकर प्रेम और मानवता का पालन करो।

सच्चा साधु वही है जो दीन-दुखियों की सेवा करे,


बदले हुए युग में धर्मानधता आज इतनी विकृत हो गयी है कि झूठे फरेबी साधुओं की बाढ़ आ गयी है, तरह तरह के मुखौटे लगाकर करोड़ों कमा रहे है, हवाई जहाज, चार्टेड प्लेन में चल रहे हैं, धर्मानधता का साम्राज्य बना रहे, गली-गली, चौराहे-चौराहे पर जहां तनिक सरकारी जगह मिली वही उनकी दुकान खड़ी हो जाती है, भक्ति और दर्शन से इनका कोई दूर-दूर तक कोई लेने देना नहीं है, धर्म की आड़ में बिना मेहनत की कमाई करना उनका मकसद है l

भक्तिकाल में सगुणभक्ति और निर्गुण भक्ति शाखा के अंतर्गत आने वाले प्रमुख कवि हैं - कबीरदास,तुलसीदास, सूरदास, नंददास, कृष्णदास, परमानंद दास, कुंभनदास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी, गोविन्दस्वामी, हितहरिवंश, गदाधर भट्ट, मीराबाई, स्वामी हरिदास, सूरदास , रसखान, ध्रुवदास तथा चैतन्य महाप्रभु, रहीमदास,नामदेव, चोखा मेला, गाडगे बाबा, संत कनकदास, संत दादू दयाल, संत गरीब दास और संत तिरुवल्लुवर आदि संत एवं दार्शनिक इसी भारत भूमि पर अवतरित हुए थे, ऐसे साधु-संतो में संत शिरोमणि प्रथम पक्ति के संत रहे हैं l

ऐसा नहीं की धरती पर संत नहीं होंगे दर्शन दुर्लभ जरूर हैं, वे भक्ति में लीन होंगे, उन्हें दुनिया की धन-दौलत वैभव तो मिट्टी समान होती हैl बौद्ध भंते और जैन साधु-साध्वी को देखते ही श्रद्धा से सिर झुक जाता है, दूसरे साधुवेशधारियों को देखकर आदमी सावधान हो जाता है कि ये बाबा कुछ मांगेगा जरूर,आज के साधु के रूप में बहुरुपिओं ने धर्म, भक्ति और दर्शन की लीपापोती कर धन अर्जन में रमे हुए हैं l

संत शिरोमणि रविदास ऐसे संत थे कि घोर अभाव में पारस पत्थर तक उपयोग नहीं किया, जबकि उनकी कुटिया में पारस पत्थर मौजूद था पर वे उस पारस पत्थर को छुये तक नहीं l ऐसे संतो के प्रति कौन सा ऐसा आदमी होगा,जो दंडवत नहीं होगा l

कहने को तो देश विश्व गुरु बन रहा,दूसरी ओर धर्म के ठेकेदार मंदिर प्रवेश पर आग उगलते रहते हैं, विगत कुछ महीने पहले ओबीसी के कथावाचक का सिर मुड़वा कर वर्ण विशेष की महिला के मूत्र से इस कथावाचक का शुद्धिकरण किया गया, ऐसी खबर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही थी, क्या इस वर्ण की महिलाओं के मूत्र और मल, गाय के कंडो की शक्ल में और मूत्र को बाजार में उतारने की योजना तो नहीं हैं, इन धर्म के ठेकेदारों की l

इससे बड़े आश्चर्य की बात है की पूरा ओबीसी सहित पूरा बहुजन समाज मौन है, क्या मजबूरी है कि देश का अस्सी प्रतिशत समाज इकट्ठा होकर मानवतावादी -समतावादी धर्म की राह नहीं चल सकता? विज्ञान के युग में भी धर्म इतना विकृत कैसे होता जा रहा?धर्माधीशों/सत्ताधीशों के कान पर जू तक नहीं रेंग रहा l ये संत महात्मा,शंकराचार्य क्या कर रहे, कोई ऐसे धार्मिक अपराधों के खिलाफ संज्ञान क्यों नहीं लेते? यदि ऐसी ही इनकी मानसिकता है तो पीड़ित बहुजन समाज ऐसे धर्म और धार्मिक सत्ताधीशों का तिरस्कार क्यों नहीं करता?

