नीचचेता
अप्रैल की सुबह दफ़्तर की दीवार टंगी घड़ी टकटक कर आगे बढ़ रही थी । संस्थान के इमारत की दीवारें तपने लगी थी l एसी फुल स्पीड पर चल रहा था,नीचचेता शिकारी प्रवृति बड़े साहब दुहारिका प्रसाद का कमरा शिमला हो रहा था l वही बगल वाले कमरे में दफ्तर के भार से दबा गजेंद्र पसीने से तर -बतर हो रहा था, पंखा हवा नही आग उगल रहा था l
झाड़ू वाली बाई झाड़ू -पोंछा कर, टेबल कुर्सी साफ कर जा चुकी थी l गजेंद्र रात भर करवटे बदलता रहा, उसकी आँखों से नींद दूर जा चुकी थी l पत्नी पेट दर्द से रात भर चिल्लाती रही, हाल ही में उसकी पत्नी माधुरी के पथरी का ऑपरेशन हुआ था, डॉ ने पथरी के ऑपरेशन की जगह आंत काट दिया था,असहनीय दर्द तो पत्नी को होता पर यह दर्द गजेंद्र के पूरे परिवार के लिए जानलेवा था l
रात भर बीमार पत्नी के सिरहाने बैठने के बाद भी वह समय से पहले दफ़्तर पहुँच गया था, वैसे दफ्तर के बाहर के कुछ लोग कहते सूरज भले ही देर से उगे पर गजेंद्र समय से पहले दफ्तर पहुंच ही जाता है l
पड़ोसी कहते समय की पाबंदी तो कोई गजेंद्रजी से सीखे,पर गजेंद्र को ईनाम नहीं तिरस्कार मिलता था l अप्रैल का महीना वैसे पिछले कई बरसों से रुला रहा था, पर हर दिन हर महीना गजेंद्र के लिए नया जोश और उत्साह लेकर आता l मार्च क्लोज़िंग के बाद अप्रैल का महीना दफ्तर के अधिकारियो और कर्मचारियों के वार्षिक चरित्रावली लिखने का होता है,वही चरित्रावली, जो पिछले पचीस वर्षों से उसके प्रमोशन का गला घोंट रही थी, उसके साथ के जॉइन किये लोग ऑफिसर बन गए थे परन्तु उच्च शिक्षित एवं व्यावसायिक शिक्षित गजेंद्र क्लर्क के पद पर ही कलम घिस रहा था l
कमरे के भीतर अशूद्र बड़े साहब,दुहारिका प्रसाद जुहाड़ अपनी घूमने वाली कुर्सी पर बैठे थे। माथे पर तिलक, मेज़ पर गीता, और होंठों पर वही पुरानी घृणा। गजेंद्र को देखते ही उनकी आँखों में तिरस्कार उतर आया।
“आ गए तुम?”
