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रिश्तों की पूँजी

 
रिश्तों की पूँजी
नन्दलाल भारती
गाँव की दोपहर धीरे-धीरे ढल रही थी। नीम के पेड़ की छाँव में बिछी खटिया के पास मिट्टी की सोंधी गंध हवा में तैर रही थी। दूर कहीं बैलों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं। आँगन में तुलसी के चौरे के पास दीया जलाने की तैयारी हो रही थी।
तभी तिलक काका आते दिखाई दिए।
उन्हें देखते ही देवचरण खटिया से उठकर खड़ा हो गया। उसने आगे बढ़कर उनके चरण छुए और हाथ जोड़कर बोला;
“काका, प्रणाम!”
तिलक काका ने उसके सिर पर हाथ रखे ।
“खुश रहो बेटा… खूब तरक्की करो।”
देवचरण ने खटिया की ओर इशारा किया।
“काका, बैठिए।”
काका खटिया पर बैठने लगे तो देवचरण ने उनके लिए तकिया ठीक कर दिया और स्वयं सामने मोढ़े पर बैठ गया।
काका ने उसे गौर से देखा।
“बेटा, तुम भी खटिया पर बैठो।”
देवचरण मुस्कराया।
“नहीं काका। आप गाँव के बुजुर्ग हैं। मेरे लिए तो आप पिता के समान हैं। मेरे माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। मैं अपने बुजुर्गों में उन्हीं की छाया देखता हूँ। आपके चरणों के पास बैठने में जो सुख है, वह ऊपर बैठकर कहाँ मिलेगा?”
काका की आँखों में हल्की नमी उतर आई।
“शहर में रहकर भी गाँव के संस्कार नहीं भूले, देवचरण। यही तो असली पूँजी है।”
देवचरण ने घर के भीतर आवाज लगाई;
“सुधा! काका आए हैं। इनके लिए चाय-नाश्ता का इंतजाम करो l ”
अंदर से पत्नी सुधा की आवाज आई—
इंतजाम कैसा “पोहा तैयार है। चाय अभी बनाकर लाती हूँ।”
कुछ ही देर में सुधा चाय और पोहा लेकर आ गई।
तिलक काका ने प्लेट हाथ में लेते हुए कहे ;
“बहू, भगवान तुम्हें और तुम्हारे परिवार को सुखी रखे । बेटा, तुमने सच कहा था—रिश्ते ही आदमी की असली पूँजी हैं।”
देवचरण कुछ क्षण चुप रहा। फिर धीमे स्वर में बोला;
“काका, जब तक रिश्तों की पूँजी बची है, तब तक इंसानियत भी बची है। लेकिन स्वार्थ और विकास की अंधी दौड़ इस पूँजी पर ग्रहण लगा रही है।”
काका ने चाय का कप नीचे रखा।
“क्या कह रहे हो बेटा? मैं ठीक से समझा नहीं।”
देवचरण ने गहरी साँस ली।
“काका, एक समय था जब घर के बुजुर्ग परिवार की सबसे बड़ी दौलत हुआ करते थे। दादा-दादी की कहानियाँ, माता-पिता की सीख, बच्चों की किलकारियाँ, भाई-बहनों का साथ—इन्हीं से तो घर बनता था। किसी के घर दुःख आता था तो पूरा परिवार उसके सामने खड़ा हो जाता था। किसी के घर सुख आता था तो खुशी भी सबकी होती थी।”
काका ने सिर हिलाया।
“हाँ बेटा। यही तो गाँव की विरासत थी। जिस दिन गाँव की मिट्टी का सोंधापन खत्म हो जाएगा, उस दिन समझ लेना कि संस्कार भी सूखने लगेगें l ”
देवचरण ने कहा—
“काका, शहरों में भी गाँव के लोग बसते हैं। बड़े-बड़े मकान हैं, गाड़ियाँ हैं, सुख-सुविधाएँ हैं। लेकिन कुछ घटनाएँ भीतर तक तोड़ देती हैं।”
काका ने चिंतित होकर पूछा—
“ऐसी कौन-सी घटना हो गई, बेटा?”
