कविता:दीपोत्सव/नन्दलाल भारती
ये दीपोत्सव है,दीप दानोत्सव है
उजियारे का उत्सव प्रकाश पर्व
दीपावली........l
वाह्य ज्योति प्रजवलित कर, उजियारा कर देना,
दीपोत्सव नहीं है
आंतरिक अज्ञान के अंधेरे को दूर कर देना
सामाजिक समानता बंधुत्वभाव,मैत्री के दीप,
जलाने का प्रतीक है..दीपोत्सव l
अज्ञान से मुक्ति,दुःख से निर्वाण की यात्रा
करुणा, दया,समता के प्रकाश का,
उत्सव है दीपोत्सव l
वाह्य शुद्धि पूजा,जुआ,मद्यपान,पर्यावरण प्रदूषण,
फिजूलखर्ची नहीं.. नहीं....नहीं है दीपोत्सव
वैचारिक ज्योति—समता, ज्ञान-विज्ञान
नैतिकता का जागरण,आत्मशुद्धि है दीपोत्सव l
करुणा व मैत्री का संदेश है
जाति-भेद और सामाजिक अन्याय के
अंत का उद्घोष है दीपोत्सवl
समता,भाईचारा,मानवतावादी समाज के,
निर्माण का ऐलान है,
प्रज्ञा, आत्मशुद्धि और ध्यान है
सामाजिक क्रांति, न्याय का शांखनाद है
त्याग,संयम, करुणा की पुनर्स्थापना है
दीपोत्सव....... I
बुद्ध,महावीर,ईसा,अल्लाह,भगवान
ध्यान,करुणा,मैत्री और विश्वबंधुत्व,
यही तो दिया है जगत को ज्ञान
दीपोत्सव,यही है उजियारे की पहचान l
आओ प्यारे, जग के उजियारे
खुद से करें वादा और खुद निभाएं
आंतरिक अज्ञान और अंधेरे को दूर भगाएं
प्रज्ञा, करुणा, समता और साहस का
अपने भीतर एक दीया जलाएँ
यही दीपोत्सव है,प्रकाश पर्व मनाएं
खुद से करें वादा और खुद निभाएं......
नन्दलाल भारती
09/10/2025
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