उन्होंने चश्मा उतारकर मेज़ पर पटका— तुम क्या देखते हो? टेबल पर धुल जमीं है, बाई चली गयी,चपरासी शुक्रवार को काम नहीं करता, टोपी लगाकर घूमता रहता है l देखो बाई दिखाई पड़ जाये तो बुला कर मेरे पास लाना, तुम कुछ नहीं मैनेज कर पाते, दूसरों से अपनी तुलना करते रहते हो l
आजकल कुछ ज्यादा फस्ट्रेट हो रहे हो, एक बड़ा साहब जो सिर्फ जातीय योग्यता के बल पर एरिया से स्टेट प्रमुख के पद पर बैठा था,जबकि इसी संस्थान में स्नातक तक शिक्षित दैनिक वेतन भोगी चपरासी थे, यह बंदा स्टेटप्रमुख वाह रे जातिवाद का घिनौना खेल l
गजेंद्र जैसे ही अपनी कुर्सी पर बैठा महिला सफाईकर्मी आ गयी और बोली गजेंद्रबाबू पगार दे दो l
गजेंद्र बोला अम्मा बड़े साहब तुमसे बात करना चाहते हैं जाओ मिल कर आओ, अम्मा को देखकर मि. जुहाड़ कालबेल पर बैठ गए, चपरासी दौड़कर आया गजेंद्र से बोला बड़े बाबू बड़े साहब बुला रहे हैं l
“तुम जैसे नीची जाति के नीच लोग जितनी भी मेहनत कर लो, रहोगे वहीं के वहीं। देखो बाई टेबल पर धूल जमीं हुई है कि नहीं परन्तु साहब का साफ -साफ इशारा गजेंद्र की तरफ था l
बाई बोली -क्या बात कर रहे हो साहब? कहते हुए वह हाथ टेबल पर रगड़ कर झाड़ दी और बोली देखो साहब कौन सी धूल है l अरे साहब मेरा काम पसंद नहीं है तो कहो तो अभी से काम छोड़ दूं l मैं तो गजेंद्र बाबू के कहने पर काम कर रही हूँ l
साहब मेरे दो बेटे साहब हैं, मैं झाड़ू पोंछा करके उन्हें साहब बनाई हूँ, इसलिए यह काम नहीं छोड़ रही हूँ l
अब क्या अत्याचारी साहब के अंदर का शैतान जाग गया वह बोले - नीचजाति नीच लोग तुम सिर्फ काम करने के लिए हो, सेवा के लिए हो l तुम क्या जानों,दफ़्तर के बड़े साहब की कुर्सियाँ सबके लिए नहीं होती l
गजेंद्र के कानों में जैसे गरम शीशा उतर गया। यह अपमान नया नहीं था, पर हर बार उतना ही चुभता था। उसने धीमे से कहा—मेहनत, वफादारी और ईमानदारी का फल कहाँ मिलता है l जातीय नफ़रत की दुनिया में निष्पक्षता कहाँ?
दुहारिका प्रसाद जुहाड़ -आधे गाले हँसे, उनकी हँसी की गुंज सूखी हड्डी के टूटने जैसी थी। दुहारिका प्रसाद जुहाड़ गजेंद्र की फाइल उठाये और लाल पेन से फिर वही शब्द लिख दिए—जो पिछले पचीस से लिखा जा रहा था -चरित्र एवं कार्यशैली असंतोषजनक’।
उस एक वाक्य ने गजेंद्र की छब्बीस साल की मेहनत, उसके बच्चों की पढ़ाई, बीमार पत्नी की दवाइयाँ और बूढ़ी माँ -बूढ़े बाप की उम्मीद—सब पर कालिख पोत दी। यह जानकर गजेंद्र की आँखों से आंसू गिर पड़े थेl
गजेंद्र की ईमानदारी, मेहनत और समर्पण के तिरस्कार पर अप्रैल के महीने में बारिश हो गई थी, जैसे आसमान भी गजेंद्र के अपमान पर रो पड़ा हो। वह अन्याय और अत्याचार का विष पीकर भी चुप था क्योंकि वह जानता था कि ऊँची जाति के अंधे -बहरे और गूंगों के बीच उसकी कोई सुनने वाला नहीं था l
सवाल तो बहुत थे पर जबाब कोई देने वाला नहीं था l वह जानता था कुछ सवालों के जवाब नहीं होते,सिर्फ सहन करना होता हैl
गजेंद्र को याद आया—
वह दिन, जब गाँव के स्कूल में पहली बार स्कूल से अशूद्र मास्टर ने उसे अप्रैल की तपती धूप और लू मे बैठने का दंड दिया l मास्टर के स्कूल के पहले दिन के अत्याचार हारकर स्कूल छोड़कर भाग गया था l
मज़दूर बाप का बेटा गजेंद्र ने स्कूल नहीं छोड़ा बल्कि दूसरे गाँव के हरिजन प्राइमरी पाठशाला से पाँचवी तक की शिक्षा लेकर आगे की पढ़ाई दूसरे स्कूलों से लिया l आखिरकार बीए की परीक्षा थर्ड डिवीज़न पास कर पाया था, उसका पढ़ाई के प्रति समर्पण तेज दिमाग़ जातिवाद की भेंट चढ़ गया था, खुशी की बात थी कि थर्ड डिवीज़न तो पास हो गया था, जो फर्स्ट डिवीज़न से कम नहीं था l
ग्रेजुएट की पढ़ाई तक उसके लिए ज्वालामुखी के मुहने पर बैठने जैसे ही थी, बहुत संघर्षपूर्ण जीवन था l आगे की उच्च शिक्षा भी आसान तो कतई नहीं थी l
बेरोजगारी का दर्द डेढ़ पंचवर्षीय योजना तक ढोना पड़ा था तब बेरोजगारी का दाग धुला तो था पर नौकरी की राह कांटों भरी साबित हुई थी l उसे खुद के भविष्य की चिंता नहीं थी बल्कि अपने बूढ़े माँ -बाप और परिवार की फ़िक्र थी l
कारण वही था—जो आज भी उसके साथ था,उसकी जाति।
उस दिन भी वह कुछ नहीं बोला था, अब भी नहीं बोला लेकिन तब उसकी आँखों में मासूमियत तो थी पर नमी कम नहीं थी।
गजेंद्र उठा और आईने के सामने खड़ा हुआ,उसके चेहरे पर ना कोई दाग ना कोई धब्बा था परन्तु दिल में जातिवाद के प्रति आक्रोश था और आत्मा पर जाति का दाग जो डंस रहा था l
गजेंद्र खुद से पूछा क्या कमी है मुझमें…?” पढ़ा-लिखा हूँ कौशल में प्रशिक्षित हूँ, मेरी बेहतर कार्यशैली है, कार्यकुशल हूँ, ईमानदार हूँ, वफादार हूँ, समर्पित हूँ सब कुछ तो दे रहा हूँ हूँ,संस्थान को ना प्रमोशन मिल रहा है ना जाति बदल पा रहा हूँ, जो मेरे बस में भी नहीं है पर उसके मन एक विचार था;
जिस धर्म में आदमी को कुत्ते -बिल्ली से नीच समझा जाता है, नीच जाति -नीच लोग कहा जाता है, उसे सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए बदल तो सकता हूँ l हाँ धर्म तो बदल सकता हूँ, सम्मान से जीने के लिए l
गजेंद्र दफ्तर पहुँचा वह उसी कुर्सी पर बैठा जिस कुर्सी पर बैठकर बरसों से काम कर रहा था lजहाँ उसका काम नहीं,उसकी “जातीय औकात” तौली जाती थी। फ़ाइलें उसके हाथ में होती थी पर फैसला मि.जुहाड़ जैसे नीचचेताओं के हाथ में होता था l
हर साल जब गजेंद्र की चरित्रावली लिखी जाती—तब-तब उसकी उच्च शिक्षा,बेहतर कार्यशैली, कार्यकुशल,ईमानदार,वफादार और समर्पितभाव से गजेंद्र के काम की स्याही बदरंग हो जाती थी और जाति का रंग गहरा और डरावना हो जाता l
