Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

धान वाली

 

धान वाली

धान के खेत पोखरी-तालाब एक हो रहे थे, चारों तरफ पानी ही पानी  l बाढ़  का पानी चौखट तक हिलोरे मार रहा था l छोटे बच्चे कागज की कश्ती चला रहे थे,कुछ बच्चे सिथोलिया खेल रहे थे l स्कूल बंद थे,स्कूल जाने वाले लड़के कटिया से मछली मार रहे थे l

 पुरुष  मड़ई में ताश खेल रहे थे l 

जमींदार लोग अनाज , एक कोठे से दूसरे कोठे पर रखवा रहे थे l जमींदारों की हवेलियों में फ्राई मछली के साथ जाम टकरा रहे थे l बस्ती की  महिलाएं चूल्हा गर्म करने की जदोजहद से जूझ रही थी l

भगवानिया के घर राशन-पताई खत्म हो रहा था l भगवानी का मर्द फुरसातीलाल, ठाकुर के खेत में हल की मूठ पकड़े बैलों के पीछे-पीछे पूरा दिन भले चले ,देर रात तक जमींदार की बेगारी भी कर ले पर घर में वही फुरसातीलाल जमींदार बन जाता था l

घर के खान-खर्च से बेखबर गांजा,दारू,मीट-मटन के अलावा कुछ नहीं सूझता था उसे l   आधा दर्जन से अधिक बच्चों के भूख की उसे कोई चिंता-फिक्र नहीं  होती थी l घर -गृहस्थी का सारा दारोमदार भगवानी के उपर होता था l 

भगवानी के परिवार के लिए अन्नपूर्णा थी l मुश्किल से मुश्किल समय में रास्ता निकाल लेती थी l भगवानी के जीते जी कभी भी उसके बच्चे फांका नहीं कियेl कम संसाधनों और अधिक मेहनत कम मजदूरी के बाद भी उसके कुठिली -कुंडा कभी खाली नहीं होते थे l भगवानी ठेंठ देहाती और अनपढ़ थी,पर बचत और बेवत करने में प्रबंधन गुरू थी l

घर में राशन की कमी बच्चों  की भूख से बिलबिलाने के बारे में सोच-सोच कर भगवानी पूरी रात करवटे बदलती रही l सूरज अभी गांव की चौखट पर दस्तक दिया ही नहीं  था कि वह दतारी   उठायी और उतर की सिवान धान के खेत की ओर चल  पड़ी l

सिवान में जलजला था, चारों तरफ पानी ही पानी थाl बच्चों का पेट भरने के लिए अधपका धान काटना भी जरूरी था l भगवानी बूढ़े बरगद के पास पहुंची तो पुराने पट चुके कुएं की जगत पर नाग देवता फन काढ़े जैसे  भगवानी का ही इंतजार कर रहे थे l भगवानी हाथ जोड़ कर आगे बढ़ गयी l 

भगवानी धान के खेत पहुंची एक बोझ धान काट कर बोझ बांध ली l धान का बोझ उससे उठ नहीं रहा था l इधर -उधर नजर दौड़ाई तो  घसियारिन रमरजिया दिखाई पड़ी, उसी की मदद से बोझ सिर पर उठायी और घर की ओर चल पड़ी l

भगवानी बरगद के पेड़ के नीचे से होकर जैसे ही सड़क पर पहुंची गोरे नाग की नजर पड़ गयी l वह अपने  मज़दूर रामदास को उसके पीछे दौड़ा दिया l

रामदास ललकारता हुआ दौड़कर आया, भगवानी का रास्ता रोककर  खड़ा हो गया और बोला- बोझ लेकर हवेली चलो ठाकुर संतनाथ बुला रहे हैं l

भगवानी बोली - क्यों हवेली जाऊँ l नहीं जाऊँ तो क्या होगा?

रामदास बोला- ठाकुर का हुक्म मानना पड़ेगा l 

भगवानी बोली-हवेली क्यों जाऊँ l मैं घर जाऊँगी l बच्चों की भूख मिटाने के लिए अधपका धान काट कर ले जा रही हूँ l

रामदास-इसीलिए तो ठाकुर बुला रहे हैं, उन्हें लग रहा  है कि तुम उनके खेत से चोरी से धान काट कर ले जा रही हो l

भगवानी बोली-देखो बाबा मैं अपने खेत का धान काट कर ले जा रही हूँ, उस गोरे शैतान का कलेजा क्यों फट रहा है l

रामदास बोला -भगवानी जानकर मजबूर हूँ तुम्हें चलना पड़ेगा l मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा l तुम सच का जूता ठाकुर के मुंह पर मार लेना l मैं ठाकुर का गुलाम हूँ l अभी तो चलो l

गुस्से में लाल भगवानी बोझ सिर पर लिए हवेली की ओर चल पड़ी पीछे-पीछे लट्ठ लिए रामदास जैसे हाँक कर ले जा रहा हो l

ठाकुर बोला- भगवानिया बोझ नीचे उतार l

भगवानी-क्यों?