देवचरण कुछ देर मौन रहा।
“आज आदमी के पास सुविधाओं की बाढ़ है, लेकिन रिश्तों की पूँजी घटती जा रही है। महंगे मोबाइल हैं, इंटरनेट है, दुनिया से बात करने की सुविधा है, मगर अपने माँ-बाप के लिए समय नहीं है। कई माता-पिता तो अपने ही बच्चों के साथ रहते हुए उनसे दो शब्द बोलने को तरस जाते हैं।”
काका का चेहरा गंभीर हो गया।
“इतना बदल गया है हमारा समाज?”
“हाँ काका। कुछ खबरें तो दिल दहला देती हैं।”
“क्या खबर?”
देवचरण ने कहा—
“मैंने एक खबर में पढ़ा कि बड़े शहर के एक बुजुर्ग कारोबारी जो अपनी तीन बेटियों को बड़े लाड़-प्यार से पाला था। पढ़ाया-लिखाया, अपने पैरों पर खड़ा किया और धूमधाम से उनकी शादियाँ कीं। पत्नी पहले ही गुजर चुकी थी। तीनों बेटियाँ अलग-अलग जगहों पर अपने परिवारों में व्यस्त थीं। उम्र के अंतिम पड़ाव पर वही पिता वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हो गए।”
काका की उँगलियाँ काँप गईं।
“तीनों बेटियाँ थीं… फिर भी?”
“हाँ काका। एक विदेश में, दूसरी उत्तर प्रदेश में और तीसरी उसी शहर में रहती थी, जिस शहर में पिता वृद्धाश्रम में अपने जीवन का अंतिम दिन काट रहे थे।”
काका ने सिर झुका लिया।
देवचरण की आवाज भर्रा गई—
“सबसे दुखद बात यह थी कि जब उनका निधन हुआ, तब भी बेटियाँ उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुईं। वृद्धाश्रम के लोगों ने संपर्क किया, आग्रह किया, लेकिन कोई नहीं आया। एक बेटी ने ऑनलाइन कुछ पैसे भेज दिए और शायद उसे लगा कि उसने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी।”
काका ने काँपते स्वर में पूछा—
“और पिता?”
“वह चले गए काका… अकेले।”
कुछ क्षण तक दोनों के बीच खामोशी पसरी रही।
फिर देवचरण बोला—
“काका, उस खबर में एक बात पढ़कर तो कलेजा काँप गया। पिता की चिता जल रही थी और एक बेटी ने वीडियो कॉल पर पूछा—‘इसमें कितना समय लगेगा?’”
तिलक काका ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया।
उनकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
“काश… उसका दिल उस समय रोया होता।”
देवचरण ने धीमे से कहा—
“काका, सवाल बेटी या बेटे का नहीं है। सवाल उस रिश्ते का है, जिसने हमें जन्म दिया। बेटा हो या बेटी—माँ-बाप के प्रति संवेदना ही असली कसौटी होती है।”
काका ने आँसू पोंछे।
“सही कहते हो बेटा। अपने ही मोहल्ले के जंगबहादुर को देख लो। जिसे बच्चे प्यार से ‘जजबाबा’ कहते थे। उसका असली नाम तक अब बहुत कम लोगों को याद है। दो बेटे थे उनके। क्या काम आए?”
देवचरण चुपचाप सुनता रहा।
काका आगे बोले—
“जजबाबा ने अपनी जिंदगी भर की कमाई पेट की बीमारी के इलाज में लगा दी। ऑपरेशन तो हो गया, लेकिन शरीर में खून की कमी थी। खून की जरूरत पड़ी। न उसके पास पैसे बचे थे, न बेटों ने सुध ली। बीमारी बढ़ती गई। ऑपरेशन के घाव में संक्रमण हो गया। बेचारे तड़प-तड़पकर मर गए l
काका की आवाज टूटने लगी।
“और जजबाबा की बूढ़ी पत्नी… जिसे मोहल्ले वाले सुल्तान दादी कहते थे… वह भी क्या कम दुख झेलकर गई? भूख, बीमारी और बहू के दुर्व्यवहार के बीच उसकी जिंदगी बीती। अंत में उसके अपने बेटे तक उसके अंतिम संस्कार तक नहीं किये, उसके मायके भाई-भतीजों और मोहल्ले वालों ने अंतिम संस्कार किया।”
देवचरण ने पूछा—
“और बेटों ने?”
