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Dr. Srimati Tara Singh
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"दूरदर्शन की वर्तमान स्थिति और भविष्य की दिशा''

 

"दूरदर्शन की वर्तमान स्थिति और भविष्य की दिशा: एक विश्लेषण"


प्रस्तावना

दूरदर्शन, भारतीय टेलीविजन का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित मंच, कभी देश के कोने-कोने में मनोरंजन, शिक्षा और संस्कृति का पर्याय था। आज, प्राइवेट चैनलों की चमक-दमक और तकनीकी नवाचार के युग में, दूरदर्शन की लोकप्रियता और प्रासंगिकता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े हो गए हैं। यह लेख दूरदर्शन की वर्तमान स्थिति, उसकी चुनौतियों, बच्चों और युवाओं के लिए कार्यक्रमों की कमी, और उसके पुनरुत्थान के लिए आवश्यक सुधारों की विवेचना करता है।


1. दूरदर्शन की गिरती लोकप्रियता: कारण और सच्चाई

कार्यक्रमों की सीमितता और आकर्षण का अभाव

दूरदर्शन के कार्यक्रमों में वह ताजगी, विविधता और आधुनिकता नहीं दिखती, जो आज के दर्शक अपेक्षित करते हैं। बच्चों और युवाओं के लिए विशेष, नवाचारी और संवादात्मक कार्यक्रमों की भारी कमी है। अधिकांश कार्यक्रम पुराने फॉर्मेट पर आधारित हैं, जिनमें न तो विषयों की विविधता है और न ही प्रस्तुति में नवीनता। यही वजह है कि आज का युवा दर्शक प्राइवेट चैनलों या डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित हो रहा है।

रचनात्मकता और बाहरी प्रतिभा के लिए सीमित अवसर

दूरदर्शन की नीति और कार्यशैली इतनी कठोर और संकीर्ण हो गई है कि बाहरी प्रोड्यूसर, स्वतंत्र कलाकार या नवोदित संस्थाओं के लिए इसमें प्रवेश करना लगभग असंभव सा लगता है। नए विचारों और प्रयोगों का अभाव, दूरदर्शन को एकरस और अप्रासंगिक बनाता जा रहा है।

सरकारी संस्थान की कार्यशैली और जवाबदेही की कमी

दूरदर्शन अब भी एक पारंपरिक सरकारी संस्थान की तरह संचालित होता है, जहाँ नवाचार, प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, जितना आज की आवश्यकता है। कर्मचारियों और अधिकारियों में जिम्मेदारी और पारदर्शिता का अभाव, संस्था की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है।

तकनीकी पिछड़ापन और डिजिटल उपस्थिति की कमी

जहाँ प्राइवेट चैनल्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने उच्च गुणवत्ता, इंटरएक्टिविटी और मल्टीमीडिया प्रस्तुति में निवेश किया है, वहीं दूरदर्शन अब भी पारंपरिक प्रसारण तकनीकों और सीमित संसाधनों पर निर्भर है। सोशल मीडिया, OTT और मोबाइल एप्लिकेशन जैसे माध्यमों पर दूरदर्शन की उपस्थिति नगण्य है।


2. बच्चों और युवाओं के लिए कार्यक्रमों की उपेक्षा

बच्चों और युवाओं के लिए मनोरंजक, शिक्षाप्रद और प्रेरणादायक कार्यक्रमों की भारी कमी दूरदर्शन की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है।

  • अधिकांश कार्यक्रम स्कूलों के टाई-अप या सीमित समय-सीमा तक ही सीमित हैं।

  • स्वतंत्र संस्थाओं, कलाकारों या नवोदित प्रतिभाओं के लिए मंच उपलब्ध नहीं है।

  • बच्चों और युवाओं की रुचियों, जरूरतों और सपनों को केंद्र में रखकर कार्यक्रम तैयार नहीं किए जाते।

इस उपेक्षा के कारण न केवल दूरदर्शन की दर्शक संख्या घटी है, बल्कि नई पीढ़ी के लिए यह मंच लगभग अप्रासंगिक हो गया है।


3. जनता की शिकायतें और समाधान के रास्ते

जनता की प्रमुख शिकायतें

  • कार्यक्रमों में नवीनता और विविधता का अभाव

  • बच्चों और युवाओं के लिए अवसरों की कमी

  • बाहरी प्रतिभाओं के लिए मंच का बंद होना

  • पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी

शिकायतों के समाधान के लिए मंच

  • दूरदर्शन निदेशालय या प्रसार भारती को सीधे सुझाव या शिकायत भेजी जा सकती है।

  • भारत सरकार की सीपीजीआरएएमएस (CPGRAMS) पोर्टल (pgportal.gov.in) पर भी शिकायत दर्ज की जा सकती है।

  • सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर भी अपने विचार साझा किए जा सकते हैं।


4. दूरदर्शन के पुनरुत्थान के लिए ठोस सुझाव

1. बाहरी प्रतिभा और संस्थाओं के लिए मंच खोलना

  • स्वतंत्र प्रोड्यूसर, कलाकारों और संस्थाओं को आमंत्रित कर नए और विविध कार्यक्रमों का निर्माण।

  • ओपन पिचिंग सिस्टम लागू करना, जिससे हर व्यक्ति या संस्था अपनी रचनात्मकता प्रस्तुत कर सके।

2. बच्चों और युवाओं के लिए विशेष फोकस

  • इंटरएक्टिव, प्रतियोगितात्मक और प्रेरक कार्यक्रमों की शुरुआत।

  • देशभर के स्कूल, कॉलेज और सांस्कृतिक संस्थाओं को जोड़ना।

3. तकनीकी नवाचार और डिजिटल विस्तार

  • हाई-डेफिनिशन, ग्राफिक्स और मल्टीमीडिया प्रस्तुति को प्राथमिकता देना।

  • OTT, यूट्यूब और सोशल मीडिया पर सक्रिय उपस्थिति बनाना।

4. जवाबदेही और पारदर्शिता

  • कर्मचारियों और अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना।

  • जनता की भागीदारी और फीडबैक को नीति-निर्माण में शामिल करना।

5. नीति और प्रबंधन में सुधार

  • फॉर्मेट में लचीलापन और खुलेपन को अपनाना।

  • युवा, रचनात्मक और प्रोफेशनल नेतृत्व को प्रोत्साहित करना।


निष्कर्ष

दूरदर्शन के पास आज भी देशव्यापी पहुँच, संसाधन और ऐतिहासिक साख है। लेकिन बदलते समय के साथ उसे अपने कार्यक्रमों, तकनीक, नीति और कार्यशैली में व्यापक बदलाव लाने होंगे।
जनता के लिए बना यह मंच, तभी प्रासंगिक और लोकप्रिय बन सकता है, जब वह जनता की भागीदारी, बच्चों-युवाओं की रचनात्मकता और तकनीकी नवाचार को खुले दिल से अपनाए।
सुधार की दिशा में ठोस कदम, पारदर्शिता और नवीनता ही दूरदर्शन को फिर से भारतीय टेलीविजन का गौरव बना सकते हैं।


महत्वपूर्ण लिंक:


लेखिका

डॉ मुक्ता मिश्रा

गुरुग्राम हरियाणा 

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