ठाकुर बोला -अभी पता चल जायेगा l जबरदस्ती ठाकुर ने धान का बोझ उतरवा दिया और बोला देखो रामदास धान चोरनी पकड़ में आ गयी l

भगवानी बोली-गुलाम को साक्षी बना रहे हो l साक्षी भगवान है ठाकुर मेहनतकश लोग चोरी नहीं करते,चोरी, छल-कपट,भेदभाव,नफ़रत फैलाना ये सब हवेली और चुटिया वालों का काम है l

अंग्रेजो जैसा लाल,कद काठी वाला ठाकुर रौब से पूछा-कौन से अपने बावन बिगहा से  काटकर ले जा रही थी l  धान वाली बन रही है l

भगवानी बोली-ठाकुर तुम संतनाथ नहीं चोरनाथ हो l  

ठाकुर का खून खौल उठा वह तमतमाते बोला- चमारिन की हिम्मत तो देखो l

भगवानी-साँच को आंच कहाँ?अपने खेत से ला रही हूँ l जाओ देख आओ ठाकुर मैं यही खड़ी हूँ l

ठाकुर बोला- रामदास धान का बोझ भैसों के सामने डाल दे,वे  भैंसे भूखी हैं l

भगवानी ने हसुआ तानते हुए बोली -ठाकुर धान को किसी ने हाथ भी लगाया तो पेट फाड़ दूंगी l भले ही जेल जाना पड़े, बच्चे भूख से मर जाये पर जान ले कर रहूंगी, याद रखना l

भगवानी का रौद्र रूप देखकर ठाकुर  पीछे हटते हुए बोला-धमकी दे रही है चमारिन l

भगवानी बोली- धमकी नहीं ठाकुर सच कर दूंगी l देखना चाहते हो तो धान का बोझ भैंसों के सामने डाल कर दिखा दो l

ठाकुर पसीने-पसीने हो गया l हवेली में भीड़ जमा हो गयी l

भगवानी बोली - जो आदमी गरीबों की जमीन कब्जीया कर सरकारी काम के बदले लोगों की पॉकेट काट कर जमीन वाला हो गया हो l वही वफादार,ईमानदार मेहनतकश मजदूरों को चोर कहते हैं l वाह रे रुतबा उल्टा चोर कोतवाल को डांटे l

ठाकुर बोला-हद पार हो रही है भगवानिया l

भगवानी बोली -ठाकुर तुमने हद पार कर दिया है l मैं अपने खेत से धान काट कर ले जा रही थी l तुम मुझे चोर साबित करने के लाठी के बल पर हंकवा कर लाये हो l ठाकुर वो जमाना बीत गया जब  केरला की  दलित औरत नंगेली ने अपना ही स्तन काटकर केले के पत्ते पर रखकर  तुम जैसे लोगों  को स्तन टैक्स के रूप में  दे  दिया था। वो मजबूरी नहीं हैl अपमान के बदले, अपमान, इज्जत के बदले इज्जत मिलेगी, जरूरत पड़ी तो जान भी जाएगी l

गज भर की जबान चलाना बंद कर और हवेली से दफा हो l रामदास धान का बोझ अभी यही पड़ा है l भैंसों को डाला नहीं ठाकुर बोला l

भगवानी बोली -ठाकुर हाथ तो लगाकर देखो नंगेली अम्मा ने अपना स्तन काट कर टैक्स के बदले दी थी l मैं मुड़ी काट कर सच साबित करूंगी याद रखना l

ठाकुर बोला-जमाना देखो, कुत्ते जैसे दूम हिलाने वाले धमकी देने लगे हैं l

भगवानी-मुड़ी काट कर ले जाऊँगी धान के बदले ठाकुर याद रखना l

ठाकुर बोला-तू पागल हो गयी है, रामदास धक्के मारकर हवेली से बाहर कर चमारिन को  l

जाऊँगी तो छाती ठोंककर धान का बोझ लेकर जाऊँगी l नहीं जाऊँगी तो गोली मार दोगे क्या? हिम्मत है तो गोली मार कर दिखाओ l 

भूखे बच्चों का पेट भरने के लिए अधपका धान अपने खेत से काटकर ले जा रही हूँ,ठाकुर तुमको क्यों हैजा हो रहा है  गुस्से में लाल भगवानी बोलीl

ठाकुर का बेटा खंडित कुमार बोला -रुक अभी बंदूक लेकर आता हूँ कहते हुए हवेली के अंदर भागा l

भगवानी बोली-बाप का पता नहीं,कौन से कहार या चमार के बीज से हवेली में पैदा हुआ है, पहला दूध मेरी छाती का पिया, धौस मुझे दे रहा है l  ना शेरवा का डर ना बघवा कै, डर टिपटिपवा कै जा बंदूक ले आ, तेरी बंदूक देख लेती हूँ l


अब हवेली की मालकिन मैदान में आ गयी और बोली भगवानिया तू चमारिन है, इस हवेली की मजदूर है l तू तलवार जैसी जबान क्यों चला रही हो l

