Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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सात दिन छ: रात

 

सात दिन छ: रात  

खेतिहर मजदूर तीर्थदास के जीवन का सपना गरीबी में पढ़ा-लिखा बेटा जगतबाबू ने पूरा कर दिया थाl तीर्थंदास के  खानदान का पहला पढ़ा-लिखा जगतबाबू थे परन्तु तीर्थंदास का पौत्र  यानि जगतबाबू का बेटा अंशुल खानदान का पहला इंजिनियर बन गया था l 

पच्चीस अप्रैल के दिन देश के बड़े शहर कानपुर में पौत्र अंशुल के साथ सोना ब्याह कर गांव आयी थीl यह दिन तीर्थंदास के लिए बहुत बड़ी खुशी का दिन था,उनके श्रमिक जीवन की नेक कमाई की सुगंध दूर-दूर तक फैलने लगी थी l

तीर्थ दास बिस्तर में सिमटे इतने खुश थे कि जैसे जल में क्रीड़ा करती मछलियां l

यही तो अंतिम ख्वाब था तीर्थंदास का l जगतबाबू ने अपने पिता का हर ख्वाब पूरा भी किया l शहर में रहने वाले अंशुल का ब्याह गांव से कर अंशुल  के माँ ज्येश्वरी और बाप  पूरे गांव के लिए मिशाल पेश कर दिए थे l खटिया से उठकर खड़ा तक न हो पाने वाले तीर्थंदास पौत्र के ब्याह की खुशी में गीत गा रहे थे l 

जगतबाबू की माँ सुखारीदेवी के जीवन से खुशियाँ दूर रही परन्तु पिता तीर्थंदास के जीवन में वे सब खुशियाँ आयी जो उन्होंने सपने में देखा था l वे अपने बेटा जगत बाबू से खुश थे और अब इंजिनियर पौत्र ने खुशियाँ दोगुनी कर  दिया था l

गांव में पहली  अंशुल की ऐसी शादी थी जिसमें  एक पैसा  दहेज दहेज नहीं लिया गया था l बहू का नाम सिर्फ सोना था, वह एक ग्राम सोने की कीमत भी साथ लेकर नहीं आयी थी l

ज्येश्वरी खुशी-खुशी अपनी ननद शितेश्वरी के साथ तितलियों जैसी चहक-चहक कर पूरे गांव मेंमिठाई बाँटी थी जबकि सोना के माँ -बाप ने  सगुन की  किलो भर मिठाई तक नहीं दिए थे l

जगतबाबू और ज्येश्वरी क्या किसी को क्या मालूम था कि जिस सोना के आने की खुशी में पांव जमीं पर नहीं पड़ रहे वही सोना बहू  अपने स्वार्थ, अहंकार और लोभ में अंधी होकर अपने ही घर को नर्क बना देगीl  खुशी पर ऐसी  वज्रपात बनकर कर गिरेगी कि सारी खुशियां राख कर देगी l पति अंशुल को प्रेमजाल के अंधे मोड़ पर ले जाकर लूटेगी, शारीरिक और मानसिकरूप से उत्पीड़ित करेगी?

सास-ससुर को कब्र में ढकेल कर उनको उनके ही  आंसुओं में डुबो -डुबो कर मरने को विवश कर देगी l

कुलबहू सोना ससुराल की प्रतिष्ठा को कलंकित कर देगी l माँ -बाप के सुख के लिए सास-ससुर और परिवार के सुख-शांति को छिन कर मायका आबाद करेगी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा पर सोना ने यह दुःसाहस कर  कलयुग की पूतना बन गयी l

सोना गॉव के बड़े घर से जैसे ही  सास-ससुर के शहर के नव श्रृंगारित आलीशान घर में पहुंची तो उसका लोभ और अधिक प्रबल हो गया l शहर की पहली नई सुबह देर से उठकर सीधे सास ज्येश्वरी के पास पहुंची,वह हड़बड़ी में  नाश्ता बना रही थी l नाश्ता तो सोना को बनाना चाहिए था पर ज्येश्वरी अंशुल के पसंद का नाश्ता बना रही थी  सोना के भी पसंद का भी ज्येश्वरी को ख्याल था l

सास का हाथ बटाने की बजाय  सोना बोली-मम्मीजी अंशुल तो इतने सीधे हैं कि इनको अंगुली पर नचा दूंगी l ज्येश्वरी को यह कथन सोना का भोलापन लगा,वह बोली बेटी ऐसा सपने में नहीं सोचना l 

