अस्तित्व*
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दीवारों का अस्तित्व
तब तक है ,जब तक
पगडंडियों पर चलने वाले
प्रयासों के किवाड़ नहीं खोलते ।
संवेदनाओ का परिवर्तन अबूझ है
और आज कोई त्रिशंकु
या स्थितप्रज्ञ ,जीत लेगा क्रंदन
क्या इतना ही सच पर्याप्त है ?
क्यूं कि, विकृत और श्रापित है
अधोगति का कर्म फल
प्रस्फुटन... !
केवल बीज है
जीवन की कल्पना का
मन से उगती बहिर्मुखता की अग्नि
तो केवल प्रश्नचिन्ह है
पीढ़ियों के गुणनफल का
और वर्तमान अनुवांशिकता
वह सूरज है जिसका प्रकाश
हमने स्वयं अर्जित किया है
तो...दूषित कौन ???
व्यवहार या पीड़ित संस्कार !
ठगी.... बनाम ! जीत और हार मे...
पनपता भ्रमित ज्ञान !
अपनी ही जड़ों को क्यूं ??
झकझ़ोरता ,कचोटता और काटता रहा
विस्मृत कर,अपने वास्तविक स्वरूप को
तभी तो, वेदांत बौना हो गया
अज्ञान के धुंधलको में डूब कर
और विज्ञान खोजता फिर रहा है
अविकसित प्रमाणो की होड़ में
ब्रह्मण्ड की ऊर्जा को...!
जो महाशुन्य से स्वयं में ही निहित है
सदियों से अनंत तक, अनंत से अनंत तक।
अनंत से अनंत तक।
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लेखिका
डॉ मुक्ता मिश्रा
गुरुग्राम हरियाणा
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