जन्माष्टमी
लघुकथा
"नानी, आज जन्माष्टमी है। मैं आपके हाथ का फलाहार खाने, कान्हा को सजाने आ रही हूँ।" धेवती ने फोन काटा।
"आ जा। सीखा भी दूँगी।"
"यूट्यूब पर एक रेसिपी खोलो तो दस आ जाती हैं, समझ ही नहीं आता कौन सी सही है।"
"तेरी मम्मी हिमानी तो डॉक्टर है, उसे फुरसत ही कहाँ।"
"मम्मी तो ऑनलाइन ऑर्डर कर देती है, हमें उसका स्वाद अच्छा नहीं लगता।"
नानी हँसी, "ऑनलाइन से पेट भरेगा, मन नहीं।"
"हा , घर में तो ढेर सारी बन जाती है।"
"सही , सात तरह की पंजीरी बनती हैं।"
"अच्छा !"
"कुट्टू की पूरी, धनिया की पंजीरी, गोंद, मींगी , मखाने की प्रसादी , पोस्त की ... ये सब तेरी मम्मी हिमानी को मैंने ही सिखाई थी।"
हाँ , आपका फलाहार मेरे दादा-दादी को बहुत पसंद आता है ।"
"उनका भी बना दूँगी।"
"वो तो दादी आज भी आपकी तारीफ करती हैं।" फोन काटा।
घंटी बजी। धेवती आँगन में थी।
"ह…
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