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Dr. Srimati Tara Singh
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बुढ़िया का पेट

 

बुढ़िया का पेट

बाप रे बुढ़िया का पेट इतना भारी हो गया है कि  तीन-तीन बेटे नहीं भर पाए,बुढ़िया उठाऊं चूल्हा हो गयी है बुधिया माथा ठोंकते हुए बोली l

दूधिया बोली -बहन जब तक बहू नहीं आयी होती है, तब तक बेटा अपना रहता है l ब्याह होते ही बेटा बहू के पल्लू से बंधकर सास-ससुर का वफ़ादार बन जाता है l बेटा माँ-बाप के त्याग को भूल जाता l धरती के भगवान माँ-बाप  की रोवन रोटी हो जाती है l 

दुर्भाग्यवश बुढ़िया का बुढ़वा गुजर गया तो बुढ़िया की हालत कुत्ते-बिल्ली जैसी हो जाती है l ना जाने आजकल की माताएँ बेटियों को कौन सा संस्कार देकर विदा कर रही है अपनी बेटियों कि बहुयें आते ही अलग चूल्हा रोप ले रही है l सच बुधिया बहन अब सास-ससुर के लिए संकट काल आ गया है,दूधिया हाफते हुए बोली l

बुधिया बोली - बेचारी शांतिदेवी  भीषण संकट से गुजर रही है, बेचारी का पेट, पेट नहीं फेंकू की भरसांय हो गया है l

देखो बुधिया,शांतिदेवी कोई सती सावित्री नहीं हैं l ना दूध की धुली हैं lसास-ससुर रिरिक-रिरिक भूखे मर गए l पति तक को पीटती थी  ये शान्तिदेवी, जो घर-घर जाकर रो रही हैंl ये सब कर्म का फल तो है l 

कहते हैं कर्म से तकदीर लिख सकते हैं तो आजकल की पढ़ी -लिखी बहुयें सब कुछ समझते हुए भी सास-ससुर को रक्त के आंसू क्यों दें  रही हैl पढ़ी-लिखी बहुओं को तो ऎसा जघन्य अपराध  तो नहीं करना चाहिए l 

आजकल के बेटों की मति मरती जा रही है,घरवालियों  की बात में आकर माँ-बाप का जीवन नरक बना रहे हैं दूधिया बोली l

समय का चक्र देखो मदन ओझा के मरते ही शांतिदेवी का क्या हाल हो गया है? खेत-खेत घूमकर दाने -दाने  बिनती हैं,पेट की आग बुझाने के लिए  बुधिया बोली l

दूधिया बोली-  कल तो बेटवा-बहू से शांतिदेवी का झगड़ा हो गया था l शांतिदेवी का मझला बेटवा सुखचरण  चप्पल मारने जा रहा था  l

देखो दूधिया शांति देवी, अशांति देवी है, इन्होंने अपने सास-ससुर के साथ किया वही उनको भी मिल रहा है l दुःखी बाबा का प्राण घट में अटका हुआ था पर ये औरत अपने मर्द मदन ओझा को बाप से नहीं मिलने दी, अंधी सास तड़प-तड़प कर मर गयी दो रोटी मय्यसर नहीं हुई वो सब बददुआएं कहाँ जाएगी l अपराधिनी तो हैं शान्तिदेवी पर सुखचरण को ऎसा नहीं कहना था बुधिया बोली l

दूधिया बोली-बात तो तुम्हारी सच है  बहन,शांति देवी  ने अपना कर्म तो ख़राब कर लिया है पर ये पढ़ी-लिखी बहुये अपना कर्म क्यों ख़राब हैं, उनके बच्चे भी तो देख रहे हैं, वह भी तो यही दोहराएंगे l

बुधिया बोली-मेरी अजिया सास अच्छी सास नहीं थी l अपनी बहू की  दुर्दशा खुद करती थी और अपने बेटे से भी करवाती थी पर मेरी सास कभी बुढ़िया  का  अनादर नहीं  किया l 

लोग बताते हैं कि आखिर में मेरी अजिया सास को बहुत  कष्ट हुआ पर मेरी सासु माँ श्रवण की तरह सासु की सेवा की,जिसका फल सासु माँ को मिला, हमारे परिवार की तरक्की  सास-ससुर के आशीर्वाद का फल है  l

दूधिया आंसू गारते हुए बोली-   दूधिया बहन,तुम्हारे सास-ससुर ऊँची सोच वाले थे,हर कोई ऎसा नहीं सोचता नहीं सोचता ना l मदन बाबा  के तीनों बेटे -काम चरण,सुख चरण, जय चरण और बहुये भी पढ़ी-लिखी हैं परन्तु असभ्य और असंस्कारी माँ-बाप की बेटियां है,माँ का संस्कार ही उनका चरित्र बन गया है  l

बुधिया बोली -  तुम क्यों आंसू गार रही हो बहन l

दूधिया बोली -बहन शांति देवी l के आंसू नहीं देखें जाते,कहीं मेरी बहू शांति देवी  की बहुओं के रास्ते क्या चल पड़ी उनसे आगे निकल गयी है, पति को मारपीट कर उसकी कमाई लूट कर चोर माँ-बाप  के प्रति अपना फर्ज़ पूरा कर रही है तो मेरा क्या होगा ?

