Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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मौत की वो रात

 

कहानी-मौत की वो रात

( दोस्तों इस कहानी के पात्रों-सास-ससुर,पौत्र-देवेन्द्र(आशीष का बेटा)आशीष का उसकी पत्नी प्रमिला के पति उत्पीड़न की सुलगती दास्तान,इन पात्रों के माध्यम से साझा करने का प्रयास है)

अँधेरी रात थी, कहीं-कहीं स्ट्रीटलाइट तो जल रही थी पर अंधेरा उजाले को निगलने की कोशिश तो कर रहा था l बरसात की आवाज़ में दूसरी आवाज़े मंद पड़ चुकी थी l घरों में जलने वाली लाइट से सब कुछ दृश्यव्य था l

तीसरे मंजिल की आवाज़ ग्राउंडफ्लोर बाउंड्री के मेनगेट तक  सुनायी पड़ रही थी l  मैं शहर में  इंजिनियर बेटे के घर पूरी मेडिकेशन लेकर  स्वास्थ्य लाभ के लिए आया था l  बेटा के बार-बार के बुलावे को ठुकरा नहीं पाया थाl मैं शनिवार को सुबह की फ्लाइट से आ गया था l सप्ताह भर बेटा और सप्ताह भर बेटी के घर l  आज बेटा के घर सातवॉ दिन था l

पाँचवी वर्ष की उम्र पार कर छठवीं में प्रवेश कर चुके पौत्र देवेन्द्र के साथ संध्या भ्रमण के बाद जैसे बेटा के घर के सामने पहुँचा कान में दर्द का एहसास होने लगा था l मैंने देवेन्द्र का हाथ एक हाथ से थामे किराये की बहुमजिला बिल्डिंग के घर का मेनगेट को आहिस्ते से खोलने लगा पर क्या मेरे पैर ही जैसे धरती में जैसे घुठने तक धंस गए थे  l  

यह आवाज़   गाल पर जूता मारने जैसा घाव कर रही थी l देवेन्द्र जल्दी-जल्दी  उपर चढ़ने लगा l मैंने कहाँ बेटा धीरे चढ़ो सीढ़ियों पर पानी है, मेरे पैर मुझे इतने भारी लग रहे थे कि उठ ही रही थेl

मुझे तीसरी मंजिल तक पहुंचने मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था l सांस भी भारी होने लगी थी, वैसे भी परिस्थितियों ने बीपी सहित कई बीमारियों का मरीज़ बना दिया l देवेन्द्र अपने तीसरी मंजिल के दरवाजे के सामने  खड़ा था, मैं  जोर से सांस खींचकर  रेलिंग पकड़ हुए लल्ला अंदर चलो बोला था l

देवेन्द्र के मुंह से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी l

इशारे से पूछा लल्ला क्या हुआ इस बार भी देवेन्द्र निः शब्द l ऐसा नहीं था कि देवेन्द्र बोलता नहीं था, हाजिर जवाब था, बड़े शहर के बड़े स्कूल में पहली क्लास में पढ़ता थाl पढ़ाई के साथ खेलकूद और पब्लिक स्पीकिंग जैसे विषय भी स्कूल में पढ़ाये जाते थे l हँसी -खुशी खेलकर आया था पर अब वही देवेन्द्र निः शब्द था,आँखों में आंसू थे l

मेरी आशंका डर में बदल गई l देवेन्द्र अंगुली से अंदर की ओर इशारा किया l मैं आगे-आगे देवेन्द्र पीछे-पीछे अंदर प्रविष्ट हो गए, दोनों बेडरूम में कोई हलचल नहीं थी,मुझे सीढ़ियाँ चढ़ते हुए बर्तनों की आवाज़ तो आयी थी, मुझे लगा था कि कीचेन से बर्तन गिरने की आवाज़ तो आयी थी l  हाल में प्रवेश कर नज़र दौड़ाया तो कुछ नज़र नहीं आया l

हाँ आशीष की वर्किंग चेयर खाली थी सिस्टम भी चालू थेl बेटा शहर में भी वर्क फ्रॉम होम कर रहा है, उसकी नौकरी सुबह दस बजे से शुरू होती है पर ड्यूटी देर रात तक भी नहीं खत्म होतीl  कभी-कभी मैं डिनर करके पौत्र देवेन्द्र के साथ सो  भी  जाता थाl

आशीष  सिस्टम में आँख गड़ाए कुर्सी में धंसा रहता था, भले ही कितनी भी रात को डिनर करें और सोये पर उसे बच्चे को स्कूल छोड़ने की लिए जल्दी उठकर जाना पड़ता था l पूरी तरह से  आरामपसंद प्रमिला अपने ही बेटे को टिफिन तक नहीं बनाती थी, नन्हा देवेन्द्र स्कूल की मील के भरोसे था l 

