सर्जना के स्वर
लघुकथा
डॉ मंजु गुप्ता
अहिंदी भाषी अनिता खुश होकर अपनी दोस्त नेहा से बोली ,
"लोगों ने मेरा हौसला तोड़ा था । मित्रों ने कहा था कि तुम छंद नहीं लिख सकती हो।"
"कठिन जो है।"
"मैंने इसे चुनौती के रूप में माना।"
"अच्छा!"
"मेरे सामने हौसले ,प्रयास की पगडण्डी थी।"
"हाँ।"
"मेरी हिंदी में रचे दोहे की इस किताब को लिखने का श्रेय तुमको जाता है।"
"नहीं , तुम्हें सीखने की ललक थी ।छंद विधाओं को बड़ी लग्न , श्रम से सीखा इसलिए तुम लिख सकी।"
"तुम ही मेरी गुरु हो, मेरी गलतियों को बताती थी।
"हाँ , सखी होने के नाते मार्गदर्शन किया ।तुम भी साहित्य के क्षेत्र में आगे बढ़ो। "
"पहला कदम आगे न बढ़ता तो ... ।तुम्हारी वजह से ही ।"
गर्वित होकर ,"तुमने यह बात तो मानी । स्वार्थी लोग तो नेकी को भूल कर पीठ दिखाते हैं।"
"ऐसे इंसान जो ठान ले । वे काम को पूर्ण करते हैं।"
"सही ,सदसङ्गति का असर है।"
"हर कोई अभिमन्यु नहीं होता है।"
हाँ धीरे-धीरे अभ्यास से जड़मति सुजान होती है।
"तुमने रात -दिन परिश्रम करके मौलिक सर्जन किया। उसका मीठा फल है।"
"आज यह किताब हिंदी संस्थान से पुरस्कृत हुई।" उत्साहित होकर बोली।
शाबासी देते हुए, "बधाई की पात्र हो ।"
"यह वीडियो उस पल की गवाह है।" अधरों पर चौड़ी मुस्कान लिए।
"कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।"
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