बुधिया बोली -बहन कर्म और सोच अच्छी रखो,धन-सम्पदा पर अधिकार आखिरी दिन तक रखना जो सेवा करे उसी को देकर दुनिया से रुखस्त ले लेना और क्या करोगी? 

दुधिया बोली-  सच कह रही हो, यही करूंगीl अंगूठा छाप शांति देवी,यही मार खा गयी हैं l घरद्वार और खेतीबारी तीनों बेटों में बाँट कर अपना हाथ खुद काट ली हैंlअब खेत-खेत गिलहरी की तरह दाना-दाना संचय कर रही हैl ऐसे दूरदिन  का जीवन यापन करने के बाद भी बेटा-बहू और पोती-पोता बुढ़िया पर हाथ भी साफ कर लेते हैं, ये कैसा समय आ गया है l

बुधिया और दूधिया ओलाव तापते-तापते शांतिदेवी की ही बातें कर ही रही थी कि इतने में शांति देवी भी चीखती-चिल्लाती आ गयी l 

बुधिया बोली क्या हुआ शांति बहन?

शांति देवी बोली -सुखचरण चप्पल से मारने जा रहा था, पतोहिया मारने को दौड़ा रही है, अरे बेटवा-पतोह तो मार गरिया रहे ही हैं, पोते-पोती भी पत्थर से मार रहे हैं l मैं अब कहाँ जाऊं?

अन्नपूर्णा बोली कहाँ जाओगी अम्मा लो चाय पीओ l

बुधिया बोली-शांति बहन, तुम्हारी समस्या का समाधान अन्नपूर्णा के पास जरूर होगाl

अन्नपूर्णा बोली-कैसी समस्या कैसा समाधान बुधिया माई 

दूधिया बोली- तू क्या जाने शहर से कल आयी हो दो चार दिन में चली जाओगी

बहुरिया तू शहरी है, सब तरह के लोगों से मिलती-जुलती है, शांति बहन को कोई रास्ता सुझाओं, बेटवा, पतोहू, मारते -पीटते है, दो रोटी के लिए, बुढ़िया का पेट जैसे भरसांय हो गया है l

अन्नपूर्णा बोली -अम्मा ऎसा कुछ हो रहा है तो पुलिस में शिकायत कर दोl यह अपराध है l जो मार-पीट रहे हैं वही बेटा-बहू खानखर्च कपड़ा-लता सब देंगे क्यों जिल्ल्त की जिंदगी जी रही हो? पुलिस शिकायत कर दो l

बुधिया बोली-पुलिस में केस जाने पर परिवार की इज्जत का क्या होगा?

अन्नपूर्णा बोली- क्या अम्मा कैसी इज्जत? अब इज्जत बची कहाँ है जब बेटा-बहू बुढ़िया को मारपीट रहे हैं तो इज्जत कैसी? किस इज्जत की फिक्र है ?

अन्नपूर्णा की बात सुनकर शांति देवी रोते हुए बोली -बिटिया पेट सबका होता है, मेरा भी पेट है पर  मुझ बुढ़िया का पेट इतनी बड़ी भरसांय हो गया है कि दो रोटी, तीन बेटों की कमाई से नहीं जुर रही है l मैंने तीन बेटा इसी दिन के लिए तो पैदा नहीं की थी?

बुधिया बोली- कौन माँ-बाप औलाद से ऐसी उम्मीद करता है?

अन्नपूर्णा बोली-ठीक है अम्मा पुलिस केस मत करो, गांव की पंचायत तो बुला सकती हो l

बुधिया और दूधिया एक सुर में बोली-अन्नपूर्णा बिल्कुल ठीक कह रही है l शांति बहन कल गांव की पंचायत बुला लो, अन्नपूर्णा की बात मान लो l

अन्नपूर्णा बोली-शहर होता तो अनाथाश्रम पहुंच जाती पर गांव में तो पागलों की तरह दर-दर भटकना पड़ेगा, अम्मा गाँव की पंचायत से समाधान हो जायेगा  l

शांति देवी बोली-ठीक है बहुरिया यही करती हूँ, कहते हुए उठ खड़ी हुई l

अन्नपूर्णा बोली -अम्मा देर रात हो गयी, दो रोटी खा कर जाओ,आराम करो सुबह पंचायत बुला लेना l

