गांव बदर
पूर्वांचल का एक गाँव जिसमे में दर्जन भर से कम ठाकुरों हवेलीयां की थी इन्हीं ठाकुरों के बीच एक गोंड का घर, दो कहारों का बसा था l गाँव के कोने चार घर कोइरियों का था पर ये लोग खुद की खेतीबारी करते थे और शांत स्वभाव के थे l
गांव के एकदम अलग-थलग दूसरे गांव के सरहद से लगे छोटे से जमीन के टुकड़े पर पचास से अधिक दलित परिवारों की सघन बस्ती थी l जिसके आगे -पीछे बढ़ने की कोई संभावना नहीं थी क्योंकि एक तरफ दूसरे गांव,दूसरी तरफ दूसरे गांव की सीमा थी,गावों की सीमा किसी दुश्मन मुल्क की सीमा से कम नहीं थी l
दलितों की चौखटों तक ठाकुरों के खेत थेl दलितों के हिस्से पेशाब करने तक जमीन नहीं थी lधनुषनुमा दलितों की बस्ती बहुत सघन थी,अधिकतर दलित भूमिहीन थे और जमींदारों के बंधुवा अथवा खेतिहर मज़दूर थे l ये खुद को देश की भूमि का असली वारिस धरतीपुत्र कहते थे l
दलित भूमिहीन होकर भी गर्व से कहते देखो हमारे पूर्वज डिहबाबा यानि ग्राम देवता ग्राम रक्षक आज भी हैं,हमारे पुरखे देश के मूलनिवासी राजा थे पर विदेशी बहुरुपियों ने धर्म के चक्रव्यूह में उलझा कर राजा से रंक बना दिया l
अभिशापित गांव में कोइरियों की बसाहट जमींदारों की बस्ती से सटी हुई थी परन्तु कहारों की बसाहट जमींदारों के बीच में क्या उनकी गोंद मे थी l कहार लोग खुद को दलितों से उच्चवर्ण के मानते थे और क्षत्रियों और परजीवी जातियों की तरह ही ये कहार और गोंड भी दलितों के साथ छुआछूत करते थे l
कहारों का काम जमींदारों के घर में पानी भरना,घरों की साफ-सफाई करना, पशुओं का गोबर उठाना थाl गोंड-कहार शादी ब्याह मे डोली भी ढोने का काम करते थे l इनके पास कुछ खेतीबारी की जमीन भी थी,ठाकुरों के कामों से फुर्सत मिलती तो जोत-बो लेते थे l गांव के कहारों का जीवन जमींदारों की चाकरी में बीतता था l
कहार लोग गुलामी का जीवन जीते हुए भी दलितों से अच्छा बर्ताव नहीं करते थे खुद को ठाकुर समझते थे,इनके घरों में मैय्यत हो जाती थी तो ठाकुर छूते तक नहीं थे,दूर से तमाशा देखते थे जैसे नाटक हो रहा हो l दलित कन्धा न लगाए तो इनकी लाशें श्मशान तक नहीं पहुँचे पर ऐंठन ठाकुरों जैसी होती थीl
आज़ादी के बाद जैसे ही इनके बच्चों ने पढ-लिख कर शहर-प्रदेश जाना शुरू किये, जमींदारों की भौहे खड़ी होने लगीं वे धीरे-धीरे कहारों के पुश्तैनी घरों को अपनी जमीन पर कहकर कब्जा करने लगे अंततः कब्जा कर इन कहारों को गांव बदर कर दिया l
इसी गांव में पेरुआ गोंड का परिवार रहता था l पेरुआ का नाम उसके माता -पिता ने तो प्रीतम रखा था परन्तु ठाकुर जमींदारों ने उसके नाम को विकृत कर पेरुआ बना दिया था l
पेरुआ का परिवार सवर्णों के बीच में ही था पर एकदम अलग पोखरी के किनारे रहता था तो पर वह कहारों की तरह नहीं उसका दलितों के साथ पेरुआ का उठना-बैठना हो जाता था पर गांव के गोंड कहारों एवं अन्य जातियों के लिए दलितों के कुएं का पानी पूरी तरह अपवित्र था l
पेरुआ का पुश्तैनी घर पोखरी के मोहाने पर था l इस जमीन पर उसकी कई पीढ़ियां जन्मी और मरी थी l तीन तरफ से जमींदारों की हवेलियों से घिरा हुआ था l पेरूआ के परिवार के लिए कोई अलग से रास्ता नहीं था l इस परिवार को जमींदारों के घर के सामने से आना-जाना पड़ता था l
गांव के बुजुर्ग बताते थे कि गॉव के सबसे पुराने परिवारों में से एक पेरुआ का भी परिवार था l वैसे इस परिवार का पुश्तैनी काम भरसांय झोकना और दाना-भुजैना भुजना था l पेरुआ छोटा कास्तकार तो था परन्तु शादी ब्याह के मौसम में पुश्तैनी काम दूल्हा-दुल्हन की डोली ढोने और बहंगी पहुँचाने का काम भी करता थाl
पेरुआ दो बेटे जितेंद्र कुमार और बिरेन्द्र कुमार का बाप था,जिनको दबंगो ने छिनू और चिनू का नाम दे दिया था l पेरुआ तनिक होशियार था l पेरुआ ने जमींदारों के घर का काम और डोली ढोने का काम छोड़कर स्कूल में चपरासी की नौकरी कर लिया था l
पेरुआ की यह गुस्ताखी जमींदारों को बर्दास्त नहीं हुई, वे धीरे-धीरे उस पर शिकंजा कसने लगे, उसके आने-जाने रास्ता बंद करने लगे l कहारों का गांव निकाला तो पहले ही हो गया था अब प्रीतम यानि पेरुआ के परिवार के गांव बदर की बारी थी l
पेरुआ चपरासी की नौकरी छोड़कर शहर भाग गयाl शहर में कहीं किसी सिनेमा घर के सामने पान की दुकान लगा लिया l गांव में प्रीतम की पत्नी दोनों बेटों छिनू और चिनू के साथ रह रही थी l पेरुआ खानखर्च से जो कुछ रुपया बचता घरवाली के नाम मनीआर्डर कर देता था l
प्रीतम की पत्नी रजिया से जमींदारों के घर का काम होता नहीं था वह शाम को भरसांय झोकती थी l कहारों का गांव निकाला तो पहले हो गया था l तेजी से बूढ़ी हो रही प्रीतम की घरवाली रजिया का भी पैरुख थक गया था, प्रीतम गुलामी छोड़कर शहर पलायन कर चुका था, अब यह परिवार भी जमींदारों की आँख का किरकिरी बन गया था l
प्रीतम का परिवार तो गांव में सघर्षरत था पर प्रीतम पूरी तरह से गांव बदर हो गया थाl गांव के लौटन चमार की तरहl लौटन शहर गए, तनिक साफ-सुथरा कपड़ा पहनने लगे इसी गुस्ताखी के लिए गाँव के दबंगो ने लौटन चमार को बुरी तरह पीटा था l बेचारे लौटन रात के अंधेरे में भाग कर बनारस पहुँचे फिर बनारस से कलकत्ता l
सवर्ण दबंगो ने लौटन की पूरी जमीन कबजिया कर उनके बेटों को बंधुआ मज़दूर बना लिया था l गांव के सवर्ण जमींदारों से अपमानित होकर लौटन शहर ऐसे भागे की फिर लौटकर कभी नहीं आए, उनकी हड्डियां कलकत्ता की माटी में गल गयीं, उनके छोटे भाई कलटन दूर किसी दूसरे गांव में जाकर बस गए थे l
लौटन जैसा ही हाल प्रीतम का भी हुआ पर प्रीतम की जमीन पर दबंग लोग कानून के डर से कब्जा नहीं कर पाए l प्रीतम के दोनों बेटे छिनू और चिनू अल्पशिक्षित थे l