दोस्तों जब मैं प्राइमरी स्कूल में पढ़ता था, तब कई मानवता से ओत-प्रोत कहानियाँ सुना था कि अपने देश में ऐसे संत हुए हैं जो मानवता और अहिंसा में विश्वास करते थे,कुछ संत, महात्मा, धर्मात्मा ऐसे भी हुए जो अपने शरीर के सड़े-गले अथवा कोढ में पड़े कीड़े जमीन पर गिर जाते थे, तो उठाकर उसी घाव में डाल देते थे, मुझे अविश्वास सा लग तो रहा था पर जब मैंने सर्च किया तो मुझे कुछ तथ्य मिले, आप सुनिए;


बौद्ध कथाओं में यह भी वर्णित है कि बौद्ध परंपरा में, विशेष रूप से जातक कथाओं में, महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ मिलती हैं, जिनमें उनके ऐसे ही महान त्याग और करुणा के कार्यों को उल्लेखित किया गया है l हैं।

इन जातक कथाओं के अनुसार, एक बार महात्मा बुद्ध को एक भयंकर कोढ़ हो गया था, जिससे उनके शरीर से रक्त और मवाद बहने लगा था।

इस अवस्था में भी उन्होंने पृथ्वी पर गिरे हुए छोटे कीड़ों को उठाया और उन्हें अपने घावों में डाल दिया, जिससे कीड़े रक्त और मांस को खाकर अपने जीवन का निर्वाह कर सकें।यह कार्य उनकी असीमित दया और सभी जीवित प्राणियों के प्रति उनके प्रेम का प्रतीक है। उन्होंने दूसरों के जीवन के लिए अपने शरीर की पीड़ा को नज़रअंदाज़ किया।

इस तरह की कथाएं महात्मा बुद्ध के चरित्र की महानता और उनकी उच्च आध्यात्मिक चेतना को दर्शाती हैं।

दूसरे तरफ एक धर्म है जो अपने अनुयायीयों को ऊंच नीच में बांटता है, अमानुषता की हदे पार कर, हत्या तक कर दी जाती है, आदमी को अछूत घोषित कर जीवन नरक बना दिया जाता है, शिक्षा के द्वार बंद कर दिए जाते हैं, महिलाओं को दासी बनाकर शोषण किया जाता था , महिलाओं को स्तन तक ढकने की इजाजत नहीं होती थी, सच में यह कोई धर्म हो सकता है क्या? जहां ना मानवता है ना समता ना बराबरी का हक.... आप सोचिये कैसा धर्म है, कैसा धार्मिक विधान....? सवाल तो उठता है परन्तु सदियों से निरुत्तर है,आप जबाब तलाशियेगा?

आइये संत रविदासजी के बारे में बात जारी रखते हैं, इस महान संत की ख्याति इतनी बढ़ गई कि राजस्थान की महान संत कवयित्री मीरा बाई भी उनकी शिष्या बन गयीं । मीरा ने संत रविदासजी को अपना गुरु माना और मीराबाई ने अपनी वाणी में संत रविदास के प्रति अटूट श्रद्धा जाहिर किया l

आप भी सुनिए मीराबाई कहती हैं;

"गुरु मिल्या रैदास जी, दिया मंत्र अजीब।

जाके शरणी पडत ही, मिटे सकल संदीप।"

यह प्रमाण है कि संत रविदास ने केवल सामान्य जनों को ही नहीं बल्कि राजघराने की विभूतियों को भी अपनी समानता की शिक्षा से प्रभावित किया।

संत रविदास के भजन सरल भाषा, मार्मिक भाव और गहन दर्शन से परिपूर्ण हैं। उनमें भक्ति के साथ-साथ सामाजिक चेतना का भी प्रभावकारी असर झलकता है। संत शिरोमणि की कुछ प्रेरणादायी पंक्तियाँ आप सुनिए;

"जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।

रविदास मनुष न जुड़ सके, जब तक जाति न जात।"

अर्थात् जातियों के विभाजन ने मनुष्यों को बाँट रखा है, जब तक यह भेदभाव समाप्त नहीं होगा तब तक सच्ची एकता संभव नहीं।

"ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिलै सबन को अन्न।

छोट-बड़ा सब सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।"

संत रविदास आजीवन सामाजिक सुधारों, मानवता एवं समता के लिए संघर्ष किये, संत रविदास ने छुआछूत,अस्पृश्यता का विरोध किया, उन्होंने सिद्ध कर दिया कि ईश्वर-भक्ति और आध्यात्मिक महानता जाति पर निर्भर नहीं है,उन्होंने सभी को समान शिक्षा पर जोर दिया l

संत रविदास जी ने स्त्री को भी ईश्वर की अनुपम रचना कहा और समान अधिकारों के लिए भी संघर्ष किया l संत रविदास ऐसे संत थे, जिन्होंने आर्थिक न्याय पर जोर देते हुए बेगमपुरा की कल्पना करते हुए कर-मुक्त और शोषण-रहित समाज का आह्वान किया परन्तु वर्णवादी धर्म में आज तक कुछ खास परिवर्तन, सामाजिक रुपरेखा में कोई बदलाव नहीं हुआ तो नहीं हुआ,लगता है, धार्मिक सत्ताधिशों ने बदलाव नहीं करने की कसम खा लिया हैl

विज्ञान के इस युग में भी जब समाज में जातीय भेदभाव, असमानता, आर्थिक विषमता और सामाजिक अन्याय मौजूद है, संत रविदास की शिक्षाएँ अत्यंत प्रासंगिक हैं l

दोस्तों आइये संत शिरोमणि रविदास जी की एक रचना सुनते हैं;

न जन्म पूछे, न जाति पूछे,

न ऊँच-नीच का भेद।

रविदास का संदेश यही है,

मानवता ही धर्म विशेष।

बेगमपुरा का सपना उनका,

जहाँ न हो कोई पराया।

जहाँ सब मिलकर गाएँ गीत,

समानता का मधुर सुर छाया।

संत शिरोमणि गुरु रविदास का जीवन और उनका दर्शन केवल किसी एक जाति, वर्ग या धर्म के लिए नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज के लिए अमूल्य धरोहर है। संत शिरोमणि ने अपने कर्म, वाणी और भक्ति से यह सिद्ध किया कि मनुष्य की महानता उसके जन्म में नहीं, बल्कि उसके आचरण और कर्म में है, उन्होंने ही कहा

"मन चंगा तो कठौती में गंगा"

आज जब आदमी चाँद पर पहुंच चुका दूसरे ग्रहों पर जाने की तैयारी, आसमान के उस पार नये पर नई दुनिया बसाने की तैयारी है तब भी संत शिरोमणि रविदास की साधना भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व को संदेश देती है कि शुद्ध मन और सच्चे कर्म से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है।

संत रैदास ने छुआछूत,असमानता,पाखंड,जातिवाद, निम्नवर्णों की शिक्षा,सुरक्षा और संपत्ति के अधिकार पर प्रतिबंध व इन पर किए जाने वाले अत्याचार, शोषण, भेदभाव, प्रताड़ना, शोषण और मनमानी के सिद्धांतों पर ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई व्यवस्था का विरोध किया l

मनुवादियों ने संत रैदास के आंदोलन को एक चमार का रूप दे दिया और उनके बारे में जो भी लिखा उसमें अंधविश्वास,पाखंड,चमत्कार और झूठ भर दिया ताकि उनके आंदोलन का क्रांतिकारी प्रभाव खत्म हो क्योंकि अंग्रेजों के आने से पहले उच्चवर्णों को ही शिक्षा का अधिकार था इसलिए उनकी इस साजिश की काट नहीं हो सकी अभी तक जितने भी निष्पक्ष शोध हुए हैं उनके अनुसार संत रैदास बुद्ध के अनुयाई के तौर पर अधिक प्रमाणित सिद्ध होते हैं। रविदास जी लिखते हैं;

रैदास न ब्राह्मण पूजिए, जऊ होवे गुणहीन

पूजे चरण चंडाल के, जऊ होवे गुण परवीन

माथे तिलक हाथ जप माला

जब ठगने को स्वांग रचाया.....