भोलीभाली ज्येश्वरी को क्या मालूम था कि सोना के दिमाग की बात दिल  का ताला तोड़कर जबान पर आ गयी है lज्येश्वरी की आँखों से आंसू बह निकले,वह आंसुओं को छिपाते हुए बोली बिटिया  ऐसा अपराध कभी ना करना l तुम तो पढ़ी-लिखी हो, मैं अनपढ़ हूँ पर  इतना जानती हूँ, कर्म का फल जरूर मिलता हैl बिटिया अच्छे कर्म करना, परिवार को जोड़कर रखना और खूब विकास करोगी l

सोना बोली -अरे मम्मी आपके कुंवर साहब  बहुत भोले हैं l

बिटिया अंशुल का मन सच्चा है l इज्जतदार परिवार का लाडला है,रिश्ते निभाना जानता हैl मर्यादा का पालन अपने परिवार का आभूषण है l सोना कुल की मर्यादा का ख्याल रखना,इसी में तुम्हारे माँ-बाप की इज्जत बढ़ेगी  ज्येश्वरी बोली l

हाँ अम्मा कहते हुए सोना अपने बेडरूम में चली गयी और सात दिन बाद ससुराल का दिल तोड़कर मायके  और मायके से माँ-बाप के साथ अंशुल के पास शहर पहुंच कर ससुराल के रिश्ते की दुश्मन पूतना बन गयीl अंशुल भी सोना और उसके माँ-बाप के दबाव में अपने ही माँ -बाप विरुद्ध हो गया था l

कई बरस बीत गए अंशुल ने माँ-बाप को भूला दिया l ज्येश्वरी की रो-रो कर दोनों आँखे ख़राब हो गयी l जगतबाबू भी पुत्र के वियोग में घूंट-घूंट कर डायबिटी और बीपी के पेशेंट हो गए l इसी बीच अंशुल पिता भी बन गया पर उसके सास-ससुर ने जगतबाबू और उनके परिवार को खबर तक नहीं लगने दिया l 

सोना और उसके लालची माँ-बाप अंशुल से लोहे के चने चबवा रहे थे, विदेशी कंपनी में लाखों रूपये की तनख्वाह पाने वाला अंशुल गरीबी की बदतर जिंदगी गुजारने को मजबूर था lसोना और उसके माँ-बाप हर तरह से अंशुल को प्रताड़ित कर लूट रहे थे l 

सोना को पति के जीवन की तनिक भी फिक्र नहीं थी l

सोना और कातिलों के सरदार उसके बाप की नजर अंशुल की महीने की लाखो रूपये तनख्वाह और इंश्योंरेंस के करोड़ रूपये पर बगुले की तरह लगी  हुई थी l 

उधर जगतबाबू और ज्येश्वरी के जीवन में बड़ी बड़ी मुश्किलें आयी-ज्येश्वरी को कई ऑपरेशन से गुजरना पड़ाl हॉस्पिटल से छुट्टी मिली तो सांप काट लिया l जगतबाबू के पिता तीर्थंदास चल बसे l जगतबाबू कई कई बार हॉस्पिटल में भर्ती हुए जीवन और मौत से महीनों संघर्ष किये पर न सोना और नहीं उसके माँ-बाप ने कभी हालचाल पूछा l घर-परिवार में कई शादी-ब्याह भी हुए पर खानदान की बड़ी बहू सोना ने ससुराल और ससुराल के दुःख-सुख से पूरी तरह आँखे मूंद ली थी, कभी कोई खबर नहीं, ऐसी कुलक्षणा थी लूटेरे माँ-बाप की बेटी सोना l

अंशुल चोरी-छिपे  फोन कर तो लेता पर इस गुनाह की उसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ती थी l दहेज उत्पीड़न का केस हो जाता, पुलिस अंशुल को उठा ले जाती थी,माँ-बाप, बेटी तो लूट ही रहे थे, फोन और बैंक एटीएम पर कब्जा तो था ही तनख्वाह वाले दिन अंशुल के दफ्तर भी लूटेरे माँ-बाप की लूटेरी बेटी सोना पहुंच जाती थी l सोना अंशुल की बार-बार  पुलिस से शिकायत करतीl अब तो पुलिस  भी लूट  में शामिल हो गयी थी l

अंशुल का बेटा आठ साल का हो गया, उसे दादा-दादी की याद आने लगी, कभी-कभी सोना की चोरी-चोरी अंशुल अपने बेटा सुबोध की बात अपने माँ-बाप से करा देता था,अपनी बहन और छोटे भाई की फोटो भी सुबोध को दिखा दिया था l

