सामाजिकक्रांति, समानता एवं सामाजिक न्याय के अमर शहीद- महर्षि शम्बूक...... नन्दलाल भारती
सर्वविदित है कि शम्बूकऋषि,तपस्वी,जनजाग्रति करने वाले एवं शूद्रों के बीच शिक्षा की अलख जगाने वाले दशरथ पुत्र राजा राम के साम्राज्य में शूद्र ऋषि थे, जिनकी हत्या राजा राम ने कर दी थी l
शम्बूक ऋषि के जनजागरण एवं शिक्षा की ज्योति जलाने के विरुद्ध ब्राह्मणों ने उन पर लांछन लगाया कि शम्बूक के तप, जनजागरण एवं शूद्रों को शिक्षादान देने से भगवान क्रोधित हो गए है, और ब्राह्मणो के पुत्र मर रहे हैं, इसी लांछन की वजह से राजाराम जिन्हे भगवान भी कहा जाता उसी भगवान ने शम्बूक ऋषि का सिर धड़ से अलग कर दिया था l
मैं आपको महान ऋषि शम्बूक के भारतीय समाज में समानता प्रतीक के विषय में यह आलेख लिखने का साहस कर रहा हूँ l यह लेख मेरे यूट्यूब चैनल पर वीडियो के रूप में मेरी आवाज़ में उपलब्ध भी होगा l मेरे वीडियो बिना किसी एडिटिंग एवं रिटेक होते हैं, कुछ त्रुटियां जरूर हो जाती है, त्रुटियों को नजरअंदाज कर आप मूल विषय पर ध्यान देने का कष्ट करियेगा l
सर्वविदित है कि महर्षि शम्बूक के विषय में बहुत कुछ पढ़ने को नहीं मिलता l विगत कई बरस पहले जबलपुर (मध्यप्रदेश) से एक क्वार्टरली मैगज़ीन प्रकाशित होती थी अब कुछ जानकारी नहीं है l बरसों पहले मुझे एक प्रति प्राप्त हुई थी फिर कभी नहीं मिली, प्रकाशित होती है या नहीं मुझे जानकारी नहीं है l
शम्बूक ऋषि के बारे में कुछ जानकारी भारतीय संस्कृति वेद, उपनिषद, पुराण और महाकाव्यों में मिलती है उन्हीं पर आधारित यह लेख है जिसे मैंने ऑनलाइन सर्च कर तैयार कर आप तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा हूँ l वैसे मेरा वेद, उपनिषद, पुराण से कोई नाता तो नहीं है परन्तु महर्षि शम्बूक से तो है। इसीलिए सर्च पढ़ने और लिखने की कोशिश किया हूँ l
भारतीय संस्कृति जितनी विशाल और गहन है, उतनी ही विविधताओं एवं भेदभाव से से भरी हुई भी है। इन तथाकथित महाग्रंथों में वर्णित कथाएँ केवल धार्मिक या आध्यात्मिक दृष्टि से कितनी महत्वपूर्ण हैं, इस मुद्दे को दूर रखते हैं, हाँ धार्मिकग्रन्थ उस कालखंड के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आयामों को उजागर तो जरूर करते हैं।
कहा जाता है कि वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड कथा में वर्णित शंबूक ऋषि की कथा भी ऐसी ही एक घटना है, जो सदियों से सामाजिक न्याय, समानता और वर्ण-व्यवस्था के विमर्श का केंद्र बनी हुई है।
शंबूक ऋषि का राजाराम के हाथों हत्या, भारतीय मूलनिवासियों को जरूर सोचने पर मजबूर करती है कि – क्या ईश्वर की आराधना केवल किसी एक वर्ण का विशेषाधिकार थी? क्या तपस्या और आध्यात्मिक साधना केवल उच्च वर्ण के लिए आरक्षित थी? यदि ऐसा था तो इसका मानव समाज पर क्या प्रभाव पड़ा? सच आज भी शोध का विषय बना हुआ है, यह मुद्दा महर्षि शम्बूक की हत्या को देखते हुए कई सुलगते सवाल खडे करते हैं l