प्रमिला के  माँ-बाप अपने आधा दर्जन बच्चों के ब्याह के खर्च की जिम्मेदारी आशीष को ही उठाने को मज़बूर कर रहे थे l आधा दर्जन बच्चों में से इकलौते सबसे छोटे भाई को प्रमिला अपने साथ रखकर प्रोफेशनल कोर्स भी आशीष के खर्चे पर करवाई थी,बाकी बहनों की पढ़ाई-लिखाई में भी मदद करवा रही थी l सास-ससुर और परिवारजनों से बात तक करने नहीं देती थी l

प्रमिला का बाप झूठरतन गौतम इतना गिरा हुआ इंसान था कि अपने घर नाती देवेन्द्र की डिलीवरी करवाने के लिए धीरे-धीरे नौ-दस लाख रूपये तक झटक लिये थे l घर के रंग-रोगन सहित ऊपरी मंजिल के बनवाने का खर्च भी वसूला था l 

कॉनमैन और क्रिमिनल परिवार की बेटी प्रमिला,आशीष को माँ-बाप से फोन पर बात कर लेने के खिलाफ पति-उत्पीड़न के केस में पुलिस बुला लेती थी l पागल औरत कई बार बुरी पिटाई भी कर देती थी l रिश्वत के भूखे पुलिस वाले आशीष की एक ना सुनते l आशीष के पास रूपये नहीं रहने पर किस्त में  वसूलते थे,आशीष की कमाई पुलिस, प्रमिला की फिजूलखर्ची और उसके माँ-बाप की डिमांड पूरी करने में ही खर्च हो जाती थी l

देवेन्द्र के लिए आशीष मदर-फादर दोनों था,प्रमिला न कभी छाती का दूध पिलाई न ही टिफिन बनाई, आशीष का दिल देवेन्द्र के लिए ही धड़कता था और पागल पत्नी प्रमिला का जुल्म सहता था l साल भर का देवेन्द्र हुआ भी नहीं था, तभी से मार-मार कर मुंह लाल कर देती थीl आशीष के विरोध पर कहती मैं बदला ले रही हूँ l यह सगी माँ सौतन माँ जैसा व्यवहार देवेन्द्र के साथ करती थी l

देवेन्द्र उम्र के छठवें वर्ष में कदम रख चुका था, कुशाग्र बुद्धि था,वह धीरे से बोला ये ऐसे ही करती है l देवेन्द्र पापा से ही नहीं अपनी मम्मी से भी बहुत प्यार करता था,असली सच्चाई से अभी अनभिज्ञ था l

वही देवेन्द्र आँखों में आंसू लिए स्टेचू बना हुआ खड़ा था, उसका बाप आशीष कीचेन में गिरा मुंह को दोनों घुठनों से लगाए, दोनों हाथों से सिर पकड़े तड़प रहा था l

मैं यह दृश्य देखकर अंदर से काँप उठा था, मुझे लगा मौत मुझे दुलार रही है l उधर कीचन में आशीष तड़प रहा थाl  आशीष दर्द में कराह रहा थाl मैं जीना नहीं चाहता हूँ l मैं सुसाइड करना चाहता हूँ l मैं प्रमिला तुमसे मुक्त होना चाहता हूँ l ये औरत कभी खुशी मन से दो रोटी नहीं बनाई,अब देवेन्द्र मरे या जीये,मैं मर जाना चाहता हूँ l 

एक  पिता जो उस देवेन्द्र के लिए ऐसे शब्द बोल रहा था, जिसका डाइपर बदलने से लेकर बोतल से दूध पिलाकर बड़ा किया था, देवेन्द्र के लिए आशीष के मुंह से ऐसे शब्द सुनकर मेरी किडनी गले में अटक गयी थी, कुछ सेकंड के लिए जैसे दिल ने धड़कना बंद कर दिया था l

मैं अपनी आँखों पर काबू करते हुए हिम्मत करके कीचन में गया, पागल टुनटुन की प्रतिलिपि फाइव स्टार होटल का खाना मंगा कर खाने वाली प्रमिला मेरी वजह से सात दिनों से खाना बना रही थीl वह शिकायत भी कर चुकी थी l अभी प्रमिला के हाथ में आटा तो लगा हुआ था l

प्रमिला मुझसे अनजान अभी भी  आशीष के उपर लटकी हुई थी, आशीष दोनों घुठने मुंह से लगाए दोनों हाथों से सिर पकड़े तड़प-तड़प कह रो रहा था, मैं सुसाइड कर लूंगा l प्रथम दृश्या लग रहा था कि आशीष के सिर में गहरी अंदरूनी घाव के साथ शरीर में भी अंदरूनी घाव है l 

