Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

हम भारत के लोग

 

हम भारत के लोग

क्या कुछ कहने को बाकी है 

कि कह दूँ नया

कहा नहीं गया हो जो आज से पहले कभी

नये साल की आगवानी और पुराने की विदाई परl

नया साल आता है, पुराना विदा हो जाता है

साल हर साल, साल दर साल 

समय का प्रवाह है यही होता है 

यही होता आ रहा है l

नये साल पर नये सपने देखते है

उम्मीद के उजियारे में उठते हैं,

रात के अंधेरे में उदास,करवट बदलते हैं

घाघ राजनेताओं को कोसते भी हैं 

आखिर करेंगे भी क्या ?

थके हारे,जंग लगे सपनों को ढ़ोते हुए 

विकास के सपनों में जीते हैं

हम भारत के लोग,

टूटे ख्वाब सीते हैं बार-बार, आखिर में मरे हुए सपनों को

नये साल के नये उजियारे में

प्रतिष्ठित कर देते हैं एक बार फिर l

आशावादी है,बस आशा में जीते हैं,

आगे बढ़ना है तो उम्मीद में जीना पड़ेगा

बारूद के ढेरों से डरते हैं,समझते-समझाते हैं

रोते -हंसते,गाते, लिखते पढ़ते भी हैं l

अख़बार के पन्नो पर,गरीबी,भूमिहीनता,

धर्मवाद,जातिवाद,अवसरवादिता

नारी उत्पीड़न,भ्रष्टाचार की खबरें भी पढ़ते हैं

पर्यावरण का विनाश,आतंक,युद्ध के निशान,

खुली आँखों से देखते हैंl

अच्छी खबर भी है एक देश में लोकतंत्र कायम है

हम भारत के लोग वसुधैव कुटुंबकम के सपनों में जीते हैंl

विश्व गुरु बने या ना बने

देश करे तरक्की,महंगाई-बेरोजगारी से मिले निजात

मानवीय समानता,समान शिक्षा,समान चिकित्सा का हो अधिकार

बस इतना ही और क्या कुछ नया कह दूँ      ?

यही है  साल भर का  बोझ 

थके-हारे बोझ से  दबे कुचले लोग

फिर भी हम भारत के लोग,

रखते हैं आसमान छूने की सोच l

नन्दलाल भारती

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