जीने के लिए ढाई अक्षर काफी था यार
वह भी लूटे जा रहे
सांस के धागे टूटे जा रहेज
मन्नतें -संघर्ष सब भूलाये जा रहे
दिल के दर्द तरासे जा रहे
टूटकर जुड़ते रहे ढाई अक्षर के लिये यार
प्रेम की बगिया को उजाड़े जा रहे
खौफ बचा है सफर मे अब यार
अब तो अपने ही छाती मे खंजर मारे जा रहे ।
जीने के लिए ढाई अक्षर काफी था यार
अब तो वह भी लूटे जा रहे
जीने के अरमान छुटे जा रहे
मरने की आश मे जीये जा रहे ।
डां नन्द लाल भारती
21/04/2019
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