इतने में अन्नपूर्णा की देवरानी सुशीला बोली-हाँ अम्मा दीदी ठीक कह रही है,यही खाकर जाओ, घर जाकर चूल्हा चौका करोगी  तो कब खाओगी l पंचायत कल बुला लेना, इतनी रात को कौन पंचायत होगी? गुस्सा थूको,खाकर जाओ, सो जाना कुछ बोलना नहीं l

शांति देवी बोली-सुशीला बिटिया सालों से तुम्हारे घर की ही तो रोटी तोड़ रही हूँ l

अनपूर्णा बोली- अम्मा सास-ससुर के आशीर्वाद से कोई कमी नहीं है, दो रोटी खा लोगी तो कोई कमी नहीं होने वाली,खाकर जाओl

दूधिया और बुधिया एक सुर में बोली-अरे आज और खा लो,कल की बात कल पर छोड़ो कहते हुए उठी और अपने-अपने घरों की ओर चल पड़ी l

दूसरे दिन दोपहर में गांव की पंचायत बैठी l शान्तिदेवी पंचो के सामने  झुके कंधे, काँपते हाथ और सूनी आँखों से सब कुछ बयान कर रही थीं। 

पंचो के पूछने पर शान्तिदेवी फूट-फूटकर रोने लगी —न कोई शिकायत, न कोई बदले की भावना; बस इतना कही पंचो सबका पेट होता है, मेरा भी पेट है पर मेरा पेट भरसांय हो गया है l दो रोटी की जगह बेटवा-पतोहू का लात खाना पड़ रहा है, यही गुहार है, कोई रास्ता बता दो ताकि चैन से मर सकूं l

शान्तिदेवी की गुहार सुनकर गांव के बूढ़े देवनाथ बाबा बोले-काम चरण,सुख चरण और जय चरण तुम लोगों ने सुना होगा कि तुम्हारे खानदान की एक बुढ़िया माँ के साथ ऎसा ही उसके बेटे ने किया था, जानते हो पंचायत ने क्या दण्ड दिया था l

इतने में पंचो सहित पूरे गांव के लोग चिल्लाने लगे-पंच कलती........पंच कलतीl

पंच देवनाथ बोले-शांति रखो,इतनी जल्दी क्या है l बच्चे है समझ जायेंगे l

गांव वालों के सामने तीनों बेटों-बहुओं को समझाया गया कि माँ की भूख उनकी जिम्मेदारी है। पंचायत ने बेटों-बहुओं को  सख्त चेतावनी दिया और शांति देवी को रोटी कपड़ा की नियमित व्यवस्था करा दी। बेटों ने भोजन, कपड़ा और बीमारी की अवस्था में दवाई के इंतजाम का संकल्प पंचो के सामने लिया। कागज पत्र तैयार हुआ, पंचो ने फैसले पर अपनी मुहर लगा दिया l

इस निर्णय से शान्तिदेवी  के भीतर बड़ा बदलाव हुआ। रात में शांतिदेवी ने पहली बार मन ही मन अपने अतीत को स्वीकार किया। उसने समझ लिया कि जीवन का हिसाब-किताब देर से ही सही, पर चुकता जरूर होता है। 

अगली सुबह शांतिदेवी अपने बेटों के घर पहुँची—कमज़ोर आवाज़ में बोली,मेरे बच्चों आओ छाती से लग जाओl 

“मेरी गलती थीं…मैंने अपने सास-ससुर और पति के साथ बहुत बुरा बर्ताव किया है, जिससकी सजा मुझे मिल गयी है l मैं अपने किये पर शर्मिंदा हूँ, मैं क्या करती मेरे माँ -बाप के यही संस्कार मिले थे l मेरे बच्चों आज मैं तुम सब से माफ़ी माँगने आई हूँ।”मुझे माफ कर दो l

शांतिदेवी की  क्षमायाचना से  कठोर दिलों की दीवार पिघल गयी । तीनों बेटे-बहुओं ने भी अपने व्यवहार पर लज्जित थे, सबने शान्तिदेवी को गले लगा लिया l

शांतिदेवी के अच्छे दिन आ गए l शांति देवी के मारपीट रुक गई, अब शान्तिदेवी को नियमित भोजन मिलने लगा। धीरे-धीरे घर-परिवार के सदस्यों के बीच  संवाद होने लगा था l

कब्र में पांव लटकाये शांति देवी  के चेहरे पर वर्षों बाद खुशी का बसंत उतर गया था l कलह की जगह  घर परिवार में शुरू हो गया था सुख-शांति का संचार l 

नन्दलाल भारती





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