शांति और सुविधा वरिष्ठों की आवश्यकता ऐश्वर्य नहीं
लेखिका - डॉ• मंजुल श्रीवास्तव
ज़िंदगी की साँझ में जब सूरज ढलान पर होता है, तब इंसान को तेज़ रौशनी नहीं, एक ठंडी छाँव चाहिए होती है। सीनियर सिटिज़न यानी हमारे घर के वो बुज़ुर्ग, जिन्होंने पूरी उम्र परिवार की नींव में अपना पसीना सींचा है, उन्हें अब महलों की चमक नहीं, मन की शांति चाहिए। उम्र के इस पड़ाव पर शान-ओ-शौकत एक बोझ बन जाती है, और सुकून एक दवा।
*1. उम्र के साथ बदलती प्राथमिकताएँ
जवानी में हम नाम, शोहरत, बड़ी गाड़ी, आलीशान घर के पीछे भागते हैं। पर 60 के बाद शरीर थकता है, मन धीमा हो जाता है। अब कान को तेज़ संगीत नहीं, पोते-पोती की किलकारी सुकून देती है। आँखों को हीरे की चमक नहीं, अपनों का चेहरा देखने की तलब होती है। इस उम्र में दिखावा नहीं, अपनापन चाहिए।
*2. शांति क्यों ज़रूरी है?
- *स्वास्थ्य की कुंजी*: BP, शुगर, नींद न आना — ये सब तनाव की देन हैं। शांत माहौल दवा से ज़्यादा असर करता है। रोज़ की चिक-चिक बुज़ुर्गों को भीतर से तोड़ देती है।
- *भावनात्मक सुरक्षा रिटायरमेंट के बाद कई बार खुद को "बेकार" समझने लगते हैं। अगर घर में सम्मान और शांति हो, तो वो खुद को परिवार का हिस्सा महसूस करते हैं, बोझ नहीं।
- *आध्यात्मिक झुकाव - यह उम्र खुद से मिलने की होती है। पूजा, भजन, यादें, पुरानी तस्वीरें — इनके लिए एकांत और शांति चाहिए, भीड़-भाड़ नहीं।
*3. शान-ओ-शौकत का भ्रम
हम सोचते हैं कि माँ-बापू को बड़ा घर, महँगा सोफा, AC वाला कमरा देकर हमारा फ़र्ज़ पूरा हो गया। पर अगर उस बड़े घर में बात करने वाला कोई न हो, अगर दिनभर टीवी के अलावा कोई आवाज़ न आए, तो वो महल भी जेल लगता है।
वृद्धाश्रमों में सब सुविधाएँ होती हैं, पर फिर भी आँखें दरवाज़े पर क्यों टिकी रहती हैं? क्योंकि वहाँ शान है, पर वो सुकून नहीं जो अपने बच्चे की एक आवाज़ में है।
*4. हम क्या कर सकते हैं?
- *समय दीजिए, सामान नहीं*: 10 मिनट पास बैठकर उनका हाल पूछ लेना, किसी महँगे तोहफ़े से कीमती है।
- *फ़ैसलों में शामिल करिए*: "बाबूजी, ये बताइए कैसा रहेगा?" — ये एक वाक्य उन्हें ज़िंदा महसूस कराता है।
- *उनकी दिनचर्या का सम्मान*: सुबह की चाय, शाम की सैर, भजन का समय — इसमें खलल न डालें। यही उनकी शांति है।
- *डिजिटल शांति*: घर में तेज़ टीवी, फोन पर ज़ोर-ज़ोर से बात करना — ये सब बुज़ुर्गों को परेशान करता है। थोड़ी आवाज़ धीमी कर लेना ही प्रेम है।
सारांश -
याद रखिए, *हम भी एक दिन वहाँ खड़े होंगे*। जो बोएँगे, वही काटेंगे। बुज़ुर्ग कोई एंटीक पीस नहीं जिन्हें शोकेस में सजाकर रख दिया जाए। वो जीवित किताबें हैं, जिनके हर पन्ने पर अनुभव लिखा है।
उन्हें शान-ओ-शौकत नहीं चाहिए। उन्हें चाहिए दो मीठे बोल, थोड़ा वक्त, और एक ऐसा कोना जहाँ वो बिना डर के, बिना शोर के, अपनी साँसें गिन सकें।
*क्योंकि घर की असली रौनक़ महँगे पर्दों से नहीं, बुज़ुर्गों की सुकून भरी मुस्कान से होती है।
---- मंजुल श्रीवास्तव
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