राजा हिमालय का वंदन
कुकुभ छंद
श्वेत मुकुट धरि शीश हिमालय, बैठे सिंहासन पर है
चमक रहे थे अद्भुत सुंदर , वस्त्राभूषण तन पर है।।
दाग बिना बर्फीली काया , दिखे संगमरमर सम है।
उनके सम्मुख चंद्रकला की सब, सुंदर कांति लगे कम है।।
बारी- बारी से ऋतु आकर , राजा का रूप सँवारे।
देखि प्रकृति मुसुकात सुंदर, प्राणत मन को पारे।।
हिम की चादर ओढ़े राजा, लगे रूप में चार चाँद जी।
भूप हिमालय दानी बाँटे , भर -भर धन स्वर्ण नाँद जी।।
रूप निहारत मैना प्रिय का, सुधि स्वयं की बिसरावई।
माँ कह मैनाक आँचल पकड़, मृदु सुर सुन कर चोंक गई।।
बिठा गोद में सुत दुलरावै , चुंबी देकर के प्यार करे।
वात्सल्य देख सुबह -शाम भी , अपनापन से मोद भरे।।
चरण धोत नदियाँ भी निशदिन , प्रीति रस्में अपनाय के।
अमृत रस छलिकावत धारा, कलकल राग गुनगाय के।।
झूम झूम के राजदरबार , नाचे शीतल पुरवइया।
हुए मगन दरबारी सब , राजा वारे अशरफिया।।
साँझ ढले जब रवि आलिंगन, क्रीड़ा करे नभ छोर पै।
लाली छाय सुहावन मुख पर ,नाचत प्रीत मन डोर पै।।
प्रेम मगन अचल हिमालय, थिरकन करे हर अंग में ।
ऋतु बसंत सम्मुख जैसे हो, झूमी मैना तरंग में ।।
धर्म सत्य की ध्वजा लिए यह , उत्तर की दिशा में खड़ा।
बुरी नजर अरि इस पर डाले , बाघनखों से वीर लड़ा।।
ओलों के बम-शस्त्र बनाकर ,रण क्षेत्र थे सब पट पड़े।
शीत हवा की सुई बना के , करे त्वचा में छेद बड़े।।
दृढ़ता देख नृप हिमालय की , करे जगत गगन नाज है।
धरा रूप धरि वसुधा देखे, पाए सत्य का राज है।।
करें देव ऋषि-मुनि भील प्रजा, करें आपका वंदन है।
तेरे त्याग तपोवन की , पावन माटी चंदन है।। डॉ मंजु गुप्ता
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY