कहानी:स्वर्ग का सुख/नन्दलाल भारती
मेरी फ्लाइट टेकऑफ कर रफ्तार पकड़ी तो मुझे लगा कि मैं पौत्र से मिलने के बहाने स्वर्ग के सुख की यात्रा कर रहा हूँ l वैसे यह मेरी पहली विमान यात्रा नहीं थी इसके इसके पहले भी कई बार विमान की यात्रा कर चुका था l
मेरे लिए यह यात्रा खास थी कि कुल दीपक से मिलने उसके बाल विनय पर एक शहर से दूसरे बड़े शहर की यात्रा कर रहा था l सूरत विमान जैसे हादसे का तो मुझे बिल्कुल डर नहीं थाl छोटे बेटे भाग्योदय ने पूरे महीने की दवाई कोर्स कब-कब दवाई लेना है लिखकर दिया था ताकि सौरभ को पापा की दवाई के लिए मशक्त न करना पड़े l इन दवाईयों में कुछ दवाइयां ऐसी थी जो हर जगह नहीं मिलती थी, इसलिए भाग्योदय ने पूरी सावधानी बरता था l
मैं वायुयान की उड़ान में नहीं बल्कि सपनों की उड़ान में उड़ रहा था l घर से जब प्रस्थान किया था तो पत्नी लीला ने मुस्कराकर हैप्पी जर्नी नरेश कही थी l दवाई मिस नहीं करना, टेक केयर एंड हैप्पी जर्नी पापा l मेरा असली केयर टेकर यही भाग्योदय है l
मेरे सिर पर स्वर्गीय माँ -बाप की दुआओं के साथ लीला और बच्चों की बेस्ट विशेस और केयर भी थी तो मुझे फिक्र करने की कोई वजह नहीं थी l
सूरत जैसे विमान हादसे तक की कोई आशंका नहीं थी पर तनिक डर थी तो शोहदे माँ-बाप की बेटी कुलबहू सौरभ की विक्षिप्त पत्नी महुरी से l
डेढ़ घंटे की फ्लाइंग के बाद फ्लाइट एयरपोर्ट पर सकुशल लैंड की थीl एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही बेटा सौरभ और दीपक जिसका छठवां बर्थडे अभी कुछ महीने पहले पूरे परिवार के साथ मनाने का अवसर मिला था l सौरभ गनपुरिया सास-ससुर के चंगुल में बुरी तरह फंसा हुआ था, शायद शोहदे परिवार की पकड़ कुछ ढीली पड़ रही थी l देवाशीष थोड़ा -थोड़ा अपने खानदानी रिश्ते के बारे में समझने भी लगा था l देवाशीष के लिए सौरभ ने बड़ी कुर्बानियां भी दिया परन्तु गनपुरिया शोहदे ससुराल वालों का दबदबा बरकार था l
कहते ना न शेरवा का डर ना बघवा का सबसे बड़ा डर टिपटिपवा का l यही हाल था सौरभ के जीवन में महुरी और उसके माँ -बाप का l
देवाशीष बाप के कंधे पर बैठा दूर से हाथ हिलाते हुए मुझे दिखाई पड़ गया शायद वह मुझे पहले ही देख लिया था l देवाशीष सौरभ के कंधे से उतर कर अंधाधुंध मेरी तरफ दौड़ लगा दिया थाl
सौरभ रुक जा देवाशीष रुक जा कहकर पीछे-पीछे दौड़ रहा थाl देवाशीष दौड़ कर मेरे पास आया और मुझे पकड़ कर झूल गया l ठीक ऐसा ही मेरी लाड़ली नातिन अवनि भी तो करती हैl देवाशीष में डेढ़ साल का अंतर है पर दोनों सगे जुड़वा भाई-बहन जैसे लगते हैं l
मैं तो ऐसे ही आत्मिक आनंद की लिए उड़कर आया था l मैं लगेज एक तरफ फेंका और देवाशीष को गले लगा लिया l सौरभ ने सूटकेश और हैंडबैग उठा लिया था l सौरभ के पीछे-पीछे मेरी अंगुली पकड़े देवाशीष, दादीजी कैसे हैं, चाचू कैसे हैं सभी के बारे में पूछता हुआ आर्मी के जवान की तरह जिम्मेदार सैनिक की तरह मुझे सुरक्षित ले जा रहा था l
हम तीनों कार में बैठते दीपक पूछा "-दादाजी मेरा लड्डू लाये हो?
मैंने कहा-हाँ देवाशीष, आपके चाचा ने लड्डू, ड्राई फ्रूट स्वीट और आपके पसंद की ड्रेस भेजा है l
देवाशीष बोला-माय चाचू थैंक यू l
चाचा-भतीजा पहली बार मिले थे, देवाशीष के छठवें बर्थडे पर तब से चाचा-भतीजा एक दूसरे के मुरीद हो गए थे l महुरी के माँ-बाप नहीं चाहते थे कि सौरभ अपने परिवार के सम्पर्क में आएl महुरी और उसके माँ -बाप ने तरह-तरह के आरोप दहेज उत्पीड़न,मारपीट,महिला उत्पीड़न आदि अनेक l निरापद सौरभ पुलिस और महुरी के आतंक से रोज मर-मर कर जी तो रहा था पर उसका शरीर रुग्ण हो गया थाl
मैं सौरभ के निवास पर पहुँचा तो दरवाजा बंद था l सौरभ ने कॉलबेल भी बजाया पर नहीं खुला दरवाजा l सौरभ ने मास्टर चाभी से बाहर से ही ताला खोल लिया l देवाशीष बैडरूम की तरफ दौड़ा-दादाजी आ गए, दादाजी आ गए, वह ना जाने कितना खुश था, उसकी खुशी देखकर लगा तपस्या सफल हो गयी l
मैं सोफा में धंस चुका था,सौरभ गिलास में पानी लाया, मैने धीरे-धीरे कर पानी पेट में उतार लिया l देवाशीष अपना खिलौना दिखा रहा l देवाशीष के पास खिलौनों की बहुत वैरायटी खास कर तो कार के खिलौनों का बड़ा कलेक्शन थाl
दोपहर के बारह बज रहे होंगे l अलसाई हुई महुरी शायद कीचन से आयी, और बोली डैडी जी नमस्ते बस इतना ही और बैडरूम में चली गयी l उसके चेहरे पर खुशी तो नहीं थीl मुझे विश्वास हो गया था कि सौरभ और दीपक दोनों बाप बेटा का लगाव परिवार से बढ़ रहा है l महुरी के पति उत्पीड़न के चर्चे अब गोपनीय नहीं रहे थे l सास -ससुर के खिलाफ तो महुरी से ब्याह कर आते ही शंखनाद कर चुकी थी l
मुझे देखकर महुरी खुशी तो नहीं पर कुपित तो थी, उसको डर था कि उसकी हिटलरशाही नहीं चलेगीl सौरभ,पत्नी महुरी और उसके माँ-बाप के उत्पीड़न से भयभीत होकर घर-परिवार को भूल चुका था, परन्तु दीपक ने मरे हुए रिश्तों में प्राण फूँक दिया था l
ग्यारह-बारह बजे तक सो कर अच्छी सेहत बनाने वाली महुरी आज शायद एकाध घंटे पहले उठ गयी थी l तीन आदमी का खाना भी बनाना था l जो औरत अपने बच्चे को दूध नहीं पिलायी,डायपर नहीं बदली,पति के साथ पत्नी धर्म नहीं निभायी, उस औरत को ससुर के लिए रोटी बनाना जहर पीने जैसा दुखदायी था l
सिर्फ ससुर के लिए ही नहीं खुद के लिए और पति के लिए भी बनाना था, रोटी बनाने का ड्रामा तो किया नहीं जा सकता था l ससुर एक दो दिन के लिए नहीं पंद्रह दिन के लिए, यह सोच कर महुरी को चक्कर आने लगा l
महुरी को फाइव स्टार होटलों में खाना और अंग्रेजी दारू पीना भी पसंद आने लगा था l आजकल तो ऑनलाइन आर्डर पर पसंद का खाना ही नहीं सब कुछ हाजिर है, इस सुविधा का भरपूर उपभोग महुरी करती थी, यह खबर भी पहले से थी l यही महुरी जो ससुराल के लोगों से नफ़रत करती पति का दोहन-उत्पीड़न करती वही बाप का घर चलाने के लिए नौकरी भी करती थी l
वही महुरी पति को कब्जे में कैद कर कैकेयी का रूप धर कर सौरभ को दीमक की तरह खा रही थी l महुरी एक बच्चे की माँ तो बन गयी थी पर बच्चे को अपना मकसद साधने के लिए दुरूपयोग कर रही थी l महुरी अवैध वसूली के लिए, दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और तरह -तरह के इल्जाम लगाकर पुलिस और महिलाओं का भी सहयोग ले रही थी, ऐसी थी यह क्रिमिनल माइंड महुरी l
महुरी इकलौते बेटे दीपक के लिए टिफिन तक नहीं बना सकती थी, सास-ससुर के लिए कहाँ रोटी बनाने वाली थी l हॉफ माइंड महुरी के आतंक से डरा-सहमा रहता था, ज़ालिम बाप की बेटी महुरी इतनी ज़ालिम बन चुकी थी l
दीपक मेरी परछाई बना रहता था l मुझे भी दीपक के बिना बेचैनी लगती थी l सौरभ सुबह दस बजे से रात के बारह एक बजे तक वर्क फ्रॉम होम करता l सुबह जल्दी उठकर दीपक को तैयार कर स्कूल छोड़ताl
दीपक के लंच की व्यवस्था सौरभ ने स्कूल में ही करवा रखा था, बेचारा दीपक ऐसी पापिन माँ के कोख से जन्म पाया था कि न माँ की छाती का दूध पाया ना प्यार l पापिन महुरी नवजात दीपक की गाल-मुंह मार-मार कर लाल कर कहती एक -एक पूरे परिवार से बदला लेकर रहूंगी l
महुरी शादी के पहले सती सावित्री-सीता बन रही थी, उसके माता-पिता महान भद्र पुरुषl शादी के बाद धोबी के नील के पात्र में गिरे सियार तरह शेर की कलई तुरंत उतर गयी थी l महुरी की डिग्री फर्ज़ी, उसका आचरण परिवार को बिखंडित करने वाला l जिस महुरी पर मुझे ही नहीं पूरे कुटुंब को गुमान था वह परिवार द्रोही, लीला और मेरे जीवन का त्याग लूट गया तपस्या भंग हो गयी, जीवन में विरान नजर आ रहा था l
सौरभ और महुरी के फेरे लेने से पहले महुरी का बाप क्रूद्ध रतन मेरी हथेली मरोड़ते, आँख तरेरते हुए बोला देखना नरेश साहब गड़बड़ नहीं करना,उसके साथ कुछ सफ़ेद वस्त्र में सजे यकीनन गुंडा बिरादरी के थे l मुझे कुछ देर लिए मैं अवाक रह गया था l
महुरी को विदा कर क्रूद्ध रतन ने मुझ से मेरे परिवार से रिश्ते-नाते ख़त्म कर लिए थे l सौरभ को कसकर पकड़ लिए थे l
सुनने में आया कि होली के दिन कुछ बदमाशों ने क्रूद्धरतन के घर में हमला बोल दिया,पूरा परिवार घायल हो गया था l महुरी का जबड़ा टूट गया l पांच लड़कियो में से एक लड़की की आंत बुरी तरह घायल हो गयी थी,बलात्कार के केस को क्रूद्ध रतन ने होली के हुडदंग का नाम देकर मामला रफादफ़ा कर लिया l
महीना दो महीना के बाद क्रूद्धरतन के इकलौते बेटे पर किसी बदमाश ने गोली चला दिया था, गोली घुटने में लगी थी,पैर मे लोहे की रॉड पड़ी तब जाकर चल पाया l इस केस में भी भी क्रूद्ध रतन ने झूठा प्रचार किया कि बेटा का पैर साइकिल की चैन में फंसकर टूट गया l
सौरभ और मेरे परिवार को फंसाने के लिए महुरी ने अपने हाथ की नस काटी,फिनाइल पीयी, सुसाइड करने का ड्रामा की,पुलिस थाना की आदी, पुलिस में सैकड़ो बार शिकायत कीl घर की लड़कियों को सड़क पर वस्त्रहीन कर जलूस निकालने की धमकी दी,दहेज के केस में पूरे परिवार को जेल भेजवाने की धमकी
दिया l
महुरी के बाप क्रूद्ध रतन ने मेरे कत्ल तक की धमकी दे दिया l महुरी ने अर्ध बदन कपडो मे अपनी फोटो सोशल मिडिया पर भी साझा किया ताकि मेरा परिवार बदनाम हो जाये l
एयरपोर्ट से बेटा सौरभ और पौत्र देवाशीष के साथ घर मे दाखिल हुआ,महुरी नजर नहीं आयी l शादी के नौ-दस साल बाद देवाशीष के बाल अनुरोध को नहीं ठुकरा पाया, पौत्र मोह में आ गया था l
