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रक्त-विच्छेद

 

रक्त-विच्छेद/नन्दलाल भारती

गाँव के बूढ़े बरगद की छाँव में कुएं से खटकट कर पानी निकालने वाली रहट बरसों पहले बंद हो गयी थी l बरगद का वह बूढ़ा पेड़ ब्रिटिश शासन का उदय और पतन, और जमींदारों का जुल्म,आजादी का सूर्योदय भी देखा था, वही ठूँठ बरगद उदास खड़ा अभी भी बहुत कुछ देख रहा था।

गाँव के हरिहर को नेकर से लेकर इंस्पेक्टर की वर्दी में गाँव से शहर जाते हुए देखा था, सम्मान और प्रतिष्ठा की ऊँचाइयाँ छूते देखा था,और फिर हरिहर को जीवन की सांझ में अपनी ही दुनिया में अकेला तड़पते और मरते भी देखा था।

उस दिन बरगद की पत्तियाँ हवा के साथ फड़फड़ा रही थीं जैसे पंक्षी की गर्दन ऐंठने पर फड़फड़ाती है ।

वंदिनी बाप के बनाये घर के आँगन में बैठी आँखों में आंसुओं का समंदर लिए टुकुर -टुकुर निहार रही थी l वही आँगन जहाँ कभी उसकी माँ सावित्री देवी की हँसी गूँजती थी,जहाँ पिता साल छः महीना में शहर से आते तो सबसे पहले वंदिनी को आवाज़ देते फिर बेटों को, यह वही घर-आँगन,जहाँ रिश्ते कभी पेड़ों की जड़ों की तरह गहरे,अटूट लगते थे और रातरानी की तरह दिन-रात महकते थे l

वंदिनी के जीवन में अब माता-पिता की यादों तो पूरी तरह बसी हुई थी पर वे बची हुई दीवारें और खून के रिश्ते अजनबी लग रहें थे ।

वंदिनी तीन भाइयों की इकलौती बहन थी। पिता हरिहर एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी थे। गरीबी के दंश से गुजरे हरिहर जीवन भर परिवार के लिए संघर्ष किये।

बेटों के उज्ज्वल भविष्य के लिए हरिहर साहब ने अपनी इच्छाओं को ताख पर रख दिया था लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था जिसकी उन्होंने कोई भी बाप कभी कल्पना ही नहीं कर सकता l

बचपन से होशियार वंदिनी में पढ़ने की तीव्र ललक थी। उसकी आँखों में किताबों के के भरोसे आसमान छूने के सपने थे,परन्तु वह उस भेदभाव वाले धर्म और समाज में जन्मी थी जहाँ बेटियों के सपनों की कीमत अक्सर बेटों की जरूरतों से बहुत कम आँकी जाती थी, इसलिए वंदिनी के हिस्से में पढ़ाई नहीं,रसोई, चूल्हा -चौका और घर की जिम्मेदारियाँ आईं।

वंदिनी माँ सावित्री को कैंसर ने निगल लिया था l माँ की चिता की राख को ठंडी होते-होते घर की आत्मा जैसे लकवाग्रस्त हो गयी । हरिहर साहब के जीवन में मरुभूमि जैसा विरान पसर गया जिसको न तो समय ने और नहीं रिश्ते ही भर सके l

हरिहर साहब के बेटे अपने -अपने परिवारों और स्वार्थों में पूरी व्यस्त हो गए, किसी को बाप की याद नहीं आयी, हरिहर साहब धीरे-धीरे अपने ही घर में पराये जैसे होकर रह गए, ना कोई रोटी देना वाला ना पानी बिटिया वंदिनी अपने परिवार के साथ हजारों कोस दूर ।

हरिहर साहब अपनों के परायेपन से हार कर एक अनाथ विधवा कुटिला से शादी कर लिये l मनहूस कुटिला का आना इस परिवार के इतिहास में एक ऐसे अध्याय की शुरुआत था, जिसकी प्रत्येक पंक्ति में लालच, छल और विघटन लिखा हुआ था।


हरिहर साहब ने जीवन भर अपराधियों की मानसिकता को समझा था, लेकिन अपने घर में प्रवेश कर चुके स्वार्थ के अपराध को पहचानने में देर कर दिए l महीना भर बाद घर का वातावरण पूरी बदल गया। सम्मान की जगह अपमान ने ले ली, विश्वास की जगह षड्यंत्र ने।