काका ने कड़वी हँसी हँसी।
“उन्होंने जमीन-जायदाद बाँट ली। आज वही जमीन बेचकर अपने बच्चों की शादियाँ कर रहे हैं। और विडंबना देखो—उसी संपत्ति को लेकर कभी जेल, कभी मुकदमा, कभी जमानत।”
देवचरण ने गहरी साँस ली।
“काका, यह केवल संस्कारहीनता नहीं है। यह उस सोच की त्रासदी है जिसमें संपत्ति रिश्तों से बड़ी हो जाती है।”
“हाँ बेटा,” काका बोले, “अगर यही चलता रहा तो रिश्तों की पूँजी बचेगी कैसे?”
कुछ देर दोनों चुप रहे।
हवा में शाम की ठंडक घुलने लगी थी।
तिलक काका ने धीरे से कहा—
“देवचरण, कहते हैं पति-पत्नी का रिश्ता सात जन्मों का होता है। लेकिन आज अखबारों में ऐसी खबरें भी आती हैं कि रिश्तों में अविश्वास, लालच और अवैध संबंधों के कारण पति-पत्नी एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। कहीं जहर, कहीं हत्या, कहीं धोखा… आखिर हम कहाँ जा रहे हैं?”
देवचरण ने उत्तर दिया—
“काका, तकनीक दोषी नहीं है। मोबाइल अपने आप किसी को संवेदनहीन नहीं बनाता। असली समस्या हमारी सोच और संस्कारों की है। मोबाइल रिश्तों को जोड़ भी सकता है और तोड़ भी सकता है। बात यह है कि हम उसका इस्तेमाल किस तरह करते हैं।”
काका ने उसकी ओर देखा।
“तो फिर समाधान क्या है?”
देवचरण कुछ क्षण सोचकर बोला—
“रिश्तों को समय देना होगा।”
“बस इतना?”
“सिर्फ इतना नहीं, काका। रिश्तों को समय, सम्मान और संवेदना—तीनों चाहिए। हम बच्चों को सफलता की दौड़ में आगे बढ़ना सिखाते हैं, लेकिन यह नहीं सिखाते कि सफलता के रास्ते में किसी अपने का हाथ छूट जाए तो उसे पकड़ना भी जरूरी है।”
काका ने सिर हिलाया।
“भारतीय संस्कृति में माता-पिता को धरती का भगवान कहा गया है। वे जीवन की पहली पाठशाला होते हैं। बोलना, चलना, गिरकर उठना—सब उन्होंने सिखाया। दुनिया से लड़ने का साहस भी उन्होंने ही दिया।”
देवचरण बोला—
“और जब वही माता-पिता बूढ़े होते हैं तो उन्हें हमारी जरूरत होती है।”
“यही तो दर्द है बेटा,” काका ने कहा, “जिन हाथों ने हमें चलना सिखाया, वही हाथ बुढ़ापे में काँपने लगते हैं। कभी हमें जिनकी उँगली पकड़कर चलना पड़ा था, एक दिन उन्हें हमारी उँगली की जरूरत पड़ती है। लेकिन हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उनके पास बैठने का समय भी नहीं निकालते।” आज की पीढ़ी को याद रखना चाहिए कि बुजुर्ग बोझ नहीं होते हैं, वे समाज में कौशल, ज्ञान और अनुभव की अपार सम्पदा होते है
काका ने गमछे से आँखें पोंछीं।
“कभी संयुक्त परिवार समाज की ताकत हुआ करता था। दादा-दादी बच्चों को संस्कार देते थे। माता-पिता जिम्मेदारियाँ निभाते थे। घर में सुख आता तो सबका होता था और दुःख आता तो सब मिलकर उसके सामने खड़े होते थे।”
देवचरण ने कहा—
“समय बदल गया है काका। शहरों की ओर पलायन, नौकरी की मजबूरियाँ, करियर, बदलती जीवनशैली, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आर्थिक परिस्थितियों ने संयुक्त परिवार को बहुत बदल दिया है।”
“बदलना बुरा नहीं है बेटा,” काका ने तुरंत कहा, “लेकिन बदलते समय में रिश्तों को पीछे छोड़ देना जरूर बुरा है।”
देवचरण मुस्कराया।
“यही तो मैं कह रहा हूँ काका। आज की पीढ़ी के पास महंगे मोबाइल हैं, लेकिन माँ-बाप से बात करने का समय नहीं। आलीशान घर हैं, लेकिन उन घरों में माता-पिता के लिए जगह नहीं। कई बुजुर्ग वृद्धाश्रम की ओर चले जाते हैं।”
काका ने दूर आसमान की ओर देखा।
“लगता है हमारी ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की संस्कृति अपने ही घरों में परीक्षा दे रही है।”
“काका,” देवचरण बोला, “पर मुझे विश्वास है कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।”
“कैसे?”
