“चार सीढ़ियाँ उखाड़ दो!
-नन्दलाल भारती
ना रहे नामोंनिशान
ये चारों सीढ़ियाँ उखाड़कर फेंक दो
किसके घर खाना, किसके हाथ पानी,
किससे रिश्तेदारी—यह कैसी मनमानी?
जन्म के नाम पर ऊँच-नीच का विधान,
कब तक अपमान सहेगा इंसान?
युवा जाग उठा हैं अब , रूढ़ियाँ डोलीं,
नई पीढ़ी ने बदलाव की बोली बोली।
प्रेम ने तोड़ी जाति की दीवार,
समता ने खोला है नया द्वार।
ना रहे नामोंनिशान
ये चारों सीढ़ियाँ उखाड़कर फेंक दो
ये चारो सीढ़ियाँ तोड़ दो,
भेदभाव से नाता छोड़ दो!
जन्म नहीं, इंसान की पहचान हो,
हर व्यक्ति का पूरा सम्मान हो!
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
न कोई अधिकारों से वंचित हो,
शिक्षा, न्याय और अवसर पाकर
हर जीवन गरिमामंडित हो।
क्रांति घृणा से नहीं, विचारों से आए,
हर मन में मानवता का दीप जलाए।
जाति नहीं, मनुष्यता आधार बने,
भारत समता का संसार बने।
ना रहे नामोंनिशान
ये चारों सीढ़ियाँ उखाड़कर फेंक दो
चार सीढ़ियाँ टूटेंगी जब,
एक समाज बनेगा तब!
मानव-मानव एक समान—
यही क्रांति, यही अभियान!
जिस दिन जाति के कारण कोई आँसू न बहाएगा,
कोई पिता बेटी के प्रेम पर शर्मिंदा न होगा,
उस दिन पुरखों के दर्द को सच्चा न्याय मिलेगा,
और भारत का हर इंसान सचमुच आज़ाद होगा।
युवाओं अब ना रहे नामोंनिशान..........
ये चारों सीढ़ियाँ उखाड़कर फेंक दो
ये चारों सीढ़ियाँ तोड़ दो.... तोड़ दो...
nlbharatiauthor@gmail.com
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