मानसिक प्रताड़ना और निरंतर तनाव ने हरिहर जैसे मजबूत व्यक्ति को भीतर से तोड़ दिया जो कभी कानून और व्यवस्था का प्रतीक माना जाता था l हरिहर साहब कुटिला से प्रताड़ित होकर दुनिया छोड़ दिए बिना कोई वसीयत छोड़े l वे क्या हर माँ-बाप बेटी का हाथ पीला करना भर ही जिम्मेदारी समझते थेl

माँ-बाप को यह भी फिक्र नहीं होती थी कि उनके बाद बेटी को मायके में छाँव मिल पायेगी की नहीं l

हरिहर साहब की तेरहवीं के बाद संपत्ति का बँटवारा शुरू हुआ। तिजोरी खुलीं जो एकदम खाली, सारा रूपया और आभूषण कुटिला ने गायब कर दिया था l

बैंक खातों के दस्तावेज़ निकले, जमीनों के कागजात सामने आए पर रिश्ते अदालत की चौखट तक पहुंच गए। कुटिला ने तीनो बेटों के साथ मिलकर अदालत के समक्ष जो दस्तावेज़ प्रस्तुत किये उस दस्तावेज में वंदिनी का नाम नदारत था।

जिस बेटी ने पिता की उँगली पकड़कर चलना सीखा था, उसी बेटी को कानूनी दस्तावेजों में लावारिस बना दिया गया। सौतेली माँ की साजिश और भाईयों के स्वार्थ से वंदिनी को महसूस हुआ कि रक्त का संबंध केवल जन्म से नहीं बचता; उसे जीवित रखने के लिए संवेदनाएँ भी चाहिए होती हैं, जब संवेदनाएँ मर जाती हैं, तब रक्त भी विच्छेदित हो जाता है।

हरिहर साहब के बीमारी और मौत की खबर वंदिनी के देवर जगेन्द्र ने दिया थाl वही अस्पताल लेकर जा रहा था, तभी रास्ते में ही मौत हो गयी थी l पिता के मौत की खबर सुनकर वंदिनी पागल हो गयी थी l यशेंद्र, पत्नी वंदिनी और छोटे-छोटे बच्चों को लेकर शहर से गांव निकल पड़ा था l

शहर का सफर दो दिन का था l यशेंद्र दूसरे दिन शाम को पहुंचे उसके पहले चिता में आग लग चुकी थी l यशेंद्र-वंदिनी और बच्चे जो हरिहर साहब के अजीज थे उन्हें बुझ चुकी चिता के दर्शन भर ही हुए l बेटों के मोह में बावरे हरिहर साहब बेटी-दमाद के बुरे दिनों में भी कभी खुले हाथ से कोई मदद नहीं किये थे l

हरिहरसाहब से ब्याह रचाने के पहले कुटिला के तीन पति मर चुके थे, हरिहर साहब चौथे थे l छलिया कुटिला मृत्यु से तेरहवीं के बीच जो कुछ नगदी और कीमती वस्तुयें घर में थी सब मायके पहुँचा दिए किसी को कानों कान खबर तक नहीं लगी l हरिहर साहब को रिटायरमेंट के साल भर ही तो हुए थे कि वे चल बसे थे l

हरिहर साहब पक्के मकान के प्लास्टर के लिए घर में आठ- दस लाख रुपए रखे थे, हरिहर साहब को मोटी पेंशन भी मिल रही थे, रिटायरमेंट के बाद चालीस पचास लाख रूपये मिले होंगे, ऎसा लोगों का अनुमान था l

हरिहर साहब के इंस्पेक्टर की नौकरी से रिटायर हुए साल भर ही तो बीता था और मर गए कुटिला के दुर्व्यवहार से आहत होकर l घर में लाखों रूपये आभूषण और अन्य कीमती सामान तो घर में पहले से थेl

महाठगिनी कुटिला सब साफ कर दी थी,तेरहवीं के लिए बेटों को महाजन से सूद पर रूपये लेने पड़े थे l तेरहवीं के बाद भैंस,गाय और विदेशी नस्ल की बकरी कुटिला ने मायके हकवा दी थी l