“क्योंकि रिश्तों की लौ अभी बुझी नहीं है। उसे हवा देने की जरूरत है।”
काका मुस्कराए।
“शाबाश बेटा।”
देवचरण ने आगे कहा—
“आज की युवा पीढ़ी को अपने बच्चों को सफल होने के साथ-साथ संवेदनशील होना भी सिखाना होगा, क्योंकि बच्चे हमारी बातें कम और हमारा व्यवहार ज्यादा सीखते हैं।”
काका ने उत्साह से कहा—
“बिल्कुल! यदि बच्चे देखेंगे कि उनके माता-पिता अपने माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान करते हैं, उनके लिए समय निकालते हैं, बीमारी में उनका हाथ थामते हैं, उनकी बातें सुनते हैं, तो बच्चे भी वही सीखेंगे।”
“और अगर बच्चे
यह देखेंगे कि उनके माता-पिता अपने ही माता-पिता की उपेक्षा करते हैं, उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें चुप कराते हैं,बुरा बर्ताव करते हैं,उनकी जरूरतों को बोझ समझते हैं और उनके अकेलेपन से आँखें फेर लेते हैं, तो वे भी वही सीखेंगे।”
तिलक काका ने देवचरण की ओर देखा।
“बेटा, यही जीवन का सबसे बड़ा सच है। संस्कार किताबों से कम और घर के व्यवहार से ज्यादा मिलते हैं।”
देवचरण ने सिर हिलाया।
“हाँ काका। बच्चे को हम रोज कहते हैं—‘बड़ों का सम्मान करो।’ लेकिन अगर वही बच्चा घर में देखता है कि उसके पिता अपने बूढ़े माता-पिता से ऊँची आवाज में बात करते हैं, उनकी जरूरतों को टालते हैं और उन्हें अकेला छोड़ देते हैं, तो वह सम्मान का अर्थ कैसे समझेगा?”
काका कुछ देर तक मौन रहे, फिर बोले—
“इसलिए रिश्तों की पूँजी केवल बुजुर्गों की चिंता नहीं है, यह आने वाली पीढ़ियों की विरासत भी है।”
“बिल्कुल काका।”
“लेकिन देवचरण,” काका ने पूछा, “क्या हर बुजुर्ग निर्दोष है? क्या हर परिवार में केवल बच्चों की ही गलती होती है?”
देवचरण ने काका की ओर सम्मान से देखा।
“नहीं काका। रिश्ते एकतरफा नहीं होते। माता-पिता का भी दायित्व है कि वे बच्चों को प्रेम, विश्वास और स्वतंत्रता दें। नई पीढ़ी की परिस्थितियों को समझें। हर निर्णय पर अपना अधिकार न थोपें। लेकिन…”
“लेकिन क्या?”
“लेकिन मतभेद कभी रिश्ते तोड़ने का कारण नहीं बनने चाहिए। घर में विचार अलग हो सकते हैं, जीवनशैली अलग हो सकती है, लेकिन दिल अलग नहीं होने चाहिए।”
काका के चेहरे पर संतोष की रेखा उभरी।
“यही बात तो मैं सुनना चाहता था।”
सुधा अब तक चुपचाप दोनों की बातें सुन रही थी। उसने आगे बढ़कर खाली कप उठाए और बोली—
“काका, एक बात मैं भी कहूँ?”
