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कामवालीबाई पनीता

 

कामवालीबाई पनीता

बसंत के मौसम में जैसे पौध जगत गदराया  रहता है, इस गदरायी फिजा को अपनी सुर-साधना से  पूरी फिज़ा को कोयल भरपूर मनोहारी बना देती हैl ऐसा ही वातावरण बना था नीता का जगन के साथ सात फेरे लेने और सात जन्म तक साथ निभाने की कसमें खाने के बाद ससुराल आने पर l

बूढ़े सास-ससुर बहुत  आच्छर गुजर हुए थे l बूढ़े-बूढ़ी ने मेरे अगने में आई बहार गाने पर डांस भी किया थाl बुढऊ तो इतने थिरके थे कि सांस उखड़ने लगी थी, बुढ़िया ने अपने आँचल से हवा किया था l नीता सब रस्मो को एक तरफ छोड़कर ससुरजी को पानी पिलायी थी l ससुरजी ने के सिर पर हाथ रख दिया l

नीता थी छः फिट जितनी ऊँची छरहरी सुन्दर तो इतनी की हीरोइन जैसी l जगन नीता से बीता भर नीचा था, उसकी आँखों में  नशा था और कुछ खास नहीं l यह सब  नसीब का खेल था और कुछ नहीं l आर्थिक स्थिति सामान्य से कमतर थी,किसी कम्पनी में जगन मामूली सी नौकरी कर रहा था l

नीता के माँ-बाप ने घर-वर देखा था l

नीता पुरानी विचार-धारा की तो नहीं थी, पढ़ी-लिखी भी थी माँ-बाप के खिलाफ जा भी नहीं सकती, खैर इतनी बुरी आर्थिक स्थिति थी भी l नीता,जगन की आँखों में झाँक कर गच्चा खा गयी थी l जगन की आँखों में डूबकर पूरी तरह बउरा गयी थी l

शहर में नौकरी पेशे वाला परिवार था, बूढ़ा ससुर भी अपने हुनर से कमा कर भी लाता ही था l नीता पढ़ी-लिखी तो ज्यादा पढ़ी-लिखी थी l नौकरी करने का विचार भी बनाई पर जगन ने उसकी सुंदरता को देखते हुए नौकरी की इजाजत नहीं दियाl

नीता ने विरोध भी किया पर जगन की ना तो ना l नीता घर काम-काज निपटा कर पति की इच्छानुसार बनने संवरने में समय बिताने लगी,जगन भी बहुत खुश होता l हर रात जगन के ही लिए नहीं नीता के लिए भी जश्न की होती l जगन  था बहुत आशिक मिजाजl 

इस आशिक मिजाजी ने पहली पंचवर्षीय योजना के पूरा होने से पहले ही  दो अनमोल रतन और एक लाडली  खड़ी कर दिया l घर-परिवार में तो अपरमपार खुशी थी l 

जगन को अब नीता में कोई रस नहीं आ रहा था l वह  आशिक मिजाज इधर-उधर मुंह मारने लगाl नशीली आँखों वाले जगन के फेरे में  कोई कली बउरा गयीl तीन बच्चों का बाप कोमल कली के साथ फरार हो गया l इसी बीच बूढ़े सास-ससुर भी उस परदेस को चले गए-जहां से ना आती चिट्ठियां ना सन्देश l

अब नीता के सामने विरान मारुभूमि थी आँखों में मोटे-मोटे आंसू और ढलती युवा काया l दो अनमोल रतन एक लाडली चौथी खुद l घर में बर्तन भाड़े खाली किराये का एक l रूपये आएं कहाँ से विकट समस्या, कमरे का किराया, बच्चों के स्कूल की फीस l 

नीता के सामने जाये तो जाएं कहाँ की स्थिति l तीन बच्चों को छोड़कर वह सुसाइड की हिम्मत नहीं जुटा पायी,न ही शरीर बेंची और एक स्वाभिमानी महिला  माँ-बाप के घर वापस भी नहीं गयी, स्वाभिमानी ही नहीं इज्जतदार परिवार की बेटी थी l

नीता घर के कामों पारंगत थी, झाड़ू-पोंछा के अलावा उसे कुछ नहीं आता था l नीता अपने चेहरे को नोंच डालीl नीता के पास कोई आढ़त तो नहीं, इतनी पढ़ी-लिखी भी नहीं थी कि कहीं नौकरी कर लेतीl नीता के बचपन का शौक था घर की साफ-सफाई, झाड़ू-पोंछा यह काम उसे अच्छी तरह से आता था l

नीता ने मांग का सिन्दूर पोंछा नहीं बल्कि भर मांग अंगुली जितना  चमकदार,चटकदार सिन्दूर भरी जो दूर से दिखाई पड़ जाये ताकि कोई उस पर कोई लफंगा बुरी नियति न डाले l नीता ने अब थाम लिया झाड़ू -पोंछा और बन गयी प्रोफेशनल कामवाली पनीताबाई l

साल भर बाद जगन  लेकर  रात के अंधेरे में लौटा राजबाड़ा की  कचौड़ी और  छप्पन दुकान  की जलेबी के साथ l यही तो नीता की पसंद थीl  नीता से माफ़ी भी मांग लिया,दो रात-दिन में नीता के पोर-पोर हिलाकर, तीसरे दिन अभी बच्चे सो ही रहे थे कि जगन उठा और बोला नीता मुझे अभी जाना  l