सुबोध बुआ, चाचा, और दादा-दादी से मिलने की ज़िद करता पर जेलर नाना-नानी और कातिल माँ चाहते थे कि सुबोध अपने पैतृक रिश्तों से अनजान रहे और नफ़रत करें परन्तु सुबोध का अपने खून के रिश्ते के प्रति मोह बढ़ता जा रहा था इस मोह की कठोर सजा सुबोध की पूतना माता सोना देने में तनिक भी नहीं हिचकिचाती थी l

सुबोध स्कूल के  सेकंड स्टैंडर्ड में पहुंच गया था l 

स्कूल में ग्रैंडफादर डे के आयोजन के दिन दूसरे बच्चों के दादा-दादी को देखकर सुबोध अपने दादा-दादी से मिलने  की ज़िद करता था l अंशुल चोरी-छिपे जब भी अपने माँ -बाप से बात करता  सुबोध  फोन  छिन कर खुद  बात करने लगता l सुबोध दादा -दादी को अपने  घर कर्नाटका बुलाता,सुबोध रो-रोकर कहता दादाजी मेरे घर कब आओगे l

सुबोध के बाल विनय पर जगतबाबू का मन तो होता कि पंख होते तो उड़कर पहुंच जाते परन्तु पूतना जैसी बहू सोना दीवार बनी खड़ी हो जाती थी l एक दिन अचानक अंशुल ने दिन में फोन किया,दोनों बाप बेटे ने बात कियाl

सुबोध रोते हुए बोला दादा तेरह तारीख को आप मेरे घर आ रहे हैं ना l

जगतबाबू बोले- इतना जल्दी कैसे आ सकता हूँ l दादी बीमार है l

सुबोध बोला-दादी को लेकर आ जाओ दादाजी l

सुबोध की बातें सुनकर जगतबाबू की पलकें गीली हो गयी l

ज्येश्वरी बोली- सुबोध दादाजी का टिकट कन्फर्म हो जायेगा तो जरूर जायेंगे, अपने सुबोध से मिलने l

अंशुल बोला-मम्मी सुबोध कई दिनों से  ज़िद कर रहा था, इसलिए मैंने टिकट बुक कर दिया l पापा को जरूर भेज देना l

जगतबाबू मालवा से लम्बी यात्रा के बाद कर्नाटका पहुँच गए l सुबोध दादा से मिलकर बहुत खुश हुआ पर ससुर को देखकर बहू सोना का मुंह टेढ़ा हो गया l

अंशुल अपने बाप के नहाने-खाने और सोने के लिए बिस्तर भी लगाता, सुबोध अपने दादा के आगे पीछे लगा रहता l दादा के पास सोता भी, सुबोध का दादा जगतबाबू से नजदीकी सोना को फूटी आँख नहीं भा रही थी, इस लगाव के लिए सुबोध की सोना ने पिटाई भी कर दिया पर सुबोध दादा से दूर नहीं हुआ l बहू सोना पति को भी प्रताड़ित कर रही थी l अंशुल पत्नी की प्रताड़ना से दुःखी तो बहुत था पर बाप के सामने खुश रहने का भरपूर प्रयास करता पर जगतबाबू की अनुभवी आँखों से कुछ छिप नहीं पाता था l

बेटा अंशुल के घर पौत्र मोह में छः दिन पांच काली रातें की बीती पर बहू की अनदेखी से उनका मन चुपके-चुपके रो तो रहा था पर पौत्र की खुशी के लिए जगतबाबू बर्दास्त कर रहे थे l इस बीच पत्नी की बीमारी का जिक्र कर कई बार जल्दी वापस जाने की इच्छा जता चुके थे l सुबोध दादा के वापस जाने की सुनकर रोने लगता, दादा को अपने साथ रहने की ज़िद करता,उधर उसकी माँ सोना जल्दी भगाना चाहती थी l

बेटा अंशुल के घर जगतबाबू का सातवां था, सुबोध अपने दादा की अंगुली पकड़ कर घुमाने के लिए नजदीक के पार्क में लेकर चला गया l आधा घंटा दादा-पोता घूमकर लौटे तो घर में मातम पसरा हुआ था l अंशुल घायल गिरा पड़ा तड़प-तड़पकर रो रहा था l सोना किसी भारी चीज से अपने पति अंशुल को पीट-पीट कर घायल कर उस की छाती पर बैठी दोनों हाथों से थप्पड़ बरसा रही थी l 

यह दृश्य देखकर जगतबाबू चक्कर खा गए l जगतबाबू को देखते ही लूटेरे माँ-बाप की बेटी दूर खड़ी हो गयी l अपने बाप को देखकर पत्नी के हाथों लूटा-पीटा अंशुल तो था पर उससे कई गुना शर्मिंदा जगतबाबू थे l

जगतबाबू बोले- बहू तुमने मेरे आने के गुनाह की सजा अंशुल को क्यों दी l मैं तुम्हारे यहां रहने तो आया नहीं था l मेरा अपना बनाया है हम दोनों बूढ़े-बुड्ढी के लिए l यह घिनौना गुनाह तू आठ साल कर रही है?