नगदी और सभी कीमती वस्तुएँ कुटिला ने मायके और बहनों के घर पहुँचा देने के बाद कुटिला अचल सम्पति पर, बैंक में जमा रूपये, और फिक्सड डिपाजिट पर एकाधिकार के लिए मायके वालों के साथ संबंधित विभागों में दौड़धूप करने लगी पर निराशा हाथ लगी l

संबंधित विभागों से निराश होकर कुटिला तीनों बेटों को साजिश के चक्रव्यूह में फंसाकर घर,जमीन और बैंक में जमा रकम लेने के लिए कोर्ट पहुंच गयी l शातिर कुटिला ने पूरे मामले में वंदिनी का जिक्र ही नहीं होने दीl सौतेली माँ कुटिला और भाईयों ने बिन माँ-बाप की बिटिया बनाकर वंदिनी को लावारिस छोड़ दिया l

यह वही वंदिनी थी जिसके पिता और बड़े भाई उसका का चेहरा देखे बिना घर से बाहर नहीं निकलते,

बरसों बाद जब वंदिनी माता-पिता की विरासत की उड़ती -उड़ती खबर लगी तो बस उसने कहा मुझे माँ- बाप की चल-अचल सम्पति में कोई हिस्सा नहीं चाहिए था फिर मेरा रक्तविच्छेद कर लावारिस क्यों बना दिया l

कहते हैं ना वक़्त सबसे बड़ा जज होता है। समय अपनी रफ्तार से चल रहा,जिस चल- अचल संपत्ति के लिए वंदिनी का रक्तविच्छेद कर लावारिस कर दिया गया था, वही संपत्ति धीरे-धीरे विनाश का कारण बनने लगी।

डायन कुटिला ने अधिकार तो प्राप्त कर लिया, पर किसी को अपना नहीं बनाई, हरिहर साहब की औलादें भी कुटिला दुश्मनों जैसा व्यवहार करती थी । कुटिला ने धन तो इकट्ठा कर ली पर विश्वास खो दी थी । कुटिला घर पर कब्ज़ा, जमीन जायदाद पर कब्जा कर ली ,परन्तु से उसकी करतूतों से उसे घर का सुख नसीब नहीं हुआ ।

कुटिला बहुओं और पोते पोतियों के हाथ का छुआ पानी तक पीना छोड़ दी , वह कहती ये हरामी लोग जहर देकर मार डालेंगे l

कहावत है लड़की को मायके का कुत्ता प्यारा लगता है,रक्त विच्छेद के बाद भी उसे माँ-बाप, भाईयों के साथ बीती बचपन की यादें नहीं भूली वह दिल पर पत्थर रखकर चार -छः साल में मायके जाती, भाई -भौजाई सम्मान देते परन्तु सौतेली माँ कुटिला वंदिनी के आने की खबर सुनकर अपने मायके या बहनों के घर चली जाती,वंदिनी की हाथ खाने-पीने की वस्तुयें फेंक देती कहती सपोली डंस लेगी l

कभी जो घर हरिहर साहब की मेहनत और प्रतिष्ठा का प्रतीक मकान था वही घर कुटिला ने कलह और लड़ाई -झगड़े का मैदान बना दी थी l

सौतेली माँ और भाईयों के रक्तविच्छेद से आत्मपीड़ित वंदिनी, मन की शान्ति के लिए धर्म और कर्मकांड की ओर रुख कर ली गुरुमन्त्र भी ले ली पर पति यशेंद्रबाबू को भनक भी नहीं लगने दी lवंदिनी के दिमाग़ पर धर्म और कर्मकांड ने अफीम की तरह काम कियाl आध्यात्मिकता के रास्ते चलने वाले यशेंद्रबाबू चिंतित रहने लगे l शालिन स्वभाव वाली वंदिनी धर्म में घुस गयी कि पति में ही उसे खामिया दिखाई पड़ने लगी, जिस पति की वजह से उसका अस्तित्व था l पति यशेंद्रबाबू को बात-बात पर ताना मारना आदत बन गयी,बच्चे भी परेशान हो जाते थे l

उधर सौतेली माँ कुटिला के चक्रव्यूह में फंसकर जिन भाईयों ने अपनी इकलौती बहन के अस्तित्व को नकारने और रक्तविच्छेद करने में सहमति दी थी,वे स्वयं उपेक्षा और अपमान का शिकार हो गए ,सौतेली माँ कुटिला,कैकेयी बन गयी,घर को कलह और आंतरिक युद्ध का मैदान बना दी । रिश्तों की वह फसल, जिसे स्वार्थ के बीजों से बोया गया था वही अब काँटों में बदल चुकी थी l

इधर वंदिनी के बच्चों ने वंदिनी को पढना-लिखना सीखाना शुरू कर दिया l वंदिनी बच्चों की मदद से पुस्तकों से जुड़ गयी l धीरे-धीरे वंदिनी ने आत्मसम्मान को अपने जीवन की पूँजी बना ली ।

वंदिनी को समझ आ गया कि विरासत केवल जमीन और मकान नहीं होती बल्कि विरासत चरित्र भी होता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी इंसान को इंसान बनाए रखता है।

बरसों वंदिनी बाद वंदिनी अपने मायके पहुँची।घर तो वैसे ही खड़ा तो था पर

अपनी हालत पर रो रहा थाl भतीजों भतीजीयों से आँगन भरा हुआ पर आँगन में मनहूसी का सूनापन मौजूद था।

मकान की दीवारों का पलस्तर तक नहीं हुआ इंटे झड़ रही थी,जिस घर आँगन में कभी रौनक़ हुआ करती थी अब उदासी पसरी हुई थी l

वंदिनी आँगन की मिट्टी मुट्ठी में उठाकर मुट्ठी बंद कर भर ली थी ,उसकी आँखों से मोटी -मोटी बूंदे झर थी थींl

वंदिनी को लगा जैसे उसके पिता हरिहर साहब की आवाज़ घर की दीवारों में गूँज रही हो।वंदिनी आसमान को श्रद्धा से निहारते हुए बोली —

"बाबूजी,स्वार्थियों ने मुझे कागज़ों पर लावारिस बना दिया, कचहरी ने स्वीकार भी लिया था,पर बाबूजी आपकी बेटी होने का अधिकार मुझसे कोई नहीं छीन सकेगा l

हवा का एक झोंका आया जैसे वक़्त ने वंदिनी के विश्वास पर पर मुहर लगा दिया हो l

वंदिनी समझ चुकी थी कि रक्त-विच्छेद का अर्थ केवल स्वार्थवश रिश्तों का टूटना नहीं होता बल्कि रक्त-विच्छेद तब होता है जब आदमी अपने भीतर की आदमियत का कत्ल कर देता है।

सौतेली माँ कुटिला देवी और उसके भाईयों ने उससे संपत्ति तो छीन ली थी,जिस पर उसने कभी अधिकार ही जतायी, परन्तु बचपन की स्मृतियाँ उसी माटी से जुडी हुई थी जो स्मृतियों की सम्पति कोई भी कितना बड़ा स्वार्थी क्यों नहीं हो जाये, नहीं छिन सकता, कोर्ट -कचहरी भी नहीं l

वंदिनी जिस जमीन जायदाद पर अधिकार कभी नहीं समझी थी,पर अपनत्व तो था वह भी छीन गया था पर उसकी पहचान कोई नहीं छिन पाया l पूरा गांव कह रहा था वंदिनी हरिहरबाबू और सावित्रीदेवी की बिटिया है,हमेशा रहेगी,गांव का साक्ष्य उसकी अटल पहचान थी l वंदिनी की आत्मा से उसके माता-पिता का प्रेम कभी नहीं मिटा l


वंदिनी ने मायके से ससुराल की ओर जब चली तो आँगन की माटी चंदन की तरह माथे लगा ली थी l वंदिनी के दिल में कोई मलाल नहीं भले ही कानूनी तौर पर रक्तविच्छेद की शिकार हो गयी थी उसे तब गहरा बोध हुआ कि -

रक्त के रिश्ते टूट सकते हैं, कानूनी तौरपर कागज़ों पर मिटाए जा सकते हैं, अदालते मुहर लगा सकती हैं; परन्तु जन्मभूमि से प्रेम,स्मृतियां और आत्मीयता के रिश्ते किसी भी कोर्ट के फैसले के मोहताज नहीं होते।

वंदिनी रक्त-विच्छेद की शिकार कानूनीतौर पर तो अवश्य हुई,आखिर में वही वंदिनी उस रक्त के रिश्ते से अधिक महान साबित हुई जिस रक्त के संबधियों ने उसे क़ानून और गवाहो का सहारा लेकर रक्त विच्छेदित कर दिया था।

नन्दलाल भारती

31/05/2026



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