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दूर जाता गांव

 
कहानी: दूर जाता गांव/नन्दलाल भारती
मै और मेरा परिवार किराये की कार से शहर  की ओर प्रस्थान कर रहे थे l कार ग्राम देवता के चबूतरे से कुछ दूर खड़ी थी, रुक-रुक कर ड्राइवर हार्न बजा देता था l हम लोग ग्राम देवता और पास में खड़ी डॉ अम्बेडकर की मूर्ति को नमन कर कार में बैठने लगे थे l
पीछे मुड़कर देखा तो  परिवार के लोग और गांव के लोग वापस मुड़ चुके थे l मेरा प्रिय भाई भी जिसके लिए पितातुल्य हुआ करता था l इसके पहले जब भी  परिवार के साथ या अकेले गांव से शहर प्रस्थान किया था, गांव के लोग और परिवार के लोग इकट्ठा छोड़ने आते, गाड़ी में बैठने तक सड़क किनारे लघु मेला खड़ा हो जाता था पर इस बार बहुत कुछ हो रहा था l
भाई साहब ने भी मुड़कर नहीं देखा था l पहले भाई साहब ऐसे न थे, मुझे मेरे परिवार को शहर विदा करते समय रोने लगते,गाड़ी जब तक दिखाई पड़ती थी, टकटकी लगाए देखते रहते थे, तब उनका बेटा साथ होता था और आज भी था पर अलग शिफ्ट हो गया था l बस कुछ महीने पहले तक तो भाई साहब ही नहीं उनके परिवार का भी पिता की तरह छाता था l
हाँ भाई साहब अपने बेटे जतिन को को एकांत में अलग ले जाकर कुछ -कुछ कान में फुसफुसाए थे l पहले ऐसा तो कतई नहीं होता था l सब भौजाई से बोलते थे, भौजाई मुझसे बोलती थी, और भाई साहब की जरूरतें पूरी हो जाती थी l
अब  बड़ी तेजी से सब कुछ बदल रहा था l अब तक तो मेरी पीठ पर बैठकर भाई साहब पर मूंछ पर ऐंठ रहे थे l  भाई साहब के सारे दायित्व  मेरे अपने थे l घर-गृहस्थी का पढ़ाई-लिखाई, दवा दारू सब कुछ का भार मेरी ही पीठ पर लदा था l अब तो बेटी की भी डोली उठ चुकी थी, बहू का तो बेटी की डोली उठने से पहले परिवार में प्रवेश हो गया था l भाई साहब का फर्ज़ निभाने में मैंने तो जी -जान लगा दिया थाl
बेटा दो पैसा कमाने क्या-लगा भाई साहब  भैय्यपन के बीच काँटों की बागड़ लगाने लगे थे, बेटे की उड़ान देकर जबकि इस उड़ान में ही नहीं भाई साहब के जीवन की हर उड़ान में मेरे ही खून-पसीने का तो पेट्रोल जला था l
 मैं सोच-सोच कर हैरान था मेरे त्याग का ऐसा प्रतिकार  भाई साहब करेंगे, सपने में भी कोई नहीं सोच सकता था l भाई साहब ने  कर दिखाया था, कांटों की बागड़ खड़ी हो चुकी थी 
मेरे मानस पटल में बचपन से कमर झुकने तक के चलचित्र चल रहे थे l इसी बीच सुधा ने कार की पिछली सीट से मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोली सुधीरजी गांव से चले तीन घंटा हो चुके हैं l रेलवे स्टेशन आने वाला पर मुंह खोले नहीं दिमाग़ में कौन सी पिक्चर चल रही है l
सुधीर बोले-सुधा,क्या बचा है l माँ-बाप थे तो अपना गांव कितना अपना सा लगता था जैसे नसों में दौड़ता लहू था पर वो अपनापन अब नहीं रहा l अपनी ही कमाई के ईंट-पत्थर का घर, महल जैसा लगता था l सुधा अब बहुत कुछ बदल गया है  l देखो मतलब निकलते ही भाई साहब ने दुलाती दे मारा l
यही दुनिया है सुधीर,कुछ लोग सिर्फ मतलब  के लिए साथ होते हैं, मतलब पूरा होते ही पीछे से लात दे मारते हैं l
हाँ सुधा भाई साहब ने तो यही किया है l जतिन अफसर क्या बना भाई साहब एहसान की तरक्की के घमंड में अजनबी हो गए l
सुधीर,जिसकी जैसी सोच, तुम्हारे त्याग से तैयार रास्ता तरक्की की ओर बढ़ता जाए, और कुछ नहीं चाहिए किसी से l
कार स्टेशन पहुंच चुकी थी, ड्राइवर किराया लेकर आंधी की तरह निकल चुका था, सुधा और सुधीर बच्चों के साथ ट्रैन में बैठ चुके थे, और ट्रेन का टाइम भी हो चला था l अब ट्रेन को सिग्नल मिल चुका था अब l ट्रेन सीटी बजाते हुए छुक-छुक करती आगे बढ़ने लगी थी l
अब अपना ही गांव बहुत पीछे, दूर बहुत दूर छूटता क्या जा रहा था पराया होता जा रहा था? 
दूसरे दिन ट्रेन शहर के स्टेशन पर खड़ी थी l आसमान पूरी तरह गुलाबी हो रहा था l सूरज आसमान से बस छाँक ही रहा था l
सुधा बोली चलो  सूरजदेवता को क्यों ताक  रहे हो?
सूरजदेवता हमें आईना दिखा रहे हैं l
क्या.....? सूरज और आईना सुधा बोली l
हाँ सुधा जो किया, जो मिला,जीवन के बीते बासठ बरसों की तपस्या और उसका प्रतिफल, सब भूलकर नये सूर्योदय का  स्वागत करो l आओ अपनी छाँव चले शहर में गांव खोजें,दूर जाता अपना गांव बहुत दूर पीछे छूट गया l दोस्तों इस कहानी में बस इतना ही l कहानी कैसी रही बताइयेगा जरूर l
नन्दलाल भारती
25/07/2025




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