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कुण्डलिया

 

कुण्डलिया                      

डॉ मंजु गुप्ता , वाशी , नवी मुंबई



मारे  आँख बसंत  है , शर्मायी कचनार ।

 तन -मन आनंदित हुआ , भीगा - भीगा प्यार।।

भीगा - भीगा  प्यार  , हुआ परिवेश रुपहला।

  दिल में  चढ़ा  खुमार, वेश मौसम ने बदला ।।

 कहती 'मंजू ' सत्य , इश्क ने जादू डारे।

मधुकर चूमे फूल , जगत है ताने  मारे ।।

  ***

वर्षा रानी से डरा , हुआ शांत रवि ताप।

क्रोधी लू  है छिप गई , लखकर मेघ प्रताप ।।

लखकर मेघ प्रताप , उमस धरती से भागी ।

हुई सुखद बरसात ,धरा की किस्मत जागी ।।

रहे कृषक हर्षाय , देख खेतों में पानी।

हुआ जगत  खुशहाल ,बरस के वर्षा रानी।।

***

मौसम बसन्त  ,प्रेम का,लाया रंगअनंत।

चटका डालन फाग है,पिक पुकारती  कंत।।

पिक पुकारती कंत , मस्त महुआ है फूला ।

ऋतु ने बदले रंग,देख मन इसको झूला ।।

लिए रूप-रस-गंध; हुआ कुदरत का संगम ।

धरा--प्रकृति  संबंध , निरख उन्मादित मौसम।।

 


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