Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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स्वर्ण कमल

 
स्वर्ण कमल -
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छीन कर ले गए.......!
निर्वस्त्र  प्रतिबिम्ब ! 
मेरे वस्त्र क्यूं i?
स्वंय के आलिंगन से, 
हो गया क्या ? 
मुक्त अहो !
प्रतिरोध की गति 
धीमी लगती, अखर कर !
खोलकर प्राण चक्षु 
रह गए अबोध क्यूँ ?
रूक जाओ ! 
धरती फिर उग रही है 
थम जाओ ! 
जगने लगा आसमान 
हौले हौले !
जीवित हो गई 
फिर से, तिरोहित नीर !
अतृप्त मन ! 
पी ले आ.. सिन्धु के कण !
फिर जागूँ आ.. बनकर, 
सतयुग का"स्वर्ण कमल"! 
सतयुग का "स्वर्ण कमल"!

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नोट-महाप्रलय के बाद पुनः जीवन की उत्पत्ति इस ओर इंगित करती है कि अंधकार के बाद प्रकाश का उदय हमें एक बार फिर से हमारा सच्चा साक्षात्कार कराता है जिसमें हम एक स्वर्णकमल की भांति हर पल देदीप्यमान हो रहे है अपने समस्त कुलषित भाव वस्त्रों को त्याग कर।
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