संत कबीर के परिनिर्वाण के बाद निर्गुणवाद का दायित्व संत शिरोमणि रविदास जी पर आ गया था,इसलिए वे समता मिशन के नायक बन गए थे, जिसके परिणाम स्वरूप इस महान संत की हत्या राक्षसी विचारधारा के अमानुषों ने कर दिया थाl

भीमराव जाधव का लेख जो मुझे Blogger.om:/httpa:aatmaparikshan.blogspot.com पर जब मैंने पढ़ा तो मेरे बचपन की श्रुतियों पर आत्मसतुष्टि हुई, मैं उसी लेख का कुछ अंश आपके साथ साझा कर रहा हूँ l मुझे विश्वास है कि आपको भी यकीन हो जायेगा कि संत शिरोमणि की हत्या चितोड़गढ़ में हुई थी;

मीरा को जान से मारने के प्रयास दो बार किए गए संत रविदास जी के मिशन के सहयोगी रहे संत पलटू साहिब को ब्राह्मणों ने उनकी झोपड़ी में आग लगाकर मार डालने का प्रयास किया मीरा और पलटू जी की हत्या के प्रयासों को देखते हुए साबित हो जाता है कि मनुवादी अपने विरोधियों की हत्याएं तक करने पर उतर आए थे ऐसे में उनके लिए संतरविदास जी की हत्या कोई बड़ी बात नहीं थी l

मीरा के पदों में मृत्यु के प्रतीकों का होना, जिन्हें मीरा का विलाप शीर्षक दिया गया है यह दर्शाता है कि संत रविदास जी की हत्या ही हुई थी

मीरा ने महल छोड़ने का निर्णय भी इसी कारण किया जिस महल में उसके आध्यात्मिक गुरु की हत्या हुई हो वह वहाँ एक पल को भी नहीं रुक सकती थी मीरा जैसी संस्कारवान हिंदू नारी ने अपने पति का घर यूं ही तो नहीं छोड़ दिया होगा?

संत रविदास जी के चित्तौड़ में निर्वाण पर लगभग सभी विद्वान सहमत है इससे भी चित्तौड़गढ़ में उनकी हत्या होने की बात को बल मिलता हैl

भले ही राक्षसी प्रवृत्ति के हैवानों ने संतशिरोमणि की हत्या कर दिया परन्तु उनके सन्देश और विचार अजर-अमर हो गए हैं l

रैदास इसलिए भी स्मरणीय रहेंगे कि रैदास ने वही कहा है जो बुद्ध ने कहा है। लेकिन बुद्ध की भाषा ज्ञानी की भाषा है, रैदास की भाषा भक्त की भाषा है, प्रेम की भाषा है। शायद इसीलिए बुद्ध को तो उखाड़ा जा सका, रैदास को नहीं उखाड़ा जा सका। जिसकी जड़ों को प्रेम से सींचा गया हो उसे उखाड़ना असंभव है।

बुद्ध के साथ तर्क किया जा सका, बुद्ध के साथ विवाद किया जा सका, रैदास के साथ तर्क नहीं हो सकता, विवाद नहीं हो सकता। प्रेम के सामने झुकने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है, क्योंकि प्रेम परमात्मा का प्रकटीकरण है, अवतरण है।

आधुनिक युग में संत शिरोमणि रविदासजी के विचार और सन्देश भारत की सामाजिक समानता की लड़ाई में घोर अधियारे में दीया की तरह ज्योति बने हुए हैं और सदैव बने रहेंगे, मार्गदर्शन कर रहे हैं। संतशिरोमणि रविदासजी की परिकल्पना का "बेगमपुरा" वर्तमान युग में भी लोकतांत्रिक और समतामूलक समाज के निर्माण का आदर्श प्रस्तुत करता है।

इस आलेख का समापन संत शिरोमणि की अमृतवाणी से करता हूँ;

संत शिरोमणि ही, बेगमपुरा के बने प्रथम शिल्पकार,

बस्ती, शहर में जहां सदकर्म, सदगुणों का भंडार l

शुभम शुभम संत रविदासम l

नन्दलाल भारती

02/09/2025

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