तीस बरसों की लम्बी सेवा के बाद जब गजेंद्र को फ़ाइल मिली, जब उसने पन्ने पलटे तो भले ही अक्षर लहूलुहान थे, पर उसके भविष्य के कत्ल की साजिश बयाँ कर रहे थे l
गजेंद्र की आँखों में समंदर उतर आया था, वह तुरंत सम्भल कर रुमाल आँख पर रख लिया क्योंकि ना उसे रोने की इजाजत थी ना शिकायत कीl
यह कॉर्पोरेट ऑफिस था, यहाँ आँसू नहीं, सिर्फ “नीचचेता” लोग ही दिखते थे। यहां नीचचेता दुहारिकाप्रसाद जुहाड़ अपने से उच्चशिक्षित,कर्म से सर्वश्रेष्ठ परन्तु जाति से शूद्र नीच के भविष्य का फैसला अपनी कलम से लिखते, जो फैसला नहीं अत्याचार होता था l
"कहते है ना जबरा मारै रोवै ना देय" ऎसा ही हो रहा था गजेंद्र के साथ l देश के संविधान की तरह ही संस्थान का भी संविधान सर्वश्रेष्ठ था पर यहां भी कुछ नीचचेता रक्षक के रूप में भक्षक बन हुए थे छोटी कौम के दुश्मन बने हुए थे, ये नीचचेता लोग नहीं चाहते कि कोई शूद्र संस्थान में नौकरी कर पाए l फील्ड आफिसर शूद्र युवक को बार -बार स्थानांतरित किया गया, देश का कोई कोना नहीं छूटा था, छोटे से टाइम पीरियड में इतना स्थानांतरण, आख़िरकार वह घबरा कर मर भी गया थाl
दुहारिकाप्रसाद जुहाड़ और नीचचेता लोग के साथ भी दोयम दर्जे का व्यवहार कर रहे थे पर गजेंद्र के अनुरोध पर भी स्थानांतरण नहीं कर रहे थे बस तड़पा रहे थे l
मि. जुहाड़ की कार्यशैली देखकर गजेंद्र को अपने बचपन की वो डरावनी घटना याद आ गयी जब जमींदार ग्रामप्रधान का बेटा ठाकुर संटी सिंह उसके बाप को तलवार से काटने के लिए दौड़ा लिया था l
हुआ यों था कि गजेंद्र भैंस चरा रहा था, चौड़ी नाली जो काफी लम्बी थी, भैंस चरते-चरते आखिरी कोने तक पहुंचकर फिर मुड़कर उसी नाली में चरने लगी, इतने में बदमाश ठाकुर संटी सिंह आ गया और गालियां देने लगा l भैंस के दो पैर ठाकुर के खेत में पड़े तो जरूर थे पर धान का एक पूंजा भी दबा नहीं था l
वही कुछ ही दूर पर गजेंद्र के पिता दुःखी खेत में काम कर रहे थे, वे दौड़कर आए और बोले बाबूसाहब क्यों गाली-फक्कड़ दे रहे हो, बेटवा भैंस के साथ चल रहा है, वैसे भी मेरी भैंस खड़ी फ़सल में पैर नहीं रखती l दुःखी की दलील से संटीसिंह को जमींदारी का भूत सवार हो गया l वह दुःखी को बुरी -बुरी गालियां देने लगा l
बदमाश संटीसिंह की गालियां दुःखी को बर्दाश्त नहीं हुई उसने एक हाथ से संटी की गर्दन पकड़ा और हवा में उछाल दियाl संटी की गालियां बंद नहीं हुई वह गाली देते हुए अपनी हवेली की तरफ भागा और हवेली से चमचमाती हुई पांच फुट की तलवार लेकर दौड़ता हुआ आया और दुःखी पर वॉर कर दियाl
पहलवान दुःखी का शरीर गठिला, बलिष्ठ था परन्तु छोटी कौम से वह थाl संटी सिंह गाँव के प्रधान का मनबढ़ कटहा कुत्ते के पिल्ले जैसा था बदमाश पंद्रह बीस साल का छोकरा था l अधेड़ दुःखी गंदी -गंदी गालियां दे रहा थाl जातीय श्रेष्ठता के दम पर निरपराध दुःखी पर जानलेवा हमला कर दिया था जबकि उसकी भैंस ठाकुर के खेत में पैर भी नहीं रखी थी l