“कहो बहू।”
“रिश्तों में सबसे ज्यादा नुकसान शायद ‘समय’ की कमी से नहीं, ‘मन’ की कमी से होता है। आदमी चाहे कितना व्यस्त हो, अगर मन में अपनापन हो तो दो मिनट भी बहुत होते हैं।”
काका ने प्रसन्न होकर कहा—
“बहू, तुमने देवचरण से भी अच्छी बात कह दी।”
सुधा मुस्कराई।
“हमारे घर में मेरी सास-ससुर थीं। विवाह के बाद मुझे भी कभी माँ-बाप की कमी नहींl मेरे माँ -बाप ने रिश्ते की कीमत मुझे अच्छी तरह समझा दिया था l माता - पिता, सास -ससुर दुनिया में नहीं रहे काका जाने के बाद पछतावा केवल आँखों को भिगोता है, जिंदगी को वापस नहीं ला सकता।”
देवचरण ने पत्नी की ओर देखा। उसके चेहरे पर एक गहरी संवेदना थी।
“सुधा, यही तो बात है। जिंदगी में सब कुछ मिल सकता है, लेकिन बीता हुआ समय और खोए हुए रिश्ते वापस नहीं मिलते।”
तिलक काका ने कहा—
“यही कारण है कि पीड़ित बुजुर्गों के दर्द की चिता भले एक दिन बुझ जाए, लेकिन उसकी लौ समाज के सामने बहुत सारे सवाल छोड़ जाती है।”
उन्होंने देवचरण की ओर देखा।
“क्या आज की युवा पीढ़ी इतनी व्यस्त हो गई है कि माता-पिता के लिए उसके पास समय नहीं?”
देवचरण ने उत्तर दिया—
“व्यस्तता सच है काका, लेकिन संवेदनहीनता को व्यस्तता का नाम देना ठीक नहीं। नौकरी करनी है, व्यापार करना है, बच्चों को पढ़ाना है—सब जरूरी है। लेकिन सप्ताह में एक दिन माता-पिता के पास बैठना भी तो संभव है। फोन पर दस मिनट बात करना भी तो संभव है। उनकी दवा पूछना, डॉक्टर के पास ले जाना, उनकी पुरानी बात सुन लेना—क्या यह बहुत बड़ा काम है?”
काका बोले—
“नहीं बेटा। असली समस्या यह है कि हमने रिश्तों को जरूरत के हिसाब से तौलना शुरू कर दिया है।”
“हाँ काका। जब तक माता-पिता कमाते हैं, घर चलाते हैं, संपत्ति बनाते हैं, तब तक उनकी कीमत समझी जाती है। जब वे कमाने की उम्र से बाहर हो जाते हैं, तो कुछ लोगों को वही माता-पिता बोझ लगने लगते हैं।”
काका की आँखें फिर भर आईं।
“जिसने अपनी जवानी तुम्हारे लिए खर्च कर दी, उसकी बुढ़ापे की साँसें तुम्हें महँगी लगने लगें—इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा?”