मालकिन-याद है तुम्हे जब तुमने खंडित ठाकुर जन्म दिया था तब ये लौंडा भूख से मर रहा था   तब हपतों भर दूध पिलायी थी अपने स्तन का l तब भी मैं चमारिन थी अन भी हूँ l 

आज अपने बच्चों की भूख मिटाने के लिए अधपका धान अपने खेत से काट कर ले जा रही हूँl मुझे चोरनी बनाया जा रहा है l वही लौंडा जिसकी मैंने अपनी छाती का दूध कई दिनों तक पिलायी वही मुझे बंदूक से उडाने की मुझे धमकी दे रहा है l


मेरे बच्चे भूखे है,घर में अनाज नहीं अपने खेत से धान काटकर ले जा रही हूँ, ठाकुर चोरी का इल्जाम लगा रहे हैं l ये अत्याचार हवेली को  नेस्तनाबूत कर देंगे एक दिन मालकिन भगवानी बोली l

छोटा ठाकुर खंडित बोला-रामदास बाबूजी ने कितनी बार कहा धान भैसो के आगे डाल दो, क्यों नहीं सुन रहे हो l भगवानी तुम्हारी बिरादरी की है इसलिए डर रहे हो l जानते मुस्लिम और अंग्रेजी हुकूमत में  हिंदुस्तानी सेना ने अपने ही देश के लोगों पर गोलिया बरसाकर उनके राज की रक्षा किये तुम इतना सा काम नहीं कर सकते कहते हुए खंडितकुमार धान उठाने के लिए लपका l

ख़बरदार खंडित, आज हवेली में खून बह जायेगा भगवानी बोली l

भगवानी का रौद्र रूप देखकर ठकुराइन भगवानी के सामने खड़ी हो गयी और बोली धान का बोझ लेकर जाओ भगवानी l

भगवानी धान का बोझ लेकर बस्ती की ओर चल पड़ी, जहां उसके भूखे बच्चे इंतजार कर रहे थे l ठाकुर लजा कर रह गया था l

किसी महाज्ञानी ने कहा है- ये भी समय बीत जायेगा l भगवानी और फुरसातीलाल के दोनों बेटे श्यामसरन और देवसरन पढ़-लिख कर तरक्की के रास्ते चल पड़े l उधर हवेली अत्याचार के बोझ से रसातल में मिल चुकी थी l 

एक दिन ठाकुर खंडितकुमार, देवसरन को बीच सड़क पर रोक बोला-देवसरन तुम लोग  तो हमारे परिवार को नौकरी देने लायक हो गए हो?

 बोली से गोली मारते हुए बोला l

देवसरन बोला-बोली से गोली क्यों मार रहे हो? हाँ ठाकुर, यह हमें शिक्षा से मिला है, संविधान ने शिक्षा का अधिकार दिया है l जब तक शिक्षा का अधिकार नहीं था, भूख से मर रहे थे अब तरक्की कर रहे हैं कोई दिक्क़त?

ठाकुर खंडित-मुझे क्यों दिक्क़त होने लगी l

रास्ता क्यों रोका-देवसरन पूछा l

देवसरन कभी तुम्हारे माँ  बाप मेरी हवेली में मजदूरी कर रहे थे ठाकुर खंडित बोला l

मालूम हैं देवसरन बोला -जब तुम्हें नौकरी की जरूरत लगे आ जानाl निराश नहीं करूंगा l ठाकुर ना कोई राजा है ना प्रजा, सब बराबर हैं l देश आज़ाद है, सबकी आजादी है l सोच बदलो ठाकुर सितारे बदल जायेंगे, जो आदमी खुद को ऊंचा, दूसरे को नीचा दिखाए वही सबसे नीच है ठाकुर l

ठाकुर खंडित बोला -क्या बोले देवसरन?

जो सुने ठाकुर l हम मेहनतकश माँ -बाप की औलाद है l मेहनतकश लोग हैं, गरीबी और भूख  का दर्द समझते हैl 

तुम्हें नहीं मालूम है, जिस माँ ने तुम्हें दूध पिलाकर तुम्हारी जान बचायी, जिस माँ को झूठी धान की चोरी का इल्जाम लगाकर बेइज्जत किये उसी धान वाली माँ का बेटा हूँ l  

देवसरन के उत्तर ने खंडितकुमार को निस्तब्ध कर दिया। जमींदारी की घमंडी दीवारें ढह चुकी थीं l अब खेत-खलिहान, शिक्षा और सम्मान सबके लिए खुले चुके हैंl यह अधिकार हमें संविधान ने दिया है ठाकुर, किसी धर्म ने नहीं, धर्म ने तो गुलाम बनाकर छोड़ दिया था ठाकुर l

मेरे माँ-बाप  आँखों में आँसू लिए दुनिया छोड़ तो चुके है —परन्तु अब हमारे परिवार के लिए  गर्व के दिन हैं । हम जान गए हैं  कि अब मेहनत और शिक्षा ही सच्ची जमींदारी है तुम भी जान लोग ठाकुरl

नन्दलाल भारती

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