Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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तेरे बिन कटे नहीं अब रातें

 

तेरे बिन  कटे नहीं अब रातें, आती है  हृदय  को याद  बाते ।


 अब सेज पर  करवटें  संग चले, तन्हाई में तुम  मुझे सताते।।


 खिड़की से  पूनम  चंदा - तारे, मेरे मन को अब नहीं  सुहाते।



सुख चैन सभी मेरा खत्म हुआ, नथ पायल - कजरा  सभी रुलाते।। 




तुम बिन दुनिया फीकी लगती , नदिया सागर पवन  तंज मारे।


 विरहिणी याद में है खाक हुई  , पीड़ा  ये  दिल की टरत न टारे।। 


बादल बिजली भी गरज- गरज के , तेरी याद को बरसाय  सारे।


 आकर  पास पिया तू  दूर हुआ,   विरह निशा में  छाय अंधियारे।। 



 विरह  सवैया मुक्तक में - पिया बिन


झड़ी  याद की हिया  में  बह रही ,दिवस-रात में अब आग लगी  है। 


कब आओगे  तुम  रूठे सजना , आहट से दृग में जाग लगी है।


अब  विरह रात है डसती मुझको   ,झड़ी आँसुओं की बरस रही  है।


फागुन मौसम भी द्वार  खड़ा है , रंग खेलने की लाग लगी है।।


 


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