दोपहर के खाने के लिए हम चारों साथ डाइनिंग टेबल के चारों तरफ बैठ गए l महुरी बराबरी करने में आगे रहने वाली पहले से थीl खाना खाने के बाद मेरी जूठी थाली सौरभ ले गया महुरी नहीं l मैं बैठक कक्ष में सोफे पर बैठा हुआ था मुझे लगा सौरभ कीचेन में बर्तन मांज रहा था,यह सच था l
महुरी की नाराजगी और पति -पत्नी की खटपट मुझे डरा रही थी l मन में डर था पर देवाशीष के साथ सचमुच बहुत खुश था परन्तु महुरी को मेरी उपस्थिति अच्छी नहीं लग रही थी l
महुरी दस-दस हजार की साड़ीयां खरीदती पर साड़ी कभी पहनती नहीं थी,उसे न अपने भविष्य की फिक्र थी न पति के और नहीं देवाशीष के भविष्य की l सौरभ के साथ के लड़को के पास बंगला,गाड़ी सब कुछ था पर लाखों रूपये महीने कमाने वाले सौरभ के पास एक स्कूटर,सारी कमाई भस्मासुर जैसी महुरी माँ-बाप, भाई-बहनों पर पानी की तरह बहा रही थी l
पांच दिन मुझे पंद्रह बरस जैसे लग रहे थे l देवाशीष स्कूल से आते ही खेल-खिलौना लेकर मेरे साथ बैठ जाता, हम दादा-पोता खूब खेलते थेl शाम को देवाशीष मेरी अंगुली पकड़ कर घुमाने के लिए निकल पड़ा l थोड़ा घूमने के बाद जब वह थक गया तो मेरी अंगुली पकड़कर घर वापस ले आया l
घर में घुसते ही मुझे महाभारत की युद्ध की समाप्ति के बाद कुरुक्षेत्र के मैदान जैसी शांति लगी l पतिभक्षी खुश थी,पति जमीन पर गिरा तड़प रहा था l यह दृश्य देखकर मुझे लगा गस खाकर गिर जाऊंगा l मैं सम्भलकर सौरभ के पास बैठ गया, वह एक ही बात बार कह रहा था मैं मर जाऊंगा l नरभक्षी महुरी सौरभ की छाती पर कथक कर जैसे आनंद भैरवी गा रही थी l
मेरा आना महुरी को बर्दास्त नहीं हुआ कि मेरे आने के पांचवे दिन नरभक्षी महुरी ने अपने ही पति सौरभ को बुरी तरह घायल कर दी थी,वह जमीन पर चारों खाने चीत, कराह रहा था l कई घंटों के बाद उठा,और करहते ड्यूटी पर लग गया रात के दो-तीन बजे तक दफ्तर का करता रहा थाl मुझसे नींद कोसों दूर थीl मैंने सौरभ को आराम करने के लिए उठाया l रात इतनी बड़ी लग रही थी कि जैसे मातम की रात हो l
मैं बेचैन था, नहाया कपड़े पहने और छठवें दिन बहू महुरी के आतंक की वजह से बेटा घर छोड़ दिया l मेरे साथ सौरभ और देवाशीष रोते हुए चल रहे थे, मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरी अंतिम यात्रा निकल रही हो l
मुझे मिर्ज़ा ग़ालिब साहब की ग़जल याद आ रही थी;
हजारों ख्वाहिशे ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान, फिर भी कम निकले,
निकला खुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन,
बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले l
एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही भाग्योदय ने दोनों हाथ फैला दिए थे l लीला बोली नरेश आते-आते बहुत देर कर दिए l
हाँ लीला,स्वर्ग और नरक दोनों का सुख भोग लिया l अब किसी सुख की आशा नहीं है, हंसते-हंसते कट जायें,कहते हुए नरेश ने लीला और भाग्योदय को अंकवार में भर लिया l
नन्दलाल भारती
02/10/2025
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