कहानी: अधजले पन्ने
मूसलाधार बरसात, पक्का मकान, छत के नाम पर लोहे के गाडर के उपर मांटी, बस और कुछ नहीं l बरसात के पानी का बेरोकटोक आना अंदर था l
उपर से कड़कती बिजली के डर से मरजूदादा का कलेजा मुंह में आ जाता था l मरजूदादा दादा छाता लगाए खंडहरनुमाघर में अपनी किस्मत की किताब के अधजले पन्ने बांचने को मजबूर थे l
मरजू दादा का परिवार अमीर तो नहीं था खैर कमेरी दुनिया के लोगों को धर्म और धर्म के ठेकेदारों ने कहाँ अमीर बनने लायक छोड़ा था l
मरजूदादा के नाम कुछ पुरखों की जमीन बची थी,वही जीने-खाने का आसरा थी l
मरजूदादा दो बेटों-सगुन और सदुन के बाप थे l उनकी पत्नी शोभराजी घरेलू कामकाजी सभ्य महिला थी l बड़ा बेटा सगुन लिखने -पढ़ने लायक स्कूली शिक्षा प्राप्त कर जिगरी दोस्त श्रीलाल के साथ दिल्ली चला गया l
सगुन ट्रक ड्राइवर बन गया l श्रीलाल किसी वकील के दफ्तर में नौकरी कर लिए l
मरजूदादा के नाम अब मनिआर्डर आने लगा l सगुन और सदुन का ब्याह गौना भी हो गया था l अब मांटी के घर के बगल में ही ईंट गारे का पक्का मकान भी बनाने लगा पर सदुन की घरवाली चन्द्राणी की सुंदरता की भेंट चढ़ गया l
चन्द्राणी मुंह से भले नहीं बोलती थी,उसकी नशीली आँखे बोलती थी l और ऐसी बोलती की दिल के अंदर उतर जाती थी उसकी अनकहीं बातें l
यह सुंदर अल्हड़ मदमस्त चंन्द्राणी गाँव के सांवले, अच्छी कद काठी के ठाकुर मनकेन्दर सिंह के प्यार में फंस गयी l मनकेन्दर जवान बेटी और बेटे का बाप था l उसकी सएक खूबसूरत पत्नी भी थी, सम्पन्न जमींदार परिवार था l
चन्द्राणी तो सुन्दर थी पर उसकी बोलती आँखे और भी सुन्दर थी l चन्द्राणी भी फूल से दो छोटे -छोटे बच्चों की मां होकर भी उसके पांव फिसल गए l
चन्द्राणी की आँखों के नशे में मनकेन्दर गया l कहते हैं न भूख न देखे जूठा भात, नींद न देखे टूटी खाट, इश्क न देखे जाति-कुजाति यही किया मनकेन्दर ने, चन्द्राणी के इश्क बउरा गया l
शुरुआत में कभी -कभी आते-जाते दोनों खेत की मेड़ो पर मिलते थे,धीरे -dhire खेतों की मेड़ से गुजरते-गुजरते इन्द्राणी के देह की गंध और आँखों का नशा ठाकुर के दिलो-दिमाग़ पर चढ़ गया l
दोनों खेतोँ के मेड़ से मिलते-मिलते, मक्का के खेत, अरहर के खेत, गन्ने के खेतों में अपने प्रेम की पतंग की डोरें ढीली करने लगे l
सदुन दिल्ली की सब्जी मंडी में अपना रोजी- रोजगार कर रहा था l घर में बूढ़ी सास-ससुर, और दो छोटे बच्चे और नशीली आँखों वाली चन्द्राणी थी l
सगुन और सदुन दोनों भाई बरोबर चार-छः महीना में गाँव आते-जाते थे लिए सगुन का परिवार उसके साथ रहता पर आना जाना बराबर था, सगुन का गांव से अथाह लगाव जो था लिए
ठाकुर मनकेन्दर और चन्द्राणी के प्रेम की बुदबूदाहट दूर तक सुनायी देने लगी थी
खेतों में मिलते,मोहब्बत की पतंग उड़ाते-उड़ाते, ठाकुर रात के अँधेरे में चन्द्राणी के साथ रात गुजारने के लिए चोरी-छिपे पहुंच जाता l ऐसी बातें कहाँ छिपती हैं, धीरे-धीरे कान गुदगुदाने तो लगती हैं l
लाख छिपाओ पर तालाब की सड़ी मछली की तरह अपवित्र लव स्टोरी हवा में बहने लगी थी लि
मनकेन्दर और चन्द्राणी का प्रेममिलन कभी थमा नहीं l अब तो मनकेन्दर की रात के अँधेरे में चन्द्राणी के साथ रात बिताने की लत लगने लगी थी l ठाकुर बिरादरी थी कि मानने को तैयार न थी,ऊँची जाति,ऊँची नाक का सवाल जो था l
बस्ती वालों ने मनकेन्दर को चन्द्राणी के कमरे में ही पकड़ने का जाल बुना l
आख़िरकार मनकेन्दर पकड़ा गया, बस्ती वालों ने नीम के पेड़ में बांधकर अच्छी तरह धुलाई किया, उधर औरतों ने चन्द्राणी की भी l
मंझारी काकी ने जो लात मनकेन्दर के मुंह पर मारी थी, वह लात ऊँची बस्ती के लोगों की नाक का सवाल बन गया था l
कहते हैं ना लोमड़ी खाल बदलती है, वही हाल हुआ दोनों नहीं बदले l
बड़े लोग बड़ी बातें, पर यह लव स्टोरी मरजू दादा और उनकी बुढ़िया के लिए जान लेवा साबित हुई, सदुन अर्धविक्षिप्त हो गया l
ड्राइवर साहब सगुन गांव छोड़ तो दिए, पर उन्हें शर्म के समंदर ने धीरे -धीरे निगल लिया l
चन्द्राणी और मनकेन्दर के अवैध प्रेम प्रसंग में
मरजूदादा के सपनों की दुनिया जलाकर राख हो गयी, चन्द्राणी अवैध रिश्ते से l
समाज इस नाजायज प्यार को पहचान भी तो नहीं दे सकता था l जनाजा तो हाशिये के परिवार का निकला l उधर तो न मनकेन्दर नहीं उसके परिवार पर कोई असर पड़ा l ऊँची जाति-ऊँची प्रतिष्ठा के नीचे पूरे मरजूदादा और उनके परिवार के मान-सम्मान की खिलखिलाती दुनिया अवैध प्रेमप्रसंग के भूचाल की भेंट चढ़ गयी l
कुछ बचा था तो ईंट गारे पर ख़डी पक्की दीवारों का खंडहरनुमा, किताब के अधजले पन्नो जैसा हवा के झोंको में फड़फड़ाता मकान और कुछ नहीं l
इस कहानी में बस इतना ही l
नन्दलाल भारती
04/07/2025
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