कहानी: ब्लैक डायमंड /नन्दलाल भारती
सूरज आसमान से झाँक ही रहा था और सचेतन बाबू मचिया पर बैठे, नीम की दातुन कुंच-कुंच कर थूके जा रहें थे l मचिया के बगल में बैठा पालतू कुत्ता शेरू कूँ-कूँ कर रहा था, जैसे उसके शरीर में कुछ चुभ रहा हो और रह रह-रहकर भौंक भी रहा था l
इतने में सतवन्ति,यानि सचेतन की पत्नी आयी और तमातमते हुए बोली तुम दातुन कर रहे हो की गंदगी फैला रहे हो, मारे सब छिलबिल कर डाले, देखो मक्खीयों का झुण्ड यही दाना-पानी पर बैठेगी, वही खाओगे-पीओगे, बीमार पड़ोगे, सफाई पर भी ध्यान दो l अभी कल गोबर से लिप-पोत कर चीकन की थी, सब थूक-थूक कर गंदा कर डाले l
अरे देखो गुलाबीब्यूटी तो आसमान से झर रही है, तुम्हारी तरह, उसी का नेत्र सुख भोग रहा हूँ सचेतन बोला था l
मस्का क्यों लगा रहे हो सतवन्ति बोली l
मस्का तो बिल्कुल नहीं l देखो उधर दूब घास पर अटकी ओस की बूँद कितनी सुन्दर लग रही है, तुम्हारी तरह गुलाबी सचेतन बोला l
अब तो इश्क मिजाजी छोड़ो, दो बच्चों के बाप हो,सयानी बिटिया ब्याह की उमर में पहुंच गयी है, तुम हो कि गुलाबी ओस में गुलाबो ढूढ़ रहे हो l
इतने में शेरू उठकर खड़ा हो गया और इधर-उधर देखकर भूकने लगा, सतवन्ति बोली शेरू को आज क्या हो गया?
कुछ कह तो रहा है पर अपनी समझ से बाहर की बात है l इतने में सयानी दो कप चाय और दो गिलास पानी, खटिया पर रखते हुए बोली आओ मम्मी-पापा चाय पी लो!
सतवन्ति बोली बेटी तू उठ गयी l
कैसी बात कर रही हो, बिस्तर में सोये-सोये चाय तो बनी नहीं है सयानी बिटिया ने चाय बनाई है l
सयानी भले ही सांवली थी, पर नाक-नक्स से बहुत अच्छी थी, उसकी सहेलियां उसे ब्लैक डायमंड कहकर बुलाती थीं l
सूरज उगने से पहले सचेतन चाय बनाई शायद ऐसा पहली बार हुआ था l सचेतन को तो नया लगा, देर से उठने वाली सयानी आज सुबह-सुबह चाय-पानी लेकर, उसका दिमाग़ चकराया, वह सयानी के हावभाव का मौन जायजा लेने लगा l सचेतन, सयानी से पूछा बेटा - आज कुछ खास है, तुम्हारा बर्थडे भी आज नहीं है, सचेतन अपने माथे पर हाथ फिराते हुए कुछ सोचने लगा l
इतने में झट से सयानी बोली नहीं पापा कुछ नहीं सब नार्मल है l
सचेतन को कुछ तो अबनॉर्मल लगा l वह कुछ बोलता तब तक,
सतवन्ति बोली-क्यों बिटिया को खिझा रहे हो, चाय पीओ l
अरे तुम भी तो पी लो सचेतन बोलाl
सचेतन और सतवन्ति चाय पीने लगे, सचेतन पहला घूँट निगलते हुए बोला सुन्दर (सचेतन और सतवन्ति का छोटा बेटा )की मम्मी आज तुम में कुछ खास नजर आया l
सतवन्ति बोली-क्या खास, वही सयानी है, सुबह जल्दी उठकर, कंघी करके तुम्हारे लिए चाय बना कर लायी है l यही खास है, खुश हो जाओ l
सुन्दर की मम्मी क्या यह कम है, यह भी बहुत खास है सचेतन बोला था l
शेरू को देखो शेरू तुम्हें देखकर भौक रहा है सतवन्ति बोली l
हाँ वह तो मैं भी देख रहा हूँ, लगता है शेरू कुछ बताना चाह रहा है सचेतन बोला l
शेरू की भाषा तो अभी तक कोई नहीं सीख पाया है क्या समझे l कहते हुए सतवन्ति बोली अरे सयानी शेरू को दूध रोटी दे दो लगता है, भूख लगी है उसको l
बात आई-गई हो गयी l अब सूरज आसमान में आग के दहकते हुए गोले की तरह उभर चुका था l पछुआं हवा चल रही थी पर हवा में रुमानियत नहीं थी l
इसी बीच एक ऑटोरिक्शा सचेतन के दरवाजे के सामने खड़ा हो हुआ l शेरू ऑटो के चारो तरफ घूम-घूम कर भूंक रहा था, शायद किसी अनहोनी का अंदाजा हो गया था शेरू को l
ऑटो से फेरीवाला बंगाली, जिसकी स्थानीय बाजार में दुकान भी थी,सजिन्दर निकलाl
सजिन्दर को देखकर,सेचन खड़ा हुआ और बोला तू तो सजीन्दर है ना, तू इतना बन संवर कर कहाँ से आ रहा है और यहाँ कैसे?