हाँ दुःखी का इतना अपराध जरूर था कि वह छोटी जाति का भूमिहीन होकर भी भैंस पाल रखा था,और दुःखी का इससे बड़ा गुनाह था कि उसका बेटा गजेंद्र स्कूल जा रहा था, जिसको स्कूल जाने से रोकने के लिए जमींदार शामराजसिंह चिड़िया उडाने के लिए बंधुआ मज़दूर बनाने का दबाव भी डाल चुके थे परन्तु गजेंद्र के बाप ने जमींदार की मंशा पूरी नहीं होने दिया था l
डरा-सहमा गजेंद्र जोर -जोर से चिल्ला रहा था-बचाओ बचाओ l गजेंद्र की चिल्लाने की आवाज़ सुनकर बूढ़े जमींदार शामराज,ठाकुर संटी के आगे खड़े हो गए थे वरना दुःखी का सिर धड़ से अलग हो गया होता l
संटी के तलवार के वॉर से बचने के लिए दुःखी कूद गया था इसी बीच बूढ़े जमींदार शामराज आ गए और दुःखी की जान बच गयी थी पर गाँव के ठाकुरों ने दुःखी को ही दोषी ठहराया थाl
गाँव के जमींदार कहते देखो चमार की मनबढई कि ठाकुर संटीसिंह की गर्दन पकड़ लिया उसका बेटवा भैंस से प्रधानजी का धान चरवा लिया ठाकुर संटी ने भैंस चराने से मना किया तो दुःखी पहलवानी के जोर पर ठाकुर संटीसिंह पर हमला कर दियाl बाबू शामराजसिंह भी ठाकुर संटी के पक्ष में खड़े हो गए थे जबकि वह सब कुछ पहले से देख रहे थे,पर सच को सच कहने की हिम्मत बूढ़े जमींदार शामराज सिंह में नहीं थी l
दलितों पर अत्याचार शोषण के मामले में सभी अशूद्र सब एक हो जाते थे आज भी आज़ादी के सात दशक बाद भी बहुत कुछ नहीं बदला हैl दलितों का दमन बेखौफ़ जारी है, उनके खेत -खलिहान आग के हवाले कर दिए जा रहे हैं, उनकी बहन -बेटियों की इज्जत से दबंग लोग खिलवाड़ कर रहे हैं, हत्या तक कर रहे हैं l
एकदम ऐसा ही गजेंद्र सिंह के साथ काले अंग्रेज अत्याचार कर रहे थे,उसके भविष्य का कत्ल कर रहे थे निरापद के खिलाफ साजिशे रच रहे थे ताकि वह खुद नौकरी छोड़ दे या सुसाइड कर ले और जातिवादी अत्याचारी अपने पापकर्म का दोषी निरापद गजेंद्र के उपर थोप दें l
गजेंद्र के साथ अत्याचार-शोषण पढ़े-लिखे नीचचेता उच्च वर्णिक दुहारिका प्रसाद जुहाड़ जैसे उच्चअधिकारी कलम से कर रहे थे, जो तलवार से भी अधिक घातक था पर प्रहार में कोई शोर नहीं थाl श्रम की मंडी से लेकर यूनिवर्सिटी और बड़े संस्थानों में बैठे उच्चवर्णिक साइलेंटकिलर चुपचाप ऐसी ही तो तलवारे भांज रहे हैं जिससे बहुत से होनहार शूद्र बेमौत मारे गए और मर भी रहे l