देवचरण ने धीमे स्वर में कहा—
“काका, समाज की असली ताकत ऊँची इमारतें, बड़ी गाड़ियाँ या बैंक-बैलेंस नहीं हैं। असली ताकत संस्कार और संवेदनाएँ हैं।”
“शाबाश बेटा!” काका ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “ये सद्भावनाएँ तुममें बची हैं, इसलिए मुझे भरोसा है कि रिश्तों की पूँजी पूरी तरह खत्म नहीं होगी।”
सुधा बोली—
“काका, रिश्ते विरासत में मिलते जरूर हैं, लेकिन उन्हें जीवित रखना पड़ता है।”
“बिल्कुल बहू,” काका बोले, “रिश्ते खेत की तरह होते हैं। केवल विरासत में जमीन मिल जाने से फसल नहीं उगती। उसे पानी देना पड़ता है, खाद देनी पड़ती है, उसकी देखभाल करनी पड़ती है। रिश्तों में भी समय, सम्मान और प्रेम का पानी देना पड़ता है।”
देवचरण ने कहा—
“और अगर हम उन्हें सूखने के लिए छोड़ दें तो एक दिन वही घर, जिसमें कभी हँसी गूँजती थी, भीतर से मरुभूमि बन जाता है।”
तिलक काका ने उसकी बात पकड़ ली।
“हाँ बेटा! एक दिन धरती रिश्तों की मरुभूमि बन जाएगी। मकान होंगे, लेकिन घर नहीं होंगे। लोग होंगे, लेकिन अपनापन नहीं होगा। बातचीत होगी, लेकिन संवेदना नहीं होगी।”
कुछ क्षण तक तीनों चुप रहे।
बाहर अँधेरा गहराने लगा था।
सुधा ने आँगन में दीपक जला दिया।
उस छोटे-से दीपक की लौ हवा में काँप रही थी, फिर भी बुझ नहीं रही थी।
काका उस लौ को देखते रहे।
“देखो देवचरण, यही रिश्तों की लौ है।”
देवचरण ने दीपक की ओर देखा।
“हवा तेज होगी तो लौ काँपेगी, लेकिन अगर कोई उसे हाथों से बचा ले तो वह जलती रहेगी।”
“और परिवार वही हाथ है,” काका बोले, “जो रिश्तों की लौ को आँधियों से बचाता है।”
देवचरण ने काका के चरणों की ओर देखा।
“काका, आपने आज मुझे बहुत बड़ी बात समझाई है।”
“मैंने क्या समझाया बेटा? तुमने ही मुझे अपनी बातों से सोचने पर मजबूर किया।”
देवचरण मुस्कराया।
“तो फिर आज से एक संकल्प लेते हैं।”
“कैसा संकल्प?”
“हम अपने गाँव में एक छोटी-सी पहल शुरू करेंगे—‘रिश्तों की पूँजी’।”
काका की आँखों में चमक आ गई।
“क्या करेंगे उसमें?”
“हर महीने गाँव के बुजुर्गों से मिलेंगे। जिनके बच्चे बाहर रहते हैं, उनसे फोन पर बात करवाएँगे। जरूरतमंद बुजुर्गों की दवा और इलाज में मदद करेंगे। बच्चों को बुलाकर उनके दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियाँ सुनने का अवसर देंगे। और सबसे जरूरी—युवाओं के साथ बैठकर इस विषय पर बात करेंगे कि तरक्की के साथ संवेदना कैसे बचाई जाए।”
काका ने भावुक होकर देवचरण का हाथ पकड़ लिया।
“बेटा, यही तो असली विकास है।”
सुधा ने भी कहा—
“अगर एक परिवार भी बदल गया तो यह प्रयास सफल होगा।”
काका उठने लगे।
देवचरण ने तुरंत उनका हाथ थाम लिया।
“काका, अभी कहाँ? रात हो रही है। खाना खाकर जाइए।”
काका मुस्कराए।
“आज नहीं बेटा। अब घर जाना है।”
“काका, मैं छोड़ आता हूँ।”
“नहीं। तुम यहीं रहो।”
काका कुछ कदम चले, फिर अचानक रुक गए।
पीछे मुड़कर देवचरण को देखा।
“बेटा…”
“जी काका?”
