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श्रम और संघर्ष

 

श्रम और संघर्ष
गीत

साधा हमने कर्म लक्ष्य तो, श्रम और संघर्ष करना है।
पथरीले कंटक पथ साथी, तो हॅंसते-हॅंसते चलना है ।।

जीवन की भट्टी में नित ही ,
सूरज जैसे नर को तपना ।
लापरवाही हमने की तो,
होगा अब पूर्ण नहीं सपना ।।
हमको आलस के दलदल से , तब बाहर मित्र निकलना है।
पथरीले कंटक पथ साथी, तो हॅंसते-हॅंसते चलना है।।

सीमा पर सैनिक को देखो,
मौसम की मारों को सहता।
करता प्राण त्याग माँ हित में,
निर्भय हो जय वंदे कहता।।
आँधी -लू मग पर सहकर ही , हम सब को आगे बढ़ना है।
पथरीले कंटक पथ साथी,तो हॅंसते-हॅंसते चलना है।।

नदिया भी लक्ष्य लिये चलती,
जाकर सागर में मिल जाती ।
सारी बाधाओं को सहती,
फिर भी गीत मिलन के गाती।।

दृग से धार खुशी की फूटे , खुद उत्सर्ग हमें करना है।
पथरीले कंटक पथ साथी, तो हॅंसते-हॅंसते चलना है।।

घर बैठे कुछ नहीं मिले है,
स्वेद परिश्रम का बहता है।
जीवन में खुशहाली आती ,
यही इतिहास भी कहता है।।
संयम रखके संकल्पों से , चुनौतियों को नर सहना है।
पथरीले कंटक पथ साथी, तो हॅंसते-हॅंसते चलना है ।।

डॉ मंजु गुप्ता

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