आज देश में लोकतंत्र हैं,देश का संविधान लागू है,चुनी हुई सरकार हैं तब भी यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है,जबकि लोकतांत्रिक भारत में समानता, न्याय और स्वतंत्रता की बातें तो होती हैं पर रामराज्य की कल्पना की जाती है, सोचिये जिस दिन मनुस्मृति आधारित शासन हो जायेगा, बहुजन समाज (दलित, आदिवासी,ओबीसी) समाज का क्या हाल होगा जरूर सोचियेगा l
शम्बूक ऋषि वाल्मीकि वर्णन रामायण के उत्तरकांड में मिलता है,वाल्मीकि रामायण के उत्तराखंड की कहानी के अनुसार राजाराम, जिन्हें भगवान भी कहा जाता है,आज धर्मानधता के शिकार लोग श्रीराम के नारे लगाते थकते नहीं हैं, कई दाढ़ी वालों की दाढ़ी भी नोंची डाले हैं l इस देश में उसी श्रीराम के शासनकाल में ब्राह्मण पुत्र की अकाल मृत्यु हो गई तो ब्राह्मण ने राजाराम के दरबार में जाकर विधवा विलाप किया और कहा कि हे राम-आपके राज्य में अधर्म हो रहा है, तभी ऐसी अनहोनी हो रही है।
राजाराम ने अपने गुरुओं और मंत्रियों से इसका कारण पूछा, तब धर्मान्ध ज्ञानियों, मुनियों ने कहा कि इस काल में किसी शूद्र ने कठोर तपस्या प्रारंभ कर दी है, और वही तपस्या मृत्यु का कारण बन रही है। कहते हैं राम ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा या महर्षि शम्बूक विरोधियों ने बताया कि उन्हें एक तपस्वी दिखाई दिए, जो कठिन तपस्या में लीन थे। वे ऋषि कोई और नहीं महर्षि शंबूक थे – जिन्हें शूद्र वर्ण का बताया गया। इस विषय पर गावों में नाटक भी खेला जाता था, जब गांव में नौटंकी खूब प्रचलित थी -जिस नाटक का नाम होता था शम्बूक का वध!
उस नाटकों में यह संवाद होता था जो रामायण के उत्तराखंड में मिलता है, राजा राम, महर्षि शम्बूक से सवाल करते हैं – "हे तपस्वी! तुम कौन हैं और किस प्रयोजन से यह तपस्या कर रहे हैं?"
महर्षि शंबूक क्या उत्तर देते हैं आप भी सुनिए,
"हे राजन! मैं शूद्र कुल में पैदा हुआ हूँ। मेरी इच्छा है कि तपस्या के बल पर मैं स्वर्गलोक की प्राप्ति करूँ। मेरी तपस्या का यही उद्देश्य है राजा राम l
महर्षि शम्बूक की बात सुनकर राजाराम क्रोधित होकर बोले –
"हे शूद्र ! तप करना तुम्हारे लिए वर्जित है। तुम्हारे तप के प्रभाव से ब्राह्मण बालक की मृत्यु हुई है और राजा राम ने तलवार से ऋषि शम्बूक का वध कर दिया था l ऋषि शम्बूक के दुश्मन के अनुसार महर्षि शम्बूक का वध होने के बाद मृतक बाभन पुत्र जिंदा हो गया था, जो छल के अलावा कुछ नहीं लगता,जिस छल के वशिभूत होकर राम ने महर्षि शंबूक का कत्ल कर दिया l सोचिये, क्या भगवान एक ऋषि का वध कर सकते हैं, ये राम वर्णवादी राजा के सिवाय और क्या हो सकते हैं, पाठक भाईयों-बहनों आप विचार कीजियेगा जबकि शम्बूक ऋषि तो आध्यात्मिक, समानता एवं सामाजिक न्याय के पक्ष धर थे l