“आज तुम्हारे पिता होते तो बहुत गर्व करते।”
देवचरण कुछ बोल नहीं पाया।
उसकी आँखें भर आईं।
काका ने आगे बढ़कर उसके सिर पर हाथ रखा।
“तुमने उन्हें खोया जरूर है, लेकिन उनके संस्कारों को जीवित रखा है। यही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।”
देवचरण ने काका के चरण छू लिए।
“काका, आज मुझे लगा जैसे पिता का हाथ सिर पर है।”
काका ने काँपते हाथों से उसे उठाया।
“और मुझे लगा जैसे मेरा बेटा मेरे सामने खड़ा है।”
दोनों की आँखें नम थीं।
सुधा भी चुपचाप आँसू पोंछ रही थी।
काका धीरे-धीरे अपने घर की ओर चल पड़े l
देवचरण देर तक उन्हें देखता रहा।
अँधेरे में काका की आकृति धीरे-धीरे धुँधली होती गई।
लेकिन उनके शब्द उसके भीतर गूँजते रहे—
“बेटा, तरक्की का आसमान छूना, लेकिन उस घर को मत हारना जहाँ तुम्हारी पहली किलकारी गूँजी थी।”
उस रात देवचरण देर तक सो नहीं पाया।
उसने अपना मोबाइल उठाया।
स्क्रीन पर कई संदेश थे, कई अनजान नंबरों की सूचनाएँ थीं, कई सोशल मीडिया अपडेट थे।
लेकिन उसने उन सबको किनारे कर दिया।
फोन की संपर्क सूची खोली।
कुछ क्षण तक एक नाम को देखता रहा।
फिर उसने फोन मिलाया।
दूसरी ओर से एक वृद्ध आवाज आई—
“हेलो… कौन?”
देवचरण की आँखें भर आईं।
“फूफाजी … मैं देवचरण बोल रहा हूँ।”
“देवचरण? बेटा, इतनी रात को?”
“बस फूफाजी … आपकी आवाज सुनने का मन हुआ था।”
कुछ क्षण मौन रहा।
फिर दूसरी ओर से काँपती हुई आवाज आई,
“खुश रहो बेटा।”
देवचरण की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने फोन कान से लगाए रखा।
उस रात उसे पहली बार समझ आया कि रिश्तों को बचाने के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाओं की जरूरत नहीं होती।
कभी-कभी सिर्फ एक फोन काफी होता है।
एक मुलाकात काफी होती है।
एक हाथ थाम लेना काफी होता है।
एक बार पूछ लेना,
“आप कैसे हैं?”
और कभी-कभी किसी बुजुर्ग के लिए इतना भर जान लेना ही पूरी दुनिया होती है कि:
“मैं अकेला नहीं हूँ।”
अगली सुबह देवचरण ने गाँव के कुछ युवाओं को बुलाया।
नीम के नीचे पहली बैठक हुई।
तिलक काका भी आए।
देवचरण ने युवाओं से कहा—
“हम सब आगे बढ़ना चाहते हैं। पढ़ना चाहते हैं, कमाना चाहते हैं, शहरों में जाना चाहते हैं, दुनिया देखना चाहते हैं। यह सब जरूरी है। लेकिन याद रखिए—जिस घर से निकलकर हम दुनिया जीतने जाते हैं, उस घर के लोगों को हारकर मत लौटाइए।”
एक युवक ने पूछा—
“भैया, क्या रिश्ते सचमुच इतनी बड़ी पूँजी हैं?”
देवचरण मुस्कराया।
“पैसा खत्म हो जाए तो फिर कमाया जा सकता है। जमीन बिक जाए तो दूसरी जमीन खरीदी जा सकती है। मकान टूट जाए तो नया मकान बनाया जा सकता है। लेकिन माँ की गोद, पिता का स्नेह, दादा की कहानी, दादी का हाथ, भाई का भरोसा और किसी अपने की अंतिम मुस्कान—ये एक बार खो जाएँ तो फिर दुनिया की सारी दौलत मिलकर भी उन्हें वापस नहीं ला सकती।”
नीम के नीचे बैठे तिलक काका की आँखें चमक उठीं।
उन्होंने कहा—
“बेटा देवचरण, आज तुमने रिश्तों की पूँजी का अर्थ समझा दिया।”
देवचरण ने युवाओं की ओर देखते हुए कहा—
