मैं हारता चला गया ,
चला राह ईमान ,फ़र्ज़ सेवा काम की
तबाह होती गयी मंजिले ,
उम्मीदों का खून होता चला गया ,
मैं हारता चला गया………
हार के बाद जीत की नई आशा
लहूलुहान संभलता चला गया
नया जोश नई उमंगें
घाव सहलाता चला गया
मैं हारता चला गया………
हार के बाद जीत की आशा
रूठ-लूट सी गयी
योग्यता बेबस लगने लगी
रिसते घाव पर
संतोष का मलहम
लगाता चला गया
मैं हारता चला गया………
जवान जोश संग होश भी
बूढ़ी उम्मीदे सफ़ेद होती जटा
चक्षुओ पर मोटा ऐनक डटा
मरता आज कल को फंसी की सजा
जहां में छलता चला गया
मैं हारता चला गया………
उम्मीदे मौत की शैय्या पर पडी
सद्काम -नाम बेनूर हो रहा
मृत शैय्या पर पड़े
भविष्य के सहारे
मरते सपनों की शव यात्रा
विष पीता -मरता चला गया
मैं हारता चला गया………
डॉ नन्द लाल भारती
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