राखी में बँधा वादा प्यार
आलेख
डॉ मंजु गुप्ता
फ़िल्म के गाने की चर्चित पँक्ती -
"रेशम की डोरी से बहना ने प्यार बाँधा है , संसार बाँधा है।"
रिश्तों की मिठास , रिश्तों का विश्वास है ,राखी का धागा। बंधी इसमें संस्कृति इतिहास।
रेशम के धागे में लिपटा ,
प्रेम का त्योहार .
बहन- भाई की बुनियाद है ,
रक्षाबन्धन का त्योहार .
दिल से दिल को जोड़ती है
रेशम की डोर है .
पवित्र नजर हर भाई की रहे ,
उत्सव दर्शन रक्षाबंधन है । डॉ मंजुगुप्ता
हमारा भारतवर्ष उत्सवों का देश है । पर्वों की संस्कृति इसकी पहचान है। पूरे साल के हर महीने, सप्ताह में कोई न कोई त्यौहार आता है। श्रावण मास की पूर्णिमा को रक्षाबंधन का पर्व पूरे देश के साथ विश्वके जिन देशों में जहाँ -जहाँ भारतीय गया वहाँ पर इस पर्व को विशेष उत्साह उमंग के साथ मनाते हैं। यह पर्व हमारे ज्ञान ,बौद्धिक विकास को प्रेरणा देता है।प्राचीन भारत में स्वाध्याय का
श्री गणेश होता था। चार माह वर्षा ऋतु एँ साधु संन्यासी जंगल से आकर गाँव और नगरों में निवास करते थे। आज भी जैन धर्म में चर्तुमास के रूप में यह परंपरा कायम है।
खुशी प्रेम के इस पर्व पर हमारी माँशांति देवी वार्ष्णेय बड़े उत्साह से श्रावण पूर्णिमा से पन्द्रह दिन पहले से ही रक्षाबंधन की तैयारियों के लिए सेवियां , जवें आदि बनाने में जुट जाती थी .
परिवार को सेल्फ मेड सेवाईयां खीर के साथ खिलाती थी। आज तो महिलाएँ ऑनलाइन सेवाईयां के पैकेट मंगावा लेती थी।
रक्षाबन्धन के दिन माँ पूजा के थाल में रोली , चावल , दीपक और रंग - बिरंगी राखियों से सजाके भाई - बहन को राखी की कहानी सुनाती थी , फिर हम बहनें भाई का आरता उतारने के बाद उस की कलाई पर ढेर सारी यानी पूरी बांह भर के राखियाँ बांधा करती थी . कितना के साथखुश होता था भाई राखियों को देख कर . माँ घर के सभी दरवाजों पर गेरू से ' सोना ' उकेर कर उन पर भाई पूजा की राखियों को खीर - सेवियों से चिपका कर खीर से राखियाँ जिमा कर , पानी पिलाता था तब हम सब खीर- सेवियां बड़े चाव से खाते थे .
रक्षाबन्धन पर्व भाई - बहन के प्यार का बंधन है , बल्कि राखी पर्व भाई - बहन के मिलन का पर्व भी है . बहन राखी का धागा अपने भाई के कलाई पर बाँधती हैं। इस धागे में भाई के लिए शील , स्नेह , साहस , संयम , सहयोग , पराक्रम , जिम्मेदारियों का वादा बांधती हैं. जिससे बहन समाज , परिवार में निर्भय हो कर विचरण कर सके और स्त्री जाति पर दुःख - संकट आने पर भाई अपनी जान की बाजी लगा देते हैं . रक्षाबन्धन का पर्व दृष्टि परिवर्तन का भी त्यौहार है . अर्थात भाई - बहन का संबंध निरपेक्ष होता है . भारतीय संस्कृति में भाई - बहन के रिश्ते में जातीय , सेक्स को वर्ज्य माना है .
माँ अपने पुत्र के जन्म होने पर इस पर्व के आने पर अपनी बेटी से भाई की कलाई पर राखी बाँधने की रस्म शुरू करवा देती है।
प्रभु शिव ने तीसरी आँख खोलकर कामदेव को भस्म किया था। बहन भी भाई की तीसरी आँख खोलकर यानी बुद्धि का लोचन को खोलकर उसे विकार , वासना को भस्म करने की भावना देती है और समस्त नारी जाति की रक्षा ,सुरक्षा का दायित्व भी सौंपती है।
इंद्राणी ने देव दानव युद्ध के वक्तहिम्मत से हारे अपने पति इंद्र को राखी जो ऊर्जा का प्रतीक है ,बाँधी थी । जिससे इंद्र विजयी हुए ।
मेवाड़ की रानी कर्णावती ने हुमांयू को राखी भेजकर युद्ध में मदद हेतु भेजी थी क्योंकि गुजरात का सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की थी ।
महाराष्ट्र में मछुआरे श्रावणी पर्व के रूप में इस पर्व को मनाते हैं । इसे सागर पूजन , नारली पूर्णिमा भी कहते हैं। वे हाथ जोड़कर वरुण देव से प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा और शांति की प्रार्थना करते हैं
राखी का धागा परिवार से लेकर समाज , राष्ट्र , विश्व तक रिश्तों को जोड़ता है ।
सन् 1905 में बंगाल विभाजन के समय गुरुदेव रवींद्र नाथ ने लोगों में एकता बनाए रखने के लिए राखी के इसी धागे ने सेतु का काम किया था।
भारत की संस्थाएँ , बहनें देश की सीमाओं पर तैनात वीर सैनिकों को राखी भेजकर उनमें ऊर्जा भरतीं हैं और पूरे राष्ट्र की सुरक्षा का प्रण लेती हैं ।जवानों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती हैं।
यह प्रेम का धागा जाति, धर्म और क्षेत्र की खाई को पाटकर संपूर्ण समाज कोविविधता में एकता के सूत्र में पिरोता है। यह पवित्र धागा ज़माज के हर वर्ग की दृष्टि को पावन करे । बेसहारों को संबल दे। राखी का धागा परस्पर प्रेरक , पोषक-पूरक है।
सभी भाई बहनों , आत्मीय जनों को पावन रक्षाबंधन पर्व शुभकामना प्रेषित कर रही हूँ।
शुभकामनाओं के साथ
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