“आधुनिक बनिए। खूब आगे बढ़िए। जमीन से आसमान तक पहुँचिए। अपने सपने पूरे कीजिए। लेकिन अपनी जड़ों को मत काटिए।”
फिर उसने थोड़ी देर रुककर कहा—
“माता-पिता धरती के भगवान हैं। उन्हें बेसहारा मत छोड़िए। उनके साथ बैठिए। उनसे बातें कीजिए। उनकी पुरानी कहानियाँ सुनकर मुस्कराइए। उनके सुख-दुःख पूछिए। जब वे चल न पाएँ तो उनका हाथ थामिए। जब वे भूलने लगें तो उन्हें झुँझलाकर नहीं, प्रेम से समझाइए।”
तिलक काका ने आगे बढ़कर देवचरण का हाथ पकड़ लिया।
“और याद रखो,” उन्होंने कहा, “जिस तरह तुम अपने माँ-बाप के साथ व्यवहार करोगे, तुम्हारी अगली पीढ़ी वही सीखेगी।”
देवचरण ने सिर झुका दिया।
पेड़ की पत्तियाँ हवा के साथ सरसराईं।
जैसे पूरा गाँव उस संकल्प की गवाही दे रहा हो।
उस दिन से गाँव में एक नई परंपरा शुरू हुई।
हर रविवार कुछ युवक बुजुर्गों के घर जाते। कोई दवा लेकर जाता, कोई अखबार पढ़कर सुनाता, कोई उनके पुराने किस्से सुनता, कोई केवल उनके पास बैठता।
और सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ कि कई बच्चों ने अपने दादा-दादी से पूछना शुरू किया—
“दादाजी, आपके बचपन में गाँव कैसा था?”
“दादी, पापा छोटे थे, तब हमारी तरह थे?
“दादाजी जब आप जैसे थे तब क्या करते थे?”
बुजुर्गों की आँखों में चमक लौटने लगी।
उनके सूने आँगन में फिर आवाजें गूँजने लगीं।
रिश्तों की वह लौ, जिसे समय की आँधियाँ बुझाने लगी थीं, फिर से जल उठी।
तिलक काका अक्सर बरगद के नीचे बैठकर कहते—
“देखो देवचरण, मकान बड़े होने से घर बड़ा नहीं होता। घर तब बड़ा होता है जब उसमें रहने वाले दिल बड़े हों।”
देवचरण मुस्कराकर कहता—
“और काका, बैंक में जमा पैसा जरूरत के समय काम आता है, लेकिन रिश्तों की पूँजी जिंदगी के हर मोड़ पर सहारा देती है।”
काका हँसते हुए कहते;
“बस बेटा, इसे कभी खर्च मत होने देना।”
देवचरण कहता—
“नहीं काका। इसे खर्च नहीं, बढ़ाना है।”
और सच यही था।
रिश्ते विरासत में मिलते हैं, लेकिन उनका मूल्य अगली पीढ़ी को समझाना पड़ता है।
तरक्की जरूरी है।
धन जरूरी है।
सुविधाएँ जरूरी हैं।
लेकिन इन सबसे ऊपर जरूरी है वह मनुष्यत्व, जो हमें मनुष्य बनाए रखता है।
क्योंकि एक दिन ऊँची इमारतें पीछे छूट जाएँगी, महँगी गाड़ियाँ किसी और के आँगन में खड़ी होंगी, बैंक-बैलेंस किसी और के नाम होगा।
लेकिन उस अंतिम क्षण में मनुष्य के पास यदि कुछ सचमुच बचा रहेगा तो वह होगा—
किसी माँ का आशीर्वाद,
किसी पिता का हाथ,
किसी भाई का भरोसा,
किसी बहन की पुकार,
किसी साथी का साथ,
और किसी अपने की आँखों में अपने लिए बचा हुआ प्रेम l
यही रिश्तों की असली पूँजी है।
आज की पीढ़ी को इस पूँजी को बचाना है ;
तभी समाज में इंसानियत जीवित रहेगी ।
दौलत के ढेर लगाकर भी,
मनुष्य कहीं गरीब न हो जाए,
आलीशान मकानों के बीच
कहीं अपना ही घर अनाथ न हो जाए।
माँ-बाप की आँखों से निकला आँसू,
उम्र भर पीछा नहीं छोड़ेगा;
रिश्ते बचा लो—
वरना एक दिन
आदमी भीड़ में भी
अकेला रह जाएगा।
समाप्त
— नन्दलाल भारती
nlbharatiauthor@gmail.com
24/09/2026









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