डॉ . मंजु गुप्ता, वाशी , नवी मुंबई
करें रस्म हैं ईश , गुलाबी भोरखिली है ।
पवन बजाए साज , मातु को सुता मिली है।।
करने नेकाचार , झड़ी सावन की आयी।
माँगे नोट हजार , सौंठ हरिरा है लायी ।
करेगोद में प्यार , हवाशुभसोहरगाए ।
करे दुआइजहार , नजरिया है पहनाए।।
रहे आन ओ शान , सदा घर के तालों में ।
रहे सदा मुस्कान , अधर - मन के प्यालों में।।
उतर नवाने शीश , धरा परकिरणेंसारी।
आएसारे ईश , ब्रह्म लीला है न्यारी।।
बरस गयी आशीष, देवगण संग हमारी ।
प्रीत करे हैश्रीश , उतारे नजर तुम्हारी।।
हुआ तिमिर तब दूर , दिशा ने दीप जलाया ।
खिला प्रेम का नूर , उषा ने तिलक लगाया।।
मंगल शुभपंचांग , गगन से पंडित लाया।
करे टोटके तंत्र , नाम पार्वती बताया।।
मातु करे शिशु शृंगार ,लिए गोदी में प्यारी।
रत्न जड़ित हार , डाल गल राजकुमारी।।
दृग में कजरा डाल ,लगे हैं आँखें सुंदर।
लगे दिठौना भाल , लगे मोहक प्यारा हर।।
दुर्गा रूप प्रतीक , वास संयम काहोता।
रहे उमा नजदीक , नहीं सुंदरता खोता ।।
रहे मोह निर्लिप्त , जगतको यहसिखलाता।
रहे प्रेममेंलिप्त , बुराई दूर भगाता।
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