निश्छल नीता बोली अब मैं नीता नहीं पनिता हूँ l जगन तुम साल भर बाद आए हो, एकाध महीने बाद चले जाना मैं नहीं रोकूंगी, बच्चों को भी अच्छा लगेगा l

जगन बोला-नीता, सॉरी पनीता डार्लिंग,पांच बजे की ट्रेन है, दो दिन की छुट्टी थी,ख़त्म हो गयी, मुझे जाना है, किराये के पैसे पूरे नहीं हैं, कहकर जो रूपये उसने पनीता को दिए थे वह भी और उसकी  लोहे की पेटी में जो कुछ था सब लेकर भोर के अंधेरे में ही गायब हो गया,नीता चीखती-चिल्लाती,छाती कुटती रह गयी l 

 चकनाचूर दर्पण की तरह उसके अरमान एकदम से बिखर गए l इन्हीं बिखरे अरमानों के साथ निकल पड़ी बच्चों के लिए जीने l

पनीता की कमाई में धीरे-धीरे बरक्त होने लगे बच्चे बढ़ने लगे, बिटिया तो रेड़ के पेड़ की तरह बढ़ रही थी, जूनियर हाईस्कूल पास करने से पहले पूरी औरत जैसी दिखने लगी, झटपट पनीता ने बिटिया के हाथ पीले करवाकर विदा कर दिया l 

दूसरा बेटी दसवीं पास कर रोजी-रोजगार की तलाश में निकल पड़ा l तीसरा बेटे का पास के एक अच्छे स्कूल में एडमिशन करवा  दिया l पनीता आसपास के  कई कालोनीयों के पसंद की कामवालीबाई बन गई थी!

दो-तीन दिन पनीता काम पर नहीं आयी तो मैंने पत्नी रेखा से पूछ लिया आजकल पनीता नहीं आ रही है, क्या हुआ है उसको?

पल्लवी बोली-प्रफुल्लजी,पनीता जब पीरियड में होती है, तब मैं उसे आराम करने की छुट्टी दे देती हूँ l

वाह यार-पीरियड में भी छुट्टी महीने में दो-चार दिन वैसे भी नागा मार लेती है, बाकी खातिरदारी भी l

पल्लवी बोली-प्रफुल्लजी वह एक औरत है और मैं भीl वह पैदाइशी बाई नहीं है परिस्थितियों ने मज़बूर किया हैl पनीता के  भी अच्छे   दिन आएंगे भले ही प्रधानमंत्री पंद्रह लाख देने का वादा करके मुखर जाएं l श्रम की एक दिन जीत  जरूर  होती है l आप भी तो कहते हो काम ही पूजा है, पूजा का फल तो देर सबेर मिलेगा ना!

मैंने कहा सलाम  श्रमिक वीरांगनाओं को l

पल्लवी बोली -प्रफुल्लजी दुनिया वालों  को सोचना चाहिए कि झाड़ू-पोछा करने वाली बाई हमारे घर को ही नहीं, हमारे जीवन को भी स्वच्छ और व्यवस्थित बनाती है। लेकिन अक्सर वही महिला, जो हमारे घरों की गंदगी साफ करती है, समाज की नजरों में सम्मान पाने के लिए संघर्ष करती रहती है।

मैंने कहाँ - ना कोई आदमी ऊंच होता है ना नीचl ना कोई काम छोटा होता है ना बड़ा l ऐसी मानसिकता वाले छोटे होते या नीच समझो l

समाज को  को  यह समझना होगा कि बाई काम छोटा नहीं, बल्कि सबसे जरूरी है,अगर वे न हों तो स्वच्छता, स्वास्थ्य और सुविधा की हमारी कल्पना अधूरी  रह जाएगी। वह रोज़ सुबह-सुबह दूसरों के घर को चमकाने आती है, अपने ही घर की परेशानियों को छुपाकर।

पल्ल्वी सच कह रही हो l असली सम्मान यही है कि हम झाड़ू-पोंछावाली बाई या “कामवाली बाई” ही नहीं बल्कि उन्हें एक मेहनती और आत्मनिर्भर महिला के रूप में पहचानें। उसके साथ बराबरी का व्यवहार और सम्मानजनक शब्द से सम्बोधित करें बोले l कामवाली बाई को  उचित मेहनताना दें,यही कर्तव्य बनता है।

पल्लवी बोली-प्रफुल्ल जी, झाड़ू-पोंछा वाली अपनी पुनीता हो या और कामवाली बाईयां ” सभी  झाड़ू पकड़ने वाले हाथो  को उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना सम्मान  कलम पकड़ने वाले हाथों को मिलता  हैl

मैंने कहा सच फरमा रही हो, समाज को न तो आदमी को जाति से और नही काम से छोटा-बड़ा आंकना चाहिए l 

पल्ल्वी बोली-इंदौर ने झाड़ू वाले हाथों कितना बड़ा सम्मान दिया है l उदाहरण चौराहे पर सम्मान से खड़े हैं उनके स्टेचू l हर इंसान समान  है और हर काम पूजा l

नन्दलाल भारती

23/08/2025



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