आशीष के सिर पर तवा या लोटा से मारा गया था l हाँ बर्तनों की आवाज़ तो सीढ़ियों पर मुझे सुनायी जरूर पड़ी थीl जमीन पर आशीष को तड़पता हुआ देखकर अंदाजा तो लग रहा था l मेरी जबान तालु में चिपक गयी थी,मैं निः शब्द था यह दृश्य देखकर l

मैं खुद अपराधबोध में गड़ा जा रहा था क्योंकि सती सावित्री जैसी बहू की तलाश देश के बड़े शहर जो  चमड़े के उद्योग, वस्त्र उद्योग और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के लिए प्रसिद्ध है, जो  प्रदेश की औद्योगिक राजधानी बनाता है। इसे "पूर्व के मैनचेस्टर" के रूप में भी जाना जाता हैl यह शहर गंगा नदी के किनारे स्थित होने के कारण  एक महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र है।

यह शहर  सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक महत्व के लिए भी जाना जाता है। इसी शहर के अनजान परिवार से रिश्ता जोड़ लिया था जो मेरे जीवन की बहुत बड़ी गलती थी, जिसकी कीमत पत्नी के उत्पीड़न से ग्रसित बेटा  तो चुका रहा थापूरा परन्तु  परिवार सिसक -सिसक कर जी रहा था l मैंने अच्छे परिवार की सुलक्षणा बहू चाह में बिना किसी दहेज के प्रमिला का ब्याह आशीष के साथ  बड़े उत्साह के साथ कर अपने कुल की मर्यादा प्रमिला को बनाया था l

प्रमिला ने जो लक्षण दिखाए वे पारिवारिक मर्यादा के खिलाफ थे,बाद में तहकीकात करने पर पता था कि झूठरतन गौतम और उसका परिवार बहुत बुरे लोग है, प्रमिला आधी पागल भी है lमैं बुरी तरह फंस चुका था,यह परिवार झूठ बोलकर रिश्ता किया थाl 

यह पागल विषकन्या आशीष को मदहोश कर महीने भर के अंदर लेकर फुर्र हो गयी थी lप्रमिला को ससुराल के लोग दुश्मन लगते थेl  पौत्र देवेन्द्र के बाल बुलावे  पर मैं आशीष के पास गया था l देवेन्द्र नाना झूठरतन की कैद में पैदा हुआ था, कई बरसों तक तो पौत्र का मुंह भी नहीं देख पाए थे l

आज आशीष के घर की  सातवीं रात थी, जिसकी ख़तरनाक परिणति सामने थी, प्रमिला मुझे देख कर दूर हट गयी थी, मैं आशीष को उठाने की कोशिश कर रहा था पर वह फर्श पर चिपका पड़ा हुआ था उठ नहीं पा रहा था l वह रो-रो कर कह रहा था पापा मुझे माफ करना मैं सुसाइड कर लूंगा, यह औरत मुझे जीने नहीं दे रही है, जब से आयी है, तब से दुःख-दर्द के अलावा और कुछ नहीं दिया, मैं मर जाना चाहता हूँ l पापा मुझे माफ करना यही बार-बार बोले जा रहा था l

मैं भी डर रहा था कि क्रिमिनल माँ-बाप की बेटी मुझ पर इल्जाम लगाकर पुलिस न बुला ले, बार-बार पति उत्पीड़न करने वाली प्रमिला पत्नीउत्पीड़न में आशीष को लालघर भी पहुँचा चुकी थी, अभी भी खतरा बरकरार था l प्रमिला का रिकॉर्ड पुलिस के पास भी थाl पुलिस भी प्रमिला के क्रिमिनल माइंड को पढ़ चुकी थी l

आशीष को समझा-बुझा कर उठाया,सिर पर हाथ फेरा तो मुझे बड़ा सा गोला उठा मालूम पड़ा, मेरी आँखों में तो आँसू बर्फ की शक्ल ले चुके थे l इतने में प्रमिला बोली डैडीजी इन्होंने ने अपने सिर पर लोटा से मारा है, हकीकत तो कुछ और थीl प्रमिला लात-घुसे भी शायद चलाये थे l सबूत तो यही कह रहे थे l हर आदमी के लिए   सोचने के लिए मजबूर करने वाली बात थीl प्रमिला बिल्कुल नॉर्मल थी, जैसे लग रहा था ना कभी पहले कभी आशीष को शारीरिक नुकसान पहुंचाया है ना आज l सारा दोष आशीष के सिर पर मढती आ रही थी,जबकि कॉनमैन और क्रिमिनल बाप की पागल बेटी ही अपराधी थी l