छिनू और चिनू को भरसांय झोंकना और जमींदारों की गुलामी तनिक भी पसंद नहीं थी वे दोनों शहर चले गएl
छिनू और चिनू बारी-बारी शहर से गांव आकर खेती का काम करवा जाते थे l साल भर छिनू और चिनू की घरवाली बूढ़ी रजिया के साथ रहती l
गांव के जमींदारों को लौटन का साफ कपड़ा नहीं पसंद आया था अब जमींदारों को गोंड परिवार की तरक्की तनिक भी अच्छी नहीं लग रही थी, दबंगो ने प्रीतम के परिवार को अपने बीच से गांव बदर करने में जुट गए l
प्रीतम के घर के ठीक सामने पोखरी थी और तीन तरफ से जमींदारों की हवेलियां थी l जमींदारों ने अपने-अपने घर के सामने से प्रीतम के परिवार का आना जाना बंद कर दिया, कुछ जमींदारों ने लोहे के फाटक तक लगवा दिए l पोखरी तैर कर आना जाना तो सम्भव नहीं था l
बूढ़ी रजिया चुपके से स्वर्ग लोक की यात्रा पर निकल गयी l पेरुआ के दोनों बेटो जितेंद्र कुमार और बिरेन्द्र कुमार शहर से गांव आ गए l जितेंद्र कुमार और बिरेन्द्र कुमार यानि छिनू और चिनू के पढ़े लिखे बेटे शहर में नौकरी धंधा में लग गए l छिनू और चिनू के परिवार को अपने पुश्तैनी घर में जाने के लिए जमींदारों की आज्ञा लेना पड़ता था l
दो जमींदारों की हवेली के बीच एक आदमी के आने-जाने के लिए एक सकरी सी गली एकमात्र रास्ता बची थी l इस सकरी गली के कभी भी बंद होने की संभावना थी l छिनू और चिनू को अपने ही पुश्तैनी घर में कैदी होने लगे l अब जमींदार लोग प्रीतम के बेटों को गांव बदर करने में जुट गए थे l
कहारों की तरह यह गोंड परिवार भी गांव छोड़ने के बारे में सोचने लगे क्योंकि यह परिवार दबगो के रहमो-करम के रास्ते से होकर अपने घर में आ-जा रहा था l
गाँव की एकड़ो सरकारी जमीन, पोखरी-तालाबों पर जो जमींदारों का अवैध कब्जा जमाये हुए थे शायद उनकी नजर प्रीतम की घरोही पर भी टिकी थी, खैर यह बदले हुए जमाने में ख्याली पुलाव था l
जितेंद्र कुमार और बिरेन्द्र यानि छिनू और चिनू रोज की किचकिच से तनाव में रहने लगे थे क्योंकि जिस घर तक गाड़ी मोटर आ जा सकता था, अब उसी घर तक पहुँचने के लिए चलकर आने-जाने में दिक्कत हो रही थी l
दोनों भाईयों जितेंद्र कुमार और बिरेन्द्र कुमार ने आपस में राय मसविरा कर गांव के प्रधान के पास घर बनाने के लिए गाँव समाज की बीसा भर जमीन की माँग किये पर निराश के अलावा कुछ नही मिला l
इस गांव में इतनी जमीन थी कि यदि आवन्टन हो जाता तो गांव के हर भूमिहीन को एक-एक बीघा जमीन मिल सकती थी पर गांव समाज की जमीन पर गांव के दबंगो के कब्जे में थी l ये दबंग लोग आवन्टन तक नहीं होने दिए जबकि गांव के दलित बहुल परिवार भूमिहीन गरीब, मज़दूर थेl