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड की यह कथा कई सवाल खड़ा करती है –मसलन,क्या तपस्या का अधिकार केवल ब्राह्मण को था या क्षत्रिय और वैश्य को भी था? क्या ईश्वर और मोक्ष प्राप्ति का अधिकार जाति पर निर्भर करता है? क्या सचमुच यह ऐतिहासिक घटना है, या शूद्रों के दमन की प्रतीकात्मक कपोल कलपित दृष्टांत भर है, जिससे डरा सहमा, आतंकित शूद्र/बहुजन समाज चुपचाप गुलामी करता रहे, और भी कई सवाल उठ सकते हैं, जो अनुत्तरित है l आज के पढ़े-लिखे शूद्र/बहुजन समाज को आज विज्ञान के युग में शोध एवं अध्ययन कर धर्म ग्रथों की असली सच्चाई को उजागर कर, तथाकथित धार्मिक पाखंडियों को ललई सिंह यादव की तरह एक-एक धर्मग्रन्थ का पोस्टटमार्टम कर देना चाहिए, जिससे परजीवी किस्म के लोग जो संविधान बदलने का षणयंत्र करते हैं वही लोग समानतावादी धर्मग्रन्थो की रचना करने पर मजबूर हो जायेl सदियों से मानवतावाद की बाट जोह रहा देश मानवतावाद की डगर पर चल पड़े l जनजागरण,सर्वशिक्षा एवं सामाजिक क्रांति के योद्धा, गुलामगिरि एवं अन्य पुस्तकों के रचयिता ज्योतिबा फुले और भारतरत्न, भारतीय संविधान के निर्माता एवं अन्य कई सामाजिक सुधारकों ने सामाजिक उत्पीड़न कहा है, सच भी यही है l डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने सच ही कहा है कि शम्बूक ऋषि की हत्या इस सच्चाई का प्रतीक है कि प्राचीन ब्राह्मणवादी समाज में शूद्रों को आध्यात्मिक उन्नति के अधिकार से वर्जित किया गया था l प्राचीन काल में भी राम के हाथों शम्बूक ऋषि की हत्या जातिगत भेदभाव,नफ़रत,उत्पीड़न के खिलाफ ज्वलंत संघर्ष की सुलगती दास्तान है l वाल्मीकि रामायण में वर्णित शंबूक की हत्या को आधुनिक काल में सामाजिक न्याय एवं संघर्ष के संदर्भ में याद किया जाना चाहिए l
पाठक भाईयों बहनों,भारतीय साहित्य एवं लोक कथाओं में शंबूक ऋषि का चित्रण विद्रोही संत के रूप किया गया है,परन्तु भारतीय दलित साहित्य में शंबूक को नायक की तरह प्रस्तुत किया गया है, जिस शम्बूक ऋषि ने ब्राह्मणवादी एवं अन्यायपूर्ण व्यवस्था को चुनौती दी थी।दलित कवि दया पवार, नामदेव ढसाल एवं कई दलित साहित्यकारों ने शम्बूक ऋषि को समानता के शहीद" के रूप में विश्व पटल पर चित्रित किया है। भारतीय लोककथाओं में शंबूक का वध सामाजिक बंधनों के खिलाफ विद्रोह के रूप में लिखा गया है जबकि शम्बूक ऋषि आध्यात्मिक,समानतावादी, एवं सामाजिक न्याय के क्रन्तिकारी ऋषि थे l
शंबूक ऋषि के संघर्ष की सुलगती दास्तान भारतीय इतिहास और समाज का एक महत्वपूर्ण आईना प्रतीत होता है। इससे सीख मिलती है कि किस प्रकार वर्णव्यवस्था के नाम पर समाज में भेदभाव और असमानता को वैध ठहराया जाता था, जिसे आज भगवान मानकर पूजा जाता है, जिसके गुणगान में ग्रन्थ लिखे गए है, वही राम वर्णव्यवस्था की अफीम के नशे में शम्बूक ऋषि की हत्या कर देते हैं, ये कैसे भगवान है, कैसा विधान है?
विज्ञान के युग में जब देश एक समानतामूलक समाज की ओर अग्रसर हैं, तो शंबूक ऋषि का बलिदान दुनिया को संदेश देती है कि आध्यात्म,साधना, शिक्षा और ईश्वर-भक्ति पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता। मनुष्य की पहचान उसकी जाति से नहीं उसके कर्म और गुण से होनी चाहिए l महान क्रन्तिकारी शंबूक ऋषि जगत में पाखंडवादी वर्णव्यवस्था के विद्रोही ऋषि,समानता के योद्धा,और सामाजिक शहीद के रूप में सकल विश्व में सम्मान के साथ सदैव याद किये जाते रहेंगे l
नन्दलाल भारती
30/08/2025
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