तेरे बिन कटे नहीं अब रातें, आती है हृदय को याद बाते ।
अब सेज पर करवटें संग चले, तन्हाई में तुम मुझे सताते।।
खिड़की से पूनम चंदा - तारे, मेरे मन को अब नहीं सुहाते।
सुख चैन सभी मेरा खत्म हुआ, नथ पायल - कजरा सभी रुलाते।।
तुम बिन दुनिया फीकी लगती , नदिया सागर पवन तंज मारे।
विरहिणी याद में है खाक हुई , पीड़ा ये दिल की टरत न टारे।।
बादल बिजली भी गरज- गरज के , तेरी याद को बरसाय सारे।
आकर पास पिया तू दूर हुआ, विरह निशा में छाय अंधियारे।।
विरह सवैया मुक्तक में - पिया बिन
झड़ी याद की हिया में बह रही ,दिवस-रात में अब आग लगी है।
कब आओगे तुम रूठे सजना , आहट से दृग में जाग लगी है।
अब विरह रात है डसती मुझको ,झड़ी आँसुओं की बरस रही है।
फागुन मौसम भी द्वार खड़ा है , रंग खेलने की लाग लगी है।।
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