ये शातिर दबंग गांव की अधिकतर गांव समाज की जमीन पर कब्जा किये हुए थे पोखरी तालाब तक नहीं छूटा था l गांव समाज की कुछ परती जमीन थी जिस पर आवन्टन हो सकता था पर शातिरों ने प्रधान से साठगांठ कर सवर्ण बच्चों के लिए खेल के मैदान के नाम पर करवा लिया l
गांव के प्रधानों ने न तो दलितों को जमीन आवंटित किया न ही बीसा भर जमीन घर बनाने के लिए जितेंद्र कुमार और बिरेन्द्र कुमार को दिया l इसी गांव के भूतपूर्व ठाकुर प्रधान ने दूसरे गांव के लोगों को लाकर अपने गांव की गांव समाज की जमीन पर लाकर इसलिए बसा दिया था कि गांव के भूमिहीन दलितों को गांव समाज जमींने आवन्टित न हो पाए, गांव के दलित भूमिहीन बने रहे,अपने टोले की सघन बसाहत से बाहर निकल नहीं पाए, आपस में बीता-बीता भर जमीन के लिए लड़ते मरते रहे l
सामन्तवादी दलितों को गुलाम बनाये रखना चाहते थे,सामन्तवादी प्रधानों ने दलितों को भूमिहीन बनाये रखने की कसम खा तो लिए थे पर गैर सामन्तवादी प्रधान भी कम नहीं निकले लगे l गांव में सरकारी गांव समाज की इतनी जमीन थी की हर भूमिहीन खेत का मालिक बन सकता था पर सामन्तवादियों ने ऎसा नहीं होने दिया,खुद गांव समाज की जमीन के मालिक बन बैठे थे l
गांव के दबंग सवर्ण जाति के लोग एकड़ो गांव समाज की जमीन पर खेती कर रहे थे, तालाब पोखरे तक खुदवा लिए थे l ये गांव समाज की जमीन न भूमिहानो को आवन्टित हुई और नही बीसा भर जमीन छिनू और चिनू को घर बनाने के लिए मिली इसके उल्टे जिस जमीन पर बरसों से उनके पुरखे भरसांय झोंकते थे, वह जमीन भी गांव के नक्शे से गायब हो गयी थी l
आख़िरकार गांव बदर होकर छिनू और चिनू दलितों की मुर्दहिया से सटे अपने खेत में घर बनाकर रहने लगे थे पुश्तैनी घर में ताला जड़करl एक दिन बरसों बाद शहर से गांव गए नर्मदाप्रसाद खेतों की मेड़ पर चलते- चलते मुर्दहिया के पास बने घर को देखकर ठिठक गएl
नर्मदाप्रसाद निर्जन मुर्दहिया के पास बने घर पहुंच गए, दो कमरे का पक्का घर, घर के सामने ओसार, ओसार में दो बकरियां,एक गाय और बछड़ा बंधा देखकर नर्मदाप्रसाद आवाज़ दिए कोई घर में है l
एक महिला बाहर आयी,और बोली आप कौन?
नर्मदाप्रसाद बोले-मै नर्मदा प्रसाद हूँ, पीछे वाले गांव में मेरा घर है, आप कौन हो देवी जी l
वह सभ्य महिला आवाज़ दी अरे देखो कोई आया है l
बिरेन्द्र बाहर निकला, और बोला भैया आप? ये मंजुला, मेरी पत्नी है, कहते हुए ओसार में झट से खटिया डाल बोला भैया बैठो l
बिरेन्द्र मंजुला की तरफ मुड़कर बोला-पगली ये डॉक्टर के भाई साहब हैं, शहर में रहते हैं l
नर्मदाप्रसाद पूछे-बिरेन्द्र ये तुम्हारा घर है?
बीरेंद्र बोला -हाँ भैया, ये मेरा और अंगुली दिखाते हुए बोला -वो घर जितेंद्र भैया का हैl
नर्मदा प्रसाद पूछे-गांव छोड़कर मुर्दहिया के पास रह रहे हो?
बीरेंद्र बोला-यही तो माँ-बाप की विरासत जमीन है और जाते भी कहाँ?
