Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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साधना सार छन्द

 


साधना सार छन्द



धीरे - धीरे सूरज है  उगता ,

लाली  लेकर आता ।

अँधेरा भी  टिक नहीं पाता ,

 सवेरा जगमगाता ।

झिलमिलाती सुनहरी किरणें ,

 जग , घर , आँगन जाती ।

जागो आलस्य त्याग का ,

सन्देशा बतलाती । डॉ मंजु गुप्ता


 स्वागत में  खगकुल  -प्राणी  भी ,

वंदना गान गाते ।

बिना ढोल , मंजीरे बाजे ,

आलाप हैं सुनाते ।

कोयल अपने पंचम स्वर में ,

प्रभु का गुण है गाती  ।

 साधना में लीन कुदरत भी  ,

ओम धुन है सुनाती । 


मलयाचल की मलय पवन भी ,

नाच - नाच इठलाती ।

झूम - झूम के मनोहर  प्रकृति ,

 सबको गले लगाती।

आस - विश्वास का आसमान ,

खुशी का गीत गाता ।

और सूरज के संग में ढग  , नया सवेरा लाता ।

 

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