नौकरी के आखिरी बरस में, जब गजेंद्रसिंह को दण्डस्वरूप दूसरे राज्य में स्थानांतरित कर दिया दिया गया फिर भी प्रमोशन से दूर था l उधर शैक्षणिक और व्यावसायिक शिक्षा की तराजू पर अयोग्य परन्तु जातीय योग्यता की तुला पर सर्वोत्तम खुदगर्ज -चालबाज मि.जुहाड़ को सतर्कता विभाग का चीफ के रूप में पदोन्नति भी मिल गयी l गजेंद्र क्लर्क से आगे ही नहीं बढ़ पाया,लोग कहते जातीय आरक्षण के आगे सारी योग्यताएं, कर्मठता,वफादारी सब फेल है l जातिवादी देश में कर्म नहीं जाति श्रेष्ठ है हाय रे धार्मिक आरक्षण l
गजेंद्र और दुहारिका प्रसाद जुहाड़ के विभाग में नौकरी की शुरुआत क्लर्क से हुई थी l मि. जुहाड़ नौकरी पहले जॉइन किये और साल दो साल पीछे परन्तु प्रमोशन जमीन आसमान का अंतर l
गजेंद्र समझ गया था कि उसका यह तबादला असल में उसका नहीं था उसकी पहचान का तबादला हुआ था lनए दफ्तर में कुर्सी वही थी परन्तु फाइलें बहुत जिम्मेदारीपूर्ण थी,काम जिम्मेदारी एवं चुनौतियों से भरा हुआ था पर नज़रों का वजन पहले से और अधिक था।
दूसरे राज्य में गजेंद्र के पहुंचने से पहले उसकी जाति पहुँच चुकी थी। गजेंद्र धीमे स्वर में शालीनता से बोला —“साहब… जाति है कि गयी ही नहीं पर भविष्य जाति की भेंट चढ़ गया l सच तो एक दिन समय बता ही देता हैl कौन बड़ा है… और कौन “नीचचेता”।
कहाँ समय चुप नहीं रहता। हवाएं बोलती हैं परन्तु वक्त लगता है, कभी -कभी जीवन भी बीत जाता है l विभाग में नई डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली शुरू हो गयी ।
अब हर कर्मचारी की गोपनीय चरित्रावली केवल अधिकारी की निजी टिप्पणी से नहीं, बल्कि कार्य निष्पादन, कर्मठता, ईमानदारी, वफादारी, समयब्धता, कार्यकौशल, शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, ज्ञान-अनुभव, समार्पण और सहकर्मियों की फीडबैक रिपोर्ट से तय होने लगी थी।
डिजिटल मूल्यांकन से गजेंद्र का रिकॉर्ड चौंकाने वाला निकला।बत्तीस वर्षों में रिकॉर्ड तोड़ काम निपटाने वाला निकाल, बेहतरीन परफॉरमेंस पायी ।संस्थान के अधिकारियो एवं कर्मचारियों की पसंद में उसका नाम ऊपर था परन्तु एक हीरो को जातीय व्यवस्था के दीमक ने जीरो बना दिया था l
जांच समिति ने पुरानी चरित्रावलियाँ भी मंगाईं। बत्तीस सालों की चरित्रावली की वही नकारात्मक टिप्पणियाँ देखकर संदेह गहरा गया। जब विभागीय जाँच हुई, तो पहली बार सामने सच आया l
“गजेंद्र मेहनती, ईमानदार, वफादार कर्मचारी था, जातिवादी घृणित मानसिकता के अधिकारियो ने गजेंद्र की खराब रिपोर्ट सिर्फ जातिगत पूर्वाग्रह से लिख था, जिससे एक दलित होनहार का भविष्य बर्बाद हो गया था l
मानवतावादी कर्म को श्रेष्ठ मानने वाले लोग टिका टिप्पणी कर रहे थे कि “कुर्सी पर बैठकर किसी कर्मचारी की जाति नहीं, योग्यता देखी जानी चाहिए । जातिवादियों ने गजेंद्र जैसे एक कर्मचारी नहीं, संविधान की आत्मा का अपमान किया है।”
अन्यायी दुहारिका प्रसाद जुहाड़, ऊँची जाति की सीढ़ी से संस्थान के सतर्कता विभाग के प्रमुख का पद हथिया लिए थे l