ऑटो की घर्रघर्राहट सुनकर दो चार लोग सचेतन के दरवाज़े पर इकट्ठा हो चुके थे l
सजिन्दर बोला -बाबूजी आपसे मिलने आया हूँ l
सचेतन पूछा क्यों?
बाबूजी ब्लैक डायमंड का हाथ मुझे सौंप दो l
सचेतन के दरवाजे पर अब भीड़ लग चुकी थी, लोगों की भौहें तनी हुई थी l
भीड़ से बाहर निकलकर सुदर्शन पूछें-किस ब्लैक डायमंड को मांगने आये हो बंगाली मानुष l
सजिन्दर, सचेतन के आगे घुटने के बल बैठकर बोला -सयानी का हाथ बाबूजी l
सचेतन और सतवन्ति काठ का पुतला बन चुके थे l भीड़ लाठी पर हाथ फेर रही थी बस सचेतन के इशारे की कमी थी l
सुदर्शन तनिक होशियार थे, वे बोले कैसे कोई बाप एक अनजान को अपनी बेटी का हाथ दे सकता है l
काका मैं कहाँ अनजान हूँ, आपकी बाजार में बरस भर से मेरी दुकान है,फेरी में कास्मेटिक का सामान दोपहर तक बेचता हूँ, दोपहर के बाद दुकान पर बैठता हूँ l कलकतिया हिन्दू ठाकुर हूँ, कलकत्ता में मेरे माँ-बाप भाई-बहन सब रहते हैंl
सचिन्दर प्रूफ भी दिखा दिया l
सजिन्दर आगे बोला-हम दोनों छः महीने से रिश्ते में हैं l सजिन्दर गांव वालों के आगे बोला , ब्लैक डायमंड को कभी तकलीफ नहीं होने दूंगा l इतने में सयानी भी आ गयी ,वह अपनी माँ सतवन्ति के कान में कुछ बोली l
सतवन्ति पति सचेतन के को धीरे -धीरे कान में कुछ बतायी l अब क्या गर्माहट पर ओले पड़ गए थे l सजिन्दर ऑटो में बैठकर वापस हो गया l उसके जाते ही बातों के बवन्डर शुरू, उसी गांव में ही नहीं दूर-दूर के गावों तक बवंडर खबर पहुँचा दिया कि सचेतन की ब्लैक डायमंड, गोल्डेन बॉय सजिन्दर के प्यार में फंसी है सालों से l
सचेतन के घर में महाभारत शुरू,बाप सचेतन तैयार न था,ब्लैक डायमंड की माँ सतवन्ति अब सयानी के साथ खड़ी थी,शायद बात कुछ ज्यादा गंभीर थी l
सचेतन ने भी हथियार डाल दिया, उसे कुछ आशंका सता रही थी l गांव के कुछ मानिंदो के साथ बैठक कर आनन-फानन में सयानी और सजिन्दर का ब्याह मंदिर में सम्पन्न हो गया था l
सजिन्दर,हट्टा-कट्ठा गोरा सा गभरु जवान था, सयानी के हम उम्र भी था l सचिन्दर की स्थानीय बाजार में जनरल स्टोर की दुकान थी, उसी की ऊपरी मंजिल पर कमरा भी किराये पर लेकर रह रहा था l
अब सयानी अपने पति सजिन्दर के साथ रहने लगी थी, दोनों का जीवन हंसी-खुशी से बीत रहा था, इधर माँ-बाप भी खुशी और सकून में जी रहे थे l
शादी के बस आठवें महीने में ही बेटा पैदा हो गया, अब और खुशी थी सजिन्दर और सयानी के जीवन में, दो साल बड़े मजे में बीता फिर एक रात सजिन्दर गायब हो गया, दुकान का पूरा सामान रातो-रात गायब, सयानी बच्चे के साथ घर में सोयी रह गयी थी l आस पड़ोस को कुछ भी पता नहीं l
महीने बीत गए, पुलिस थाना भी हुआ,सजिन्दर के दिए पते पर तहकीकात भी हुई, सब फर्जी निकला l कोई सुराग नहीं मिला आखिर में मालूम हुआ कि वह विदेशी घुसपैठिया था सजिन्दर जो अपनी नई पहचान बदलकर रह रहा था l
बेशकीमती ब्लैक डायमंड पूरी तरह क्रैक हो गया, टुकड़ो में खंडित हो चुके ब्लैकडायमंड का अब कोई मोल नहीं बचा था, दोस्तों इस कहानी में बस इतना ही l
नन्दलाल भारती
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