विभु यानी शिव की आराधना
11वर्ण वृत्ता छंद में
डॉ मंजु गुप्ता
नगण नगण सगण गुरु गुरु।
111 111 112 2 2
नमन करत शिव हे काशी!
बसत हृदय पर कैलाशी।।
बन कर कलम सहारा तू।
रच मन शजर हमारा तू ।।
गुरुद क्षपण परमात्मा हो।
बसत बघिर अखिलात्मा हो।।
मन पर जब तम है छाया।
हृदय निकट तुमको पाया।।
गिरिक प्रभु शरण में आई।
सुमन अगर फल मैं लाई।।
तब सुभग कर कृपा छाई।
हर क्षण छवि सम की पाई।।
रट सुकर मन न है डोला।
सरल मृदु मन अमी घोला।।
हर-हर बम-बम है भोला।
भज-भज विभु धव है बोला।।
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