मि. जुहाड़ की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में पहली बार लिखा गया—“व्यवहार में पक्षपात, नेतृत्व में संवेदनहीनता, प्रशासनिक नैतिकता कमजोर।”वही शब्द, जो वे वर्षों से दूसरों पर थोपते आए थे, आज उनके सामने आईना बनकर खड़े थे।
उधर गजेंद्र की सेवानिवृत्ति का दिन आ गया।
पूरा दफ्तर उसे विदाई देने खड़ा था।
जिस कुर्सी के सामने वह बरसों तक झुका था, उसी दफ्तर के प्रमुख अधिकारी ने मंच से कहा—गजेंद्र जी ने हमें सिखाया कि पद नहीं, कर्म आदमी को बड़ा बनाता है।”
गजेंद्र की आँखों में आँसू थेlगजेंद्र ने बस इतना कहा—साहब, आदमी जात से नहीं, चेतना से ऊँचा या नीचा होता है।”सभी निःशब्द और निरुत्तर थे l
दफ्तर की दीवार पर टंगा संविधान का फ्रेम उस दिन कुछ ज्यादा चमक रहा था।
मानो कह रहा हो—नीच वह नहीं, जिसे समाज नीचा कहे;
नीच वह है, जिसकी चेतना मनुष्य को मनुष्य न समझे।
नन्दलाल भारती
30/03/2026
परिचय:
नाम - नन्द लाल भारती
शिक्षा - एम.ए.(समाज शास्त्र)एल.एल.बी(आनर्स)
पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट
जन्म स्थान जिला -आजमगढ (उत्तर प्रदेश)
वर्तमान निवास :इंदौर (मध्य प्रदेश )
प्रकाशित पुस्तकें :
1-अमानत-उपन्यास-प्रकाशक-इंसा,
2-चांदी की हंसुली-उपन्यास-प्रकाशक-मनोरमा साहित्य सेवा, इंदौर
3-उखड़े पांव- लघुकथा संग्रह-प्रकाशक-यश पब्लिकेशंस, दिल्ली
4-सूली का जीवन-उपन्यास-प्रकाशक-इण्डिया नेटबुक्स प्रा.लि.नोएडा
5-गाल भर धुआं-कहानी संग्रह--इण्डिया नेटबुक्स प्रा.लि.नोएडा
6-युध्दरत-उपन्यास-प्रकाशक-इंडि
7-श्रापित आदमी-उपन्यास-प्रकाशक-इण्डिया नेटबुक्स प्रा.लि.नोएडा
8-बेटी-उपन्यास-प्रकाशक-इण्डिया नेटबुक्स प्रा.लि.नोएडा
9-गांठें-लघुकथा संग्रह-प्रकाशक-इण्डिया नेटबुक्स प्रा.लि.नोएडा
10-गुनाह -उपन्यास- प्रकाशक-इण्डिया नेटबुक्स, नोएडा
11-अनुभूति(काव्य संग्रह)
अप्रकाशित पुस्तकें :दहकन (कहानी संग्रह)एवं अन्य कई प्रतिनिधि काव्य, कहानी, लघुकथा संग्रह और बुक्स एवं कब्र के करीब (आत्मकथा) एवं अन्य ई पुस्तकें l
कई शोधार्थी मेरे लेखन पर पी. एच. डी कर रहे हैं
सम्मान/पुरस्कार:
विद्यावाचस्पति, विद्यासागर, हिन्दी भाषा भूषण हाशिए की आवाज कथा सम्मान - 2018 (भारतीय सामाजिक संस्थान,नई दिल्ली ) एवं अन्य
शोधकार्य: लेंग्वेज डिपार्टमेंट, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इनफार्मेशन एण्ड टेक्नोलॉजी, हैदराबाद
जनप्रवाह(साप्ताहिक) समाचार पत्र,ग्वालियर (मध्य प्रदेश)से उपन्यास चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन।
प्रसारण: आकाशवाणी एवं दूरदर्शन इंदौर से कविता पाठ।
लघुफिल्म: पेशकश पटकथा/निर्देशन:श्री अनिल पतंग
पीएचडी : कई शोधकर्ता पीएचडी कर रहे हैं l
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