सोना बोली-बाबूजी इन्होंने ने खुद ने अपने को घायल किया है l

माँ की बात सुनकर सुबोध बोला-यह ऐसा करती रहती है l

हाँ बेटा मैं सब जानता हूँ l ये बाप-बेटी, मेरे अंशुल को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझकर धीरे-धीरे हलाल कर रहे हैं l

सोना मौन थी l

जगतबाबू बोले-बहू तुम्हें ब्याह कर आए दस साल हो गए l हर महीने डेढ़ से दो लाख की तनख्वाह कहाँ जा रही हैl बाप के लिए महल बनाकर,बाप की तिजोरी भर रही होl सोना यह लूट-पीट का गुनाह तुम्हारे बाप का साम्राज्य रसातल में मिला देगा l 

सात दिन और छठवीं काल रात्रि का मृत्यु शैय्या पर पड़े व्यक्ति की तरह दुःख के भार दबे ,अच्छे भविष्य के लिए माँ-बाप का त्याग करने वाला अंशुल और  सुबोध  से विदा लेकर जगतबाबू वापस अपने घर मालवा चल पड़े l

ज्येश्वरी और जगतबाबू अपनी बची हुई ज़िन्दगी में सकून ढूढने लगे, बहू सोना के  दिए हुए दुःखो पर मिट्टी डाल कर l

उधर प्राकृतिक न्याय का डंडा चलना शुरू तो पहले से हो गया था l सबसे पहले प्रकृति ने सोना की माँ को दंडित किया वह जादूगरनी जैसी औरत हाथ-पांव से अपंग हुई l मानसिक विक्षिप्त सोना माँ का अपंगता का गुनहगार अंशुल को ठहराती, वह पगली कहती तुम मुझसे झगड़ा करते हो, चिंता में मेरी माँ अपंग हो गयी l वह अपराधी किस्म के बाप की बेहया बेटी भूल गयी कि पति को उत्पीड़ित करने वाली अपराधिनी तो वह खुद है l

अपराधी बाप की बेटी सोना से अपमानित हो कर जगतबाबू घर पहुंचे ही थे कि सोना के अपराधी बाप के किसी दुर्घटना में आकस्मिक मौत की खबर आ गयी l यह रहस्यमयी मौत हत्या थी या आत्महत्या किसी को कुछ पता नहीं चला l

बेटी सोना के गुनाहगार बाप के मौत की खबर सुनकर ज्येश्वरी और जगतबाबू की आँखे बरस पड़ी थी परन्तु सोना के ज्वालामुखी सरीखे मिजाज  सास -ससुर और ससुराल के खिलाफ जहर उगल रहे थे l

सोना अपने बाप की मौत का गुनाहगार अंशुल को ठहरा रही थी जबकि उसका बाप उसकी ज़िन्दगी का असली गुनाहगार था l सोना  को मोहरा बनाकर दमाद अंशुल को लूटकर अमीर बने बाप का अंत हो चुका था परन्तु सोना के दिमागी ज्वालामुखी के विषैले विस्फोट थमने के नाम नहीं ले रहे थे l

जगतबाबू बोले-ज्येश्वरी शोहदे बाप की बेटी सोना हमारी जिंदगी के तबाही की जिम्मेदार तो है पर अपना अंशुल कम जिम्मेदार तो नहीं है l

ज्येश्वरी बोली-बेटा कौन सा भला है l पत्नी पीड़ित अंशुल ससुर का दाहिना हाथ बन रहा है l साले-सालियों की पढ़ाई-लिखाई और उनकी शादी ब्याह का खर्च उठा रहा है, जो बेटा माँ -बाप को भूल चुका है, भूल जाओ ऐसे बेटा बहू को अब l अपनी कमाई की दो रोटी चैन से खाओ और जीओ l ऐसे वारिस क्या जरुरत?

जगतबाबू बोले -हाँ ज्येश्वरी,सात दिन की पीड़ा और छः रात की कराह तो यही कहती हैl

नन्दलाल भारती

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