मैंने पूछा आईओडेक्स है क्या? प्रमिला ने  आईओडेक्स मेरी तरफ बड़ा दी थी,बेहया किस्म की औरत ने अपने पति के सिर पर आईओडेक्स नहीं लगायी l मैंने आशीष के सूजन वाली जगह आईओडेक्स लगाकर मालिश किया,वह अपनी वर्किंग चेयर पर बैठा बच्चों की तरह रो रहा था l मेरे बार-बार के कहने पर उठा हाथ-मुंह धोकर रोते हुए अपनी ऑनलाइन ड्यूटी करने में जुट गया,प्रमिला कीचन से बाहर नहीं झांकी थीl

रात के साढ़े आठ बजे होंगे आशीष मेरे पास आया और बोला चलो पापा खाना खा लो, प्रमिला ने आज तीन ही थाली लगायी थी, वैसे चार थालियां लगती थी l हम तीनों आशीष,देवेन्द्र और मैंने खाया, आशीष वर्किंग चेयर पर बैठ गया,मायूस सा देवेन्द्र और चिंताग्रस्त मैं बेडरूम में चले, देवेन्द्र को भी नींद नहीं आ रही थी l 

नींद मुझसे कोसों दूर जा चुकी थी,रात डेढ़ बजे देवेन्द्र बोला दादाजी सिर दर्द कर रहा है l मैंने सिर दबाया थोड़ी देर में वह सो गया, हाल में देखा तो आशीष ड्यूटी पूरी कर दो बजे वर्किंग चेयर पर बैठा था l उसे समझा-बुझाकर सोने के लिए भेज तो दिया पर मेरा सिर दर्द से फट रहा था, मैं अनुलोम-विलोम करने पर फोकस किया l 

मैं अब अपने देश के स्वच्छ शहर जाने की तैयारी में जुट भी गया था l रात की डरावनी मौत का तूफान टल तो गया था पर खतरा बरकरार था l दस साल में पहली बार बेटा के घर सात दिनों तक रुका सिर्फ देवेन्द्र के मोह में lमेरे बेटे आशीष की कमाई मायके वालों पर पानी की तरह बहाने वाली प्रमिला के लिए मेरा अपने ही बेटा के घर आना इतना नागवार गुजरा की प्रमिला ने पति की बुरी तरह पिटाई कर दी थी,और आशीष डरा-सहमा पागल पत्नी का अत्याचार मूक सहने को ना जाने क्यों लाचार था l उन्नीस सितंबर की रात बीत चुकी थी, बीस सितंबर का सूर्योदय हो चुका था l 

मुझे अपने बेटा के घर में और रुकना, अपराधबोध के दलदल में ढकेल रहा था l मैंने झूठरतन की बेटी, जी हाँ कॉनमैन और क्रिमिनल झूठरतन की चोरमिजाज़ पागल बेटी प्रमिला, जो नहीं अच्छी पत्नी बन सकी,ना अच्छी माँ,अपने माँ-बाप के पति को उत्पीड़ित करने वाली,लूटेरी,सास-ससुर को दुःख के विरान में ढकेलने वाली प्रमिला अच्छी बेटी तो बनी हुई थीl

इस प्रमिला पागल औरत ने झूठी बीमारी का बहाना बनाकर पति को कानूनी तौर पर फंसाने के लिए, मुझे भी लपेटे में लेने के लिए मकान मालिकिन के सहयोग से हॉस्पिटल में एडमिट हो गयी l बड़े हॉस्पिटल महंगी जांचों,महंगी दवाई और हॉस्पिटल के भारी बिल का बोझ आशीष के उपर आ गया था l 

पागल और प्रमिला की बीमारी का बहाना कर हॉस्पिटल में भर्ती होना, झूठी पुलिस-शिकायत करना उसकी आदत बन चुकी थीl कई जांचो के बाद बीमारी कोई नहीं निकली, डॉ ने जरूर सलाह दे दिया कि इन्हें मनोवैज्ञानिक को दिखाना चाहिए l इस बात पर भी वह विफर गयी बोली तुम सब मुझे पागल साबित करना चाहते हो l आख़िरकार हॉस्पिटल ने बड़ा सा बिल आशीष को थमा दिया l 

मरता क्या ना करता हॉस्पिटल का बिल चुका कर चोर मिजाज़ पागल औरत को घर वापस लाया पर आशीष के जीवन सुख-शांति कहाँ आने वाली थी कॉनमैन और क्रिमिनल माँ-बाप की पागल मिजाज़ बेटी प्रमिला आशीष की पत्नी ही उसके के जीवन की दुश्मन जो थी l

मैं अपने घर निर्धारित दिनों से पहले पहुंच गया,मुझे देखकर देविका बोली नारायणजी जल्दी आ गए मेरे होंठ सील चुके थे मैं निः शब्द था l डरा सहमा सोच रहा था कि मैं अपने जीते जी मरने की  मौत की वो रात की बात  देविका को कैसे सुना पाऊंगा ? जो मैं इस जीवन में नहीं भूला पाऊंगा l

दोस्तों यह कहानी यही तक l

नन्दलाल भारती

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