साधना सार छन्द
धीरे - धीरे सूरज है उगता ,
लाली लेकर आता ।
अँधेरा भी टिक नहीं पाता ,
सवेरा जगमगाता ।
झिलमिलाती सुनहरी किरणें ,
जग , घर , आँगन जाती ।
जागो आलस्य त्याग का ,
सन्देशा बतलाती । डॉ मंजु गुप्ता
स्वागत में खगकुल -प्राणी भी ,
वंदना गान गाते ।
बिना ढोल , मंजीरे बाजे ,
आलाप हैं सुनाते ।
कोयल अपने पंचम स्वर में ,
प्रभु का गुण है गाती ।
साधना में लीन कुदरत भी ,
ओम धुन है सुनाती ।
मलयाचल की मलय पवन भी ,
नाच - नाच इठलाती ।
झूम - झूम के मनोहर प्रकृति ,
सबको गले लगाती।
आस - विश्वास का आसमान ,
खुशी का गीत गाता ।
और सूरज के संग में ढग , नया सवेरा लाता ।
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