नर्मदा प्रसाद पूछे-गांव की विरासत कहाँ गयी?
बीरेंद्र बोला-विरासत तो वही है भैया l तुलसीदास समरथ नहीं दोष गोसाई लिखकर दबंगो को अत्याचार करने का लाइसेंस दे दिया हैl बाबूसाहब लोगों ने आने-जाने का रास्ता बंद कर दिया है l हम दोनों भाई गांव बदर हो गए हैl
नर्मदाप्रसाद माथा पकड़ कर बैठते हुए बोले-इतना बड़ा गुनाह,घर में जाने का रास्ता बंद ?
बीरेंद्र बोला-हाँ भैया,कोई गुहार नहीं सुनने वाला l गांव में दो कहारों का घर था उन्हें तो पहले ही दबंग गाँव बदर कर दिए थे l अब हमारे भी परिवार को बाबूसाहेब लोग पुश्तैनी घर से गाँव बदर ही कर दिए l भैया गाँव बदर होना ही पड़ा क्योंकि अपने ही घर में जाने के लिए दूसरों की परमिशन लेना पड़ती थी l
बीरेंद्र और उसकी घरवाली को अपनी सदियों पुरानी पुश्तैनी घरोही से गांव बदर होने की अपार आत्मपीड़ा थी l गांव बदर होने का दर्द हवा में तैर रहा था,बीरेंद्र की आँखों में बर्फ के पहाड़ तैर रहे थे, उसकी घरवाली के आंसू प्रलयकारी बाढ़ के पानी की तरह बह रहे थे l
बीरेंद्र और मंजुला के प्रलयकारी आंसुओ से नर्मदा प्रसाद रूआँसा होते हुए बोले- बीरेंद्र संचार के इस युग में शोषण और जातिवाद पहले की तरह छिपा नहीं रह गया है,पीड़ितों की आवाज़ दूर-दूर तक पहुंच रही है l कानून अब दमन का पक्षधर नहीं, प्रतिरोध का औज़ार हो गया है।
बीरेंद्र बोला- क्रूर,शोषक,दमनकारी,जातीय अहंकार से ग्रस्त समाज से क्या उम्मीद करें भईया अब तो पुश्तैनी विरासत से दूर,गांव बदर हो गए h l
नर्मदा प्रसाद बोले-बुद्ध,अम्बेडकर,फुले,पेरि
समता की क्रांति जरूर आएगी बुद्ध की धरती पर बीरेंद्र-तुम्हारी पुश्तैनी विरासत बची है, कोई रास्ता तो जरूर निकलेगाl सोच बदलती है,समाज बदलता हैl अन्याय अब सामान्य नहीं,बल्कि दुनिया के लिए प्रश्नांकित और कलंकित हो रही है।
बिरेन्द्र बोला- हाँ भईया मानता हूँ,अब शोषणकारी और दमनकारी विचार गौरव के प्रतीक नहीं रहे बल्कि घृणा और पिछड़ेपन के प्रतीक बन गए हैं l
नर्मदाप्रसाद बोले-अभी भी शोषक समाज से उम्मीद तो नहीं कि वह स्वेच्छा से मानवीय बनेगा,जातीय अहंकार को त्याग देगा परन्तु परंपरागत जातीय अहंकार को युवा चेतना कुचल देगी l
शोषक और पाखंडी समाज लगातार सवालों, संघर्षों और बदलाव के दबाव में तो है, यही दबाव क्रूरता की छाती पर मानवता का वट वृक्ष रोपेगा l
मंजुला बोली-भईया जो होता है, ठीक होता है, बिच्छुओं के झुण्ड से बाहर आ गए, पुरखों की विरासत से बिछूड़ने,गाँव बदर का दुःख तो है पर मुर्दहिया में सुखी तो है l भइया शोषक समाज ने अन्याय किया है,देर-सबेर ब्रह्माण्ड न्याय करेगा,प्रकृति के न्याय पर भरोसा है l
नन्